कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextआवश्यकता नहीं है। शास्त्र पढ़ा हो अथवा नहीं पर उपरोक्त चारों गुणोंके आशय किो भली प्रकार समझता एवं उसीके अनुसार चलता हो तो वही सब विद्वानोंमें वद्वान् और संतोंमें संत शिरोमणि है।
जिसने अपने इन्द्रियोंको दमन कर लिया है, आसुरी सम्पत्ति क्रोध आदि को अन्तःकरणसे निकाल दिया है, दैवी सम्पत्ति शील, संतोष, धैर्य आदिको सम्यक् प्रकार धारण कर लिया है, वेही विद्वान् हैं, वेही सन्त हैं, चाहें शास्त्र पढ़े हों अथवा नहीं पढ़े हों। जिनको दैवी सम्पत्ति सम्यक् प्रकार प्राप्त है, उनको शास्त्रावलोकन के लिये समयविशेष नहीं लगाना पड़ता। हाँ ! जब आवश्यकता हो तो शास्त्र देख लेना अवश्य चाहिये पर उसीमें पचा रहकर अपने भजनको छोड़ बैठना उचित नहीं।
सारी विद्या, कला, कौशल आदिके प्रगट कर्ता शिवजी हैं। शास्त्रोंमें लिखा है कि, जब शिवजीने अपना डमरू बजाया तो उसके शब्दसे नौ स्वर ९ (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ प्रकट हुये। प्रथम येही नौ प्रगट हुये पीछे इन्हींसे सोलह स्वर बने, जिनमें से १२ बारहका विशेष प्रयोग हुआ उसीसे वर्णमालाके सब अक्षर प्रगट हुये, जिससे अनन्त शब्द प्रवृत्त हुये। इनके बिना सब अक्षर तुच्छ हैं सबके प्रकाशक येही हैं।
वाणी वेदसे लेकर, दूसरी जो कुछ संसारमें है, चाहे गुप्त हो अथवा प्रगट, सब शिवजीसे प्रगट हुये हैं। इस कारण शब्द, पुस्तक पोथी कोही सर्वस्व समझने उन्हींके ऊपर भरोसा करनेवाले शिवजीके शिष्य हैं। शिव तमोगुणी देवता है, इसी कारण शब्दोंकेही भरोसे अपना कल्याण चाहनेवाले भी वैसेही हैं क्योंकि यह नियम है कि, जैसा गुरु होता है वैंसा चेला भी होता है।
साखी — जल प्रमाणे माछली, कुल प्रमाने बुद्धि।
जाको जैसा गुरु मिला, ताको तैंसी शुद्धि ॥ १ ॥
ऐसे शब्दोंके आधारवालों वा पुस्तकोंके आश्रय करनेवालोंमेंसे विरलाही कोई इन्द्रिय दमन करनेवाला होता है। नहीं तो विषय वासनामें ही निमग्न रहते हैं, चाहे वह किसी रूपांतरमें क्यों न हों। ऐसे लोग सच्चे सन्तों, तथा इन्द्रियजित निष्कामी पुरुषोंकी निन्दा करते हुए ठट्ठा उड़ाते हैं। यही कारण है कि, सच्चे वैराग्यवान् संत और विषयी मायामें बद्ध हैं, देहाभिमानियों विद्याभिमानियोंका कभी मेल नहीं मिला। समस्त संसार त्रिगुणात्मक है। १ सत्तोगुण २ रजोगुण ३ तमोगुण; येही तीन गुण हैं इन्हींके आधारपर सृष्टि खड़ी है।
सत्तोगुणी स्वर्गी रजोगुणी मध्यम लोकवासी अर्थात् मृत्युलोकवासी