Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 1107 of 1367

Read in context
Page 1107

कारण देह, आधा पर्व, श्याम वर्ण, मकार मात्रिका, गोलाहठ स्थान, पश्यन्ति वाचा, सद्य शून्य, तमोगुण, सामवेद चाचरी मुद्रा, कपिमार्ग, महदाकाश, हृदयस्थान, प्राज्ञ अधिमानी, कण्ठस्थान, निर्णय अविद्याऽग्नि, तृतीय पद गायत्री, अद्वैतानन्द, इच्छा शक्ति सुधुप्ति अवस्था, सारूप मुक्ति ।

महाकारण ।

सन्तो महाकारण तन जाना ।

नीलवरण और ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥

नाभस्थान विकार मात्रिका चिदाकाश परमानी ।

मारग मीन अगोचरी मुद्रा वेद अथर्वण जानी ॥

ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति तन वार्ई ।

आश्रय लोक विदेहानन्द मुक्ति सायुज्य बताई ॥

निरणय प्रकाश तुरीअवस्था प्रत्यक्ष आत्म अभिमानी ।

॥शवहंकार महाकारण तन इति कबीर बखानी ॥ ४ ॥

महाकारण देह, मसूर प्रमाण, विकार मात्रिका, गोलाहठ स्थान, परा वाचा शून्य अद्वै मात्रिका, अथर्वण वेद, पवन तत्त्व, अगोचरी मुद्रा, ज्वाला काला, मीन मार्ग, चिदाकाश, आश्रय लोक नाभस्थान, प्रत्यज्ञ अभिमानी, चतुर्थ पद गायत्री, आदि शक्ति, विदेह आनन्द, सोहं ओहं अहंकार, तुरिया वस्था, प्रकाशक, सायुज्य मुक्ति ।

ज्ञान देह ।

सन्तो कौवल्य देह बखाना ।

कौवल्य सकल देहका साक्षी भँवर गुफा अस्थाना ॥

निराकाश औ लोक निराश्रय निरणय ज्ञान विशेषा ।

स्वसम्बेद है उन मुनि मुद्रा उनमुनि वाणी लेखा ॥

ब्रह्मानन्द कहिये हंकारा ब्रह्म ज्ञानको माना ।

पूर्णबोध अवस्था कहिये ज्योति स्वरूपी जाना ॥

पूर्णगिरी अनुचरी मात्रिका निरञ्जन अभिमानी ।

परमारथ पञ्चम पद गायत्री परामुक्ति पहचानी ॥

सदाशिव औ मार्ग सिखा है कहैं कबीर मतिधीरा ।

कलातीत कला सम्पूर्ण कौवल्य कहैं कबीरा ॥ ५ ॥

उपरोक्त चारों साक्षी ज्ञान देह, स्वसम्बेद, उनमुनि वाचा, भँवर गुफा स्थान, सदाशिव पूर्ण गिरी, अनुचर मात्रा, पूर्ण बोध अवस्था. कलातीत, सखमार्ग,