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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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इन सात ज्ञान और अज्ञान भूमिकाओंका बहुत विस्तृत वर्णन है, यहाँ नाम मात्रही लिखा गया है।

माया दो प्रकारकी है, एकका नाम विद्या और दूसरीका नाम अविद्या है। इन्हीं दोनोंमें सारा ब्रह्माण्ड फँसा हुआ है। विद्याकी दशामें जीव परम ऐश्वर्यको प्राप्त हो, अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति पालन और नाश किया करता है। अविद्यामें सारे जीव बन्धे हुए हैं। यही जीव ईश्वर है और यही जीव है। ज्ञानकी न्यूनता और अधिकताके कारण भिन्न भिन्न नाम हैं। उपरोक्त ज्ञानकी सात भूमिओंमें प्रथमकी तीन भूमिकाएं साधकोंकी हैं शेष चार भूमिकाएं जीवनमुक्तकी हैं। प्रथम तीन भूमिकाओं को जीवकी भूमिका भी कहते हैं इन सबमें भिन्न भन्न अवस्था प्राप्त होती हैं।

इन्हीं सात ज्ञान और अज्ञान की भूमिकाओंमें सब स्वामी सेवक बँधे हुये हैं। इनसे कोई बाहर नहीं है। यहीं तक अपरा विद्याकी पहुँच है।

हंस देहका विशेष वर्णन।

अद्यापि जीवके उन शरीरोंका वर्णन किया जो कि, सत्य स्वरूपसे पतित होनेपर प्राप्त होते हैं। सत्य स्वरूपसे पतित होनेपर उन्हीं छः देह नौकोश और पांच अहंकारोंमें जीवकी स्थिति होती है। ये सब देह और कोश आदि नाशमात्र भ्रममान हैं अब अविनाशी, स्थिर, सत्य सुखमय हंस देहका वर्णन सुनो। हंस देहमें पक्के पांच तत्व और तीन गुण होते हैं, कच्चे और पक्केकी समानता करके देखो उनको ऊपर ध्यान दो।

हंसदेहके पक्के तत्व।

१—धैर्य्य, २—दया, ३—शील, ४—विचार, ५—सत्य ये पांच पक्के तत्वोंकी पक्की देह थी, इन्हींसे हंस देह बनती है। अब इनका त्रिगुण सुनो। सत्य और विचारका गुण विवेक, शील और दयाका गुण गुरु भक्ति साधु भाव और धैर्य्यका गुण वैराग्य।

इन्हीं पक्के पांचतत्व और तीन गुणोंमें जीवका वासा था, अब इनकी पचीस प्रकृति सुनो।

धैर्य्यकी पांच प्रकृतियां—१—झूठका त्यागना, २—सत्यका ग्रहण करना, ३—संशय रहित होना, ४—अचल होना, ५—अहंकार नाश करना ये पांच हैं।

दयाकी पांच प्रकृतियां—१—अद्वोह, २—समता, ३—मैत्री ४—निर्भयता, ५—समर्दशिता ये दयाकी पांच प्रकृतियां हैं।

शीलकी पांच प्रकृतियां—१—क्षुधा निवारण, (तितिक्षा)—२—प्रिय