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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पुरुषको प्रसन्न करनेका द्वार है, सदाचरणसे मिलता है सत्यपुरुषकी कृपासे मुक्ति होती है । परमात्माको सदाचार स्वीकार है दुराचारसे घृणा है ।

जिसने इस संसारमें आग लगाई उसीमें बुझाने की भी सामर्थ्य है । जिसने कालपुरुषको प्रगटकर उसको राज्य दे दिया वही इससे बचा भी सकता है । जिसने सब प्रपंच प्रगट किया वही इसको शांत भी कर सकता है, दूसरेकी क्या शक्ति है कि, कुछ भी कर सके । मनुष्यको चाहिये कि, उसीकी दया और कृपाका ध्यान रखे, उसीके कृपापात्र बननेका प्रयत्न करे, दूसरा कोई उपाय नहीं है, सब युक्तियाँ निरर्थक हैं । केवल उसीकी कृपादृष्टि प्राप्त करनी चाहिये, दूसरा कुछ भी प्राप्त करना नहीं है ।

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और यहूदी लोगोंसे प्रार्थना ।

प्रथम हिन्दू महाशयोंसे यह विनय है कि, जिन जिन बातोंपर उनका विश्वास और भरोसा है, जिनमें उनकी स्थिति है, वे क्या हैं ? उसमें कुछ स्थिरता है अथवा नहीं ? निर्गुण और सगुण दोनों ही तुच्छ हैं । क्योंकि, निर्गुण (जिसमें कुछ गुण नहीं) कर्ता नहीं हो सकता सगुण नाशमान तथा निर्मूल है । जब ये दोनों निर्गुण और सगुण अव्यवस्थित नाशमान हैं तो इससे लाभ की क्या आशा हो सकती है ? फिर लोग कहते हैं । ब्रह्म, जीव और माया तीनों एक ही हैं, तीनोंका एक ही मूल है । वे केवल जीवकी अज्ञानतासे तीन भासते हैं नहीं तो यथार्थमें एक ही हैं । ज्ञानकी दशामें अवाच्य पद है कुछ कहा सुना नहीं जाता । जो कुछ मन बुद्धिका गोचर है सो सब भ्रम माया है ।

तत्वमसिके तीनों पद भ्रम और धोखा हैं । भ्रम और धोखा ही इन्द्रिय गोचर होता है । भ्रमको ग्रहण करनेसे भ्रम ही मिलता है, सत्यको धारण करनेसे सत्यपदकी प्राप्ति होती है । जो सत्यकी ओर झुकेगा वह अवश्य सत्यमें ही प्राप्त होगा ।

मुसलमान महाशयोंसे कहना है कि, आप लोग कहते हैं कि, “जो मुहम्मदी कलमा पढ़नेसे मुक्ति हो जायेगी, वह विहिश्रतको जावेगा, शेष सब नकको ।” मुसलमान अपने भिन्न सब धर्मवालोंको काफ़िर कहते हैं । यदि मुसलमान होकर अपनेसे कुफ़पर ध्यान देते तो कभी किसीको किसी प्रकार दुःख नहीं देते, अत्याचार और अन्यान्यको निकट न फटकने देते, पर पक्षपात, धर्म, द्वेष, ऐसी मूर्खता है कि, जिससे मनुष्य क्या २ पाप ओर बुराई नहीं कर सकता ? जिस कलमापर उनका विश्वास है, जिसको अपने धर्म और ईमानका मूल समझते हैं वह क्या है ? केवल भ्रम और धोखा है । मूर्खोंके ठगनेकी एक युक्ति है ।