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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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है । ब्रह्म, जीव, माया, ईश्वर आदि सब अहंकारके ही भ्रममें हैं । सत्यगुरुकी दया विना अहंकारसे छूटकर निर्व्रम पदमें स्थिति होना अत्यन्त कठिन है । जितने मुक्तिके देनेवाले और मुक्ति चाहनेवाले हैं सब धूरकी रस्सी बाँटकर आकाशकी कूँआसे जल पीना चाहते हैं । जब तक इनको सद्बिचार न आवेगा तब तक इनका ठिकाना नहीं लगेगा । जो पशु धर्म (विषय विलास) में भूल जावे वे तो पशु हैं, उसको कभी सत्य पथ न मिलेगा, न वह मनुष्यत्वकी ओर जा सकता है । मनुष्य आपही अपना मित्र, आपही अपना शत्रु है । अपना कोई शत्रु नहीं, सब भला, अपने मनकी ओरसे ही बुरा प्रस्ताव होता है, किसको बुरा कहा जावे किसको भला ।

साखी — बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न देखा कोय ।

जो दिल खोजा अपना, मुझसा बुरा न होय ॥

शुद्ध विचार और चिन्ताके बिना जीव कुत्तोंके समान दर दर भटकता फिरता है । सब कुछ आपही है, पर ज्ञान और बुद्धि कहें कि, आपको पहचान सके । आपही आशिक (प्रेमी) है आपही माशूक (प्रीतम) सुखी है, आपही दुःखी । आपही बन्ध और आपही मोक्ष है ।

अहंकारसे ही इसकी दुर्गति हो रही है । इस शत्रुके दो हथियार हैं, एक स्त्री और दूसरा अहंकार है । इसने ही नाना प्रकारके धर्म रीति व्यवहार प्रगट कर जगत्को फँसा रहा है ।

जब तक मनुष्य “सर्वं खलिबंद ब्रह्म” नहीं देखता, तबतक उसके भजनका तार लगा रहता है, जबतक पूर्ण परमात्माका साक्षात्कार न हो तबतक प्राणा-पन्न सदाचारमें रहकर भजन भक्तिमें लगा रहना चाहिये । जब “सर्वं वही है अर्थात् सब परमात्माही है” का ज्ञान हो जाता है, तब आपही आप अहंकार छूट जाता है । ऐसोंमें धैर्य आदि गुण स्वभावसे ही वर्तते हैं । कौसा भी कष्ट क्यों न पड़े, कभी अधीर नहीं होते तीन लोकका राज्य भी मिल जावे तो भी आनन्द नहीं मानते । कठिन तपस्या अथवा किसी नियमको हठसे धारण करनेसे मुक्ति नहीं होती वरन् विचार विवेक, द्वारा आत्मचिन्तन करनेसे मोक्ष होता है । सत्य और असत्यका निर्णय न करेगा, सार शब्दको न पावेगा । अज्ञानी लोग यह नहीं विचारते कि, “जिन देवी देवताओंकी हम पूजा करते हैं वे स्वयं बन्धनमें फँसे हैं, हमें क्या मोक्ष देंगे” वे स्वयं दूसरोंके आश्रयमें भटकते हैं मुझे क्या आश्रय देंगे ?

शब्द — भूली मालिन आयो सतगुरु, जागता है देव ।

ब्रह्म पाती विष्णु डाली, फूल शंकर देव ॥