Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 1097 of 1367

Read in context
Page 1097

आस पास सन्तनको डेरा, मैँडेया श्रीरामकी ।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो, बलिहारी वहि नामकी ॥

बहुत भाषाओंका सीखना बोलना वैसाही है, जैसा कि, बहुतसे पशु पक्षी, एक दूसरे पशु पक्षी, अथवा मनुष्यकी बोली बोलना सीख लेते हैं । बहुत भाषा सीखनेसे मनुष्यकी कुछ बड़ाई नहीं, मँना, तोता आदि पक्षी बहुत प्रकारकी भाषा बोलते हैं, वैसेही आदमी अरबी, फारसी, अंग्रेजी, तुर्की, इब्रानी, संस्कृत आदि भाषाओंको सीख लेते हैं, इससे उनकी कुछ अधिकता नहीं हो जाती । जिसने भजन भक्तिका आनन्द पाया उसके सामने त्रिलोकीकी सब बातें तुच्छ हैं ।

जैसे सन्तोंमें वैसेही गृहस्थोंमें भी ऐसे २ सुकृतिजन हुये हैं कि, जो अपने दान, पुण्य, योग, यज्ञ, विवेक, वैराग्य, तपस्या और भक्ति आदिसे इन्द्रको भी दास बना लिया है । उनके न्याय और उदारताकी कथा बहुत प्रसिद्ध है। मैंने एक किताबमें पढ़ा था कि, एक अपढ़ राजा एक पढ़े हुये शत्रु राजाके वश हो गया । शत्रुने राजासे कहा कि, तू कानूनके अनुसार न्याय नहीं करता । उन अनपढ़ राजाने उत्तर दिया कि, मैं स्वयं कानूनका मूल हूँ; मुझे आईन कानूनकी कुछ आवश्यकता नहीं । इस प्रकार साधु विरक्त अथवा गृहस्थ दोनोंमेंसे जो अपनी सुकृतीको पूर्ण करेगा, अपना कर्तव्य न भूलेगा वह प्रतिष्ठित होगा । उसके लोक परलोक दोनों सुधरेंगे । पढ़नेसे क्या लाभ ? यदि पढ़ेके अनुसार कर्म नहीं किया तो सब पढ़ना लिखना व्यर्थ है । परमात्माने जिनको स्वाभाविक गुण प्रदान किये हैं उसको बनावटकी क्या आवश्यकता है ?

गो यह मत ना पसन्द खातिर हो । वनजर पेश सन्त शातिर हो ॥

मेरी गुफ्तार खूबसो समझे । या ब हजरत हुजूर फातिर हो ॥१॥

अध्याय २१.

जीवका वर्णन

जीवके पक्केतत्त्व — स्वसम्बेदका कथन है कि, पहले जीव अपने सत्य स्वरूप में था, उसकी सत्य स्वरूपी देह थी, पिण्ड और ब्रह्माण्ड ये दोनों सत्यस्वरूप और पक्के थे, पांच पक्के तत्त्व और तीन गुण थे । धैर्य, दया, शील, विचार और सत्य, ये ती पक्के पांच तत्व कहलाते हैं विवेक, वैराग्य, गुरुभक्ति साधुभाव ये तीन गुण थे । इन्हीं पांच तत्वोंके और तीन गुणोंकी हँसाकी देह थी । इस जीवका प्रकाश और स्वभाव अद्वितीय था ।