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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 1146 of 1367

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है, मेरे राजाने यह आपके लिये भेंट भेजी है। राजाने दूतको यथायोग्य प्रतिष्ठा दी। राजाने उसे आनन्द पूर्वक स्वीकार कर ली। बाजीगरने कहा कि, महाराज ! इस घोड़ेपर सवार हूँजिये, इसका तमाशा देखिये। राजाने उस घोड़ेकी ओर दृष्टि की। दृष्टि करतेही राजाकी टकटकी बँध गई ऐसा चुप बैठ गया मानों सक्तासी आ गई है। राजाकी यह दशा देखकर सब दरबारी लोग आश्चर्यमें थे, राजाके शरीरको निर्जीव अनुमान करने लगे थे। इस अवस्थामें दो घड़ी रहनेके बाद चैतन्य हुआ, सब लोगोंकी जानमें जान आई। राजाने कहा कि, जिस समय बाजीगरने अपना मूर्छल हिलाया था घोड़ा आजानेपर जैसेही बाजीगरने उसपर चढ़नेको कहा वैसेही मैंने अपनेको उस घोड़ेपर सवार हुए घोर वनमें शिकार खेलते हुये पाया था। वहांसे चलते चलते एक ऐसे वनमें पहुँचा जहां किसी भी जीवधारीका पता नहीं था। आगे चलकर एक ऐसे भँदानमें पहुँचा जहां कि, वृक्ष तो क्या ? घास भी नहीं देख पड़ती थी, दिनभर उसीमें फिरता रहा, रात हुई तो उससे बाहर हुआ। बाहर होना क्या था ? एक दूसरे जङ्गलमें पहुँचा। उस जङ्गलमें नानाप्रकारके जीवधारी इधरसे उधर फिर रहे थे, जगह जगह मीठे पानीके तालाब भरे हुये थे, नानाप्रकारके सुन्दर और फलदार वृक्ष स्थान स्थान पर खड़े थे। मैंने वृक्षकी डाली पकड़ ली वृक्षपर चढ़ गया। घोड़ा भी उसी जङ्गलमें चरता रहा। वह रात मुझे कल्प समान बीती। क्योंकि, दिनभरका थका हुआ भूखा, प्यासा, ऐसे अपरिचित वनमें पड़ा हुआ था। सबेरा होनेपर मार्गको ढूँढ़नेके लिये इधर उधर भटकते भटकते एक दूसरे जङ्गलमें पहुँचा, उसमें बड़े वृक्ष तथा जलका अभाव था, पर कुछ दूर आगे चलनेपर एक लड़की, हशियाँ काली, जैसी भँसकीसी मोटी और शूकरकीसी मैली, अपने हाथमें भोजन लिये हुये जल्दी जल्दी कहींको जाती देख पड़ी। मैं कई दिनका भूखा था, धैर्य न रख सका, उसीसे कहा कि, पर उपकार करना सर्वोत्तम गुण है, किसी भूखेको तृप्त करादेनाही पुण्य है, मैं कई दिनोंका भूखा हूँ, तू अपने भोजनमेंसे थोड़ा मुँ भी देदे। बहुत प्रकारसे बिनती करनेपर कठोर हृदयाने मेरी कुछ भी न सुनी, वरन् भयानक होकर कहने लगी कि, मैं भड़्गिनकी लड़की हूँ, इस वनमें मेरा पिता खेतका काम कर रहा है, उसीके लिये भोजन लिये जाती हूँ, इसमेंसे मैं तुझको नहीं दे सकती। हाँ ! उस दशामें कि, तू मुझसे विवाह करना स्वीकार कर ले तो आधा तुझको दे दूँ, क्योंकि, पति पितासे भी अधिक प्यारा होता है। राजाने कहा कि, आवश्यकतामें प्रतिष्ठा और पवित्रताका ध्यान नहीं रहता, आवश्यकता मनुष्यको किस घाटका पानी नहीं पिलाती