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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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नहीं करता सब प्रकृतिके ऊपर छोड़ देता है। तीन प्रकारके कर्म होते हैं। एक तो वह है जो अपने इच्छाके आधीन है, जैसे बोलना, चिल्लाना। दूसरा वह है जिसमें इच्छा भी होती है पर पूर्ण बल नहीं होता। तीसरा वह है जिसमें अपना अधिकार नहीं; जैसे पानी पर पैर रखनेसे अवश्य तहको चला जायगा। पानी पर रख कर कोई नीचे जाना चाहे अथवा न चाहे पर अवश्य पानीको चीरता हुआ नीचेको चला जायगा।

शरणागत तथा ईश्वर विश्वास।

तवकुल जिसका नाम है, वह ईश्वरके सच्चे निकटवर्तियोंके स्थानोंमें से एक स्थान तथा महान् उच्च पद है। तवकुलका ज्ञान यथार्थमें बहुत सूक्ष्म और कठिन है। तवकुल पर चलना बहुत दुस्तर है। जिसके मनमें ऐसा संदेह हो कि किसी कर्मका भी कर्ता ईश्वरके अतिरिक्त कोई दूसरा है तो वह ईश्वरका विश्वासी नहीं हो सकता। यदि सब सामग्री छोड़ दी जाय तो अशर (कर्मकाण्ड) के विरुद्ध होगा, यदि कोई कारण प्रत्यक्ष न पावेगा तो बुद्धिके विरुद्ध करेगा। यदि कारण पावेगा तो संदेह है कि प्रत्यक्ष सांसारिक किसी पदार्थपर विश्वास कर लेगा। इन अवस्थाओंमें उसके ईश्वरवादी (आस्तिक) होनेमें बाधा पड़ेगी। अतः बुद्धि, शास्त्र आदि जैसे तवकुलकी व्याख्या करते हों, उनको पूर्ण रीतिसे समझता हो वरन् उसका स्वरूप बन गया हो, वही तवकुलको धारण कर सकता है। नहीं तो तवकुल बहुत दुस्तर और अगम्य है। इसको विरलाही जान सकता है। खुदा (ईश्वर) तवकुलों (विश्वासीयों) को ही प्रीतम बनाता है। तवकुलके ऊपर ही ईमान है।

आदमको सब फिरिश्तोंने नमस्कार की, इस कारण आदम सब फिरिश्तों से श्रेष्ठ है। उसीकी संतान सब मनुष्य हैं। इस कारण मनुष्य भी फिरिश्तोंसे उच्चपद पर स्थित हैं। अतः जो कोई आदमकी संतान (मनुष्य) होकर फिरिश्तों अथवा किसी दूसरोंको खुदा (ईश्वर) के अतिरिक्त, माथा टेकेगा, उनसे कुछ कल्याण चाहेगा, अथवा किसी प्रकारकी आशा रखेगा तो वह मनुष्य नहीं वरन् पशुके पदको पावेगा। जो जिस प्रकार खुदा विश्वम्भर पर विश्वास करेगा, वह उसी प्रकार उसे भोजन देगा। जिस प्रकार पक्षी प्रातःकाल भूखे उठते हैं पर संध्याको अधाकर घर आते हैं। जो कोई ईश्वरकी शरणमें सच्चे दिलसे प्राप्त होता है, उसकी वही (ईश्वर) पूर्ण रीतिसे रक्षा करता है। इस प्रकार ऐसी जगह उसे भोजन पहुंचाता है कि उसकी समझमें भी नहीं आता जो संसारकी शरण लेता है उसको परमात्मा संसारके साथही छोड़ देता है।