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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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प्रथम लौतदेशको गया वहाँ अपने भङ्गी परिवारोंको देखा, उनको भली प्रकार पहचाना, मकानोंको ठीक २ वैसेही देखा। वहाँसे केशर देशको चला, केशर देशमें पहुँचकर राज्यका हाल जाना, जैसे पहले देखा था वैसेही पाया। लोगोंसे कहा यहाँके लोग तो बड़े भक्त और अभ्यागतसेवी जान पड़ते हैं। लोग कहने लगे कि, यहाँ तो बड़ी भक्ति और सेवा हुआ करती थी पर कुछ दिन हुए यहाँ एक भङ्गी राजा हो गया था, जिसके साथ लोगोंने भोजनादिक संसर्ग किया बहुतसे लोग उसी पापमें जल मरे। इसी कारण लोगोंके मनमें बड़ा सन्देह हुआ इसीसे अभ्यागतोंकी सेवा बन्द हो गई।

यह सब हाल देख सुनकर गाधको विश्वास हुआ कि, माया कुछ न होनेपर भी सब कुछ है। फिर तपस्यामें संलग्न हुआ। विष्णु भगवान् फिर प्रगट हुये कहा कि, सब कुछ पञ्चतत्त्वसे बना है पञ्चतत्त्व माया है, जो मायाको चाहेगा उसको मायाही मिलेगी। जो ज्ञान चाहता है अथवा जिसको ज्ञान हो जाता है, वह मायाको तुच्छ जानता है, उसकी अभिलाषा नहीं करता। मायाको चाहनेवालोंको मायाही मिलती है जैसे खेतमें धान बोनेवालोंको खलिहानमें गेहूँ नहीं मिलता। बबूरकी डालीसे कोई सेब नाशपाती अथवा अंगूरदि नहीं तोड़ सकता। तू मायाका अभिलाषी था, इसलिये मायाही मिली। भङ्गीके घरमें तुझको सुन्दर स्त्री मिली, राजा होकर सहस्रोंकी हत्याका अपराधी हुआ, यदि मोक्ष चाहता है तो मायाकी उपासना छोड़ दे।

फकीर और अघोरी।

पञ्जाब देशान्तगत पटियाला राज्यके बिटण्डा नामक नगरमें मेरे मित्रोंमें से हुजूरशाह नामक एक विरक्त मित्र (१८७५ ई. में) रहते थे। हुजूरशाह बड़े महात्मा थे, वे कभी २ मुझसे भी मिलनेके लिये दूधनामक गाँवमें आया करते थे, जहाँ कि, मैं रहता था। एक दिन संयोगन मुझसे कहने लगे कि, उनके पास (शहर विटण्डामें) धूलीशाह नामक एक फकीर आये। उन्होंने उनके खूब आवभक्ति की, रातके समय धूलीशाह उनके पास रहे। सबेरे वहाँसे जाने लगे तो हुजूरशाहजीने कहा कि, अब फिर कब दर्शन होगा? धूलीशाहने कहा कि, मेरा डेरा सङ्कुरा राज्यके अमुक ग्राममें है इतना कहकर वहाँसे चले गये। कई एक दिनोंके बाद धूलीशाहके बताये हुये पते ठिकानेपर हुजूरशाह उसी ग्राममें पहुँचे। वहाँ लोगोंसे उन्होंने पूछा कि, धूलीशाह कहाँ रहते हैं, उनकी कुटिया कहाँ है? वहाँके लोगोंने कहा कि, अब धूलीशाह यहाँ कहाँ, उनको मरे हुये पचास वर्षसे भी अधिक हो गया, अब तो यहाँ उनकी समाधि बनी