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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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इसी सच्चिदानन्द ब्रह्मकी समस्त संसार कथा करता है, सारा संसार इसीमें उत्पन्न होता, स्थित रहता और नाश हो जाता है। यह सच्चिदानन्द इस जीवका केवल भ्रम मात्र है, यह जीव भ्रमकोही ब्रह्म मानकर उसकी भक्ति और पूजा करता है। इसीके भ्रमने इसको अधा कर रखा है। सच्चे सन्त और गुरुकी सेवा बिना इसका छुटकरा होना असम्भव है; जैसे कस्तूरी मृग, अपनी कस्तूरीके सुगन्धको दूसरे पदार्थोंमें जानकर इधर उधर घासोंको सूँघता फिरता है, महान कष्ट उठाता है, पर जबतक अपनी कस्तूरीको नहीं पहचानता तब तक वैसेही घूमा करता है।

उन्नति और अवनतिके कारण — जब यह एकसे अनेक होता है तब अज्ञानी हो जाता है, जब अद्वैतकी ओर मुख फेरता है आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करता है, तो इसमें ज्ञानका प्रकाश आजाता है संसार लय हो जाता है। क्योंकि, जिसकी ओर ध्यान न होगा वह अवश्यही नाश हो जावेगा। सन्त लोग इसी कारण बाहर की वृत्तियोंका निरोधकर अन्तरमुखी वृत्ति करलेते हैं। जिस प्रकार कछुआ अपने हाथ पाँवको समेटकर एक जगह बैठ जाता है, उसी प्रकार सन्त लोग अपनी वासनाओंका निरोधकर ब्रह्मपदमें बैठ जाते हैं समय पाकर कछुआके समान हाथ पाँवोंको बाहर निकालते हैं संकल्प करके सृष्टि रचते हैं। इसी प्रकार अनन्त वार हुआ करता है। जबतक वासनाका बीज नष्ट नहीं होता जबतक जीव सूक्ष्मसे स्थूल स्थूलसे सूक्ष्म हुआ करता है। यह सर्वदा अपने कम्मोंके वश हो कभी ऊपर और कभी नीचे आता है, कभी मध्यमें लुढ़कता हुआ ठोकरें खाता फिरता है। जब यह अन्तिम देह स्थूल शरीर पाकर उत्तम कम्मोंसे ईश्वरकी भक्तिमें प्रवृत्त होता है, तो पुनः शनैः शनैः ऊपरको चढ़ जाता है। जब यह अशुभ कम्मोंकी ओर झुकता है तो चौरासी योनियोंमें भटकता हुआ विकल और दुःखित रहता है।

तत्त्वमसिका अर्थ — जब यह प्रथम अपने सत्यस्वरूपसे गिरा, “तत्त्वमसि” में इसने अपना घर बनाया, यह “तत्त्वमसि सामवेदका महावाक्य है। तत्त्के अर्थ ईश्वर और त्वं—जीवको कहते हैं—असि—दोनोंका एकता करने वाला ब्रह्मपद है। तत्—पद जैसे समुद्र—त्वं—पद जैसे कुवा और तालाब आदि और असि—पद जैसे दोनोंमें जल। तत्—पद—ब्रह्म अविनाशी ज्ञानी और पूर्ण है। त्वं पद जीव नाशमान और अल्पज्ञ है। असि—पद शुद्ध ज्ञान स्वरूप है

खण्डन — ये दोनों उपाधि छूटे तो आत्मा जैसेका तैसा हो। ये तीनों पद वेदने ठहराये हैं, इन्हीं तीनों पदोंमें सब जीव फँस रहे हैं। आगेकी सुधि किसीको भी न मिली, इसी तीनों पदोंतक संसारका ज्ञान है। अरब और फारस आदिकके