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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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उन्मत्त बाल पिशाच मूक जड दशा पञ्च यह लानी ॥
खोय आप अपन पौ सर्वश निज रूप नहि जानी ।
फिर कैवल्य कारण महकारण सूक्ष्म स्थूल समानी ॥
स्थूल सूक्ष्म कारण महकारण कैवल पुनि विज्ञाना ।
भये नष्ट यहि हेरफेरमें कतहूँ नहि कल्याना ॥
कहें कबीर सुनोहो सन्तो खोज करो गुरु ऐसा ।
जेहिते आप अपनपौ जानों मेटो खटका रैसा ॥

साहिबके हंस ऐसेही होते हैं उनकी देहके ये ही गुण क्यों ऐसेही अनेकों गुण होते हैं कोई छटे देहको ही हंसोंका देह मानते हैं यह उनकी भूल है तुमको हंस देह न प्राप्त होगी । जिसको तुमने हंस देह अनुमान कर रखा. वो तुम्हारी भूल और भ्रम है । सद्गुरुकी दया बिना हंसका स्वरूप नहीं प्राप्त हो सकता । हंस रूपके अकथ गुण हैं ।

पाँचों भूमिकाओंके नाम—गता भूमिका, अगता भूमिका, प्राप्ति भूमिका, समता भूमिका, शुद्धि भूमिका ।

पांचदेहके नाम—स्थूल, सूक्ष्म कारण, महाकारण और ब्रह्मरन्ध्र ।

पाँचों वाणियोंका नाम—परा, पश्यन्ति, मध्यमा, वैखरी, और अन्ूपम ।

सर्व मनुष्य अपने २ धर्म—मजहब—और गुरुकी प्रशंसा करते आते हैं, सब कहते हैं कि, हम बड़े, हम बड़े, हमारा गुरु बड़ा, हमारा मजहब बड़ा । यही चरचा चारों ओर फैल रही है अपने २ रङ्गमें सब मस्त हो रहे हैं ।

बीजकका शब्द ।

सबही मदमाते कोई न जाग । सङ्गहि चोर घर मूसनलाग ॥

योगी माते धरि धरि ध्यान । पण्डितमाते पढ़ी पुरान ॥

तपसी माते तपके भेव । सन्यासी माते करी हमेव ॥

मुल्ला माते पढ़ि मसहा । काजी माते करि इनसाफ़ ॥

संसार मति मायाके धार । राजामाते करि हंकार ॥

माते शुक्र देव ऊधो अकरूर । हनुमत माते ले लंगूर ॥

शिवमाते हरि चरणन सेव । कलमा माते निमाजके भेव ॥

सत्य सत्य कह स्मृतीवेद । जस रादण मारे घरके भेद ॥

चञ्चल मनके येहि काम । कहे कबीर भजु सत्य नाम ॥

मद कहिये जिसमें यह जीव मत्त होजावे आगे कुछ न सूझे सब मत्त होकर अचेत होगये मन चोरने सबको लूटा । धैर्य, दया, शील, विचार और सत्य