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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पर खड़े हैं, आगे पग नहीं बढ़ा सकते। जिसके दण्डे पर सब सांसारिक तथा विद्याभिमानी खड़े हैं, वह क्या है? वह तो केवल अज्ञानी अन्धोंके लिये है।

कबीर साहबने कहा है—‘अन्धेको दरपण वेद पुराण’।

वेद, पुराण, किताब कुरान आदि ऐसे हैं; जैसे अन्धोंके सामने दरपण। ऐसाही इञ्जीलमें, पोलूस रसूलका पहला तमताऊसको खत देखो ८ और ९ आयत—हम जानते हैं कि, शरीयत (कर्मकाण्ड) अच्छा है, यदि उसकी रीति पर भली प्रकार वर्तवि किया जावे।

यह शरीयत (कर्मकाण्ड) सत्यवादियोंके लिये नहीं है वरन् शास्त्र विमुख, दुराचारी, अधर्मी पापी, माता पिताको बद्ध करनेवालों, अन्यथाचारियों, विषयी, मनुष्य विक्री करनेवालों झूठे, झूठी शपथ खानेवालों आदि काफ़िरोंके लिये है। इनके अतिरिक्त और भी जो सत्यपथसे विरुद्ध हों उनके लिये है। क्यों कि, दण्डव्यवस्था इसीमें है।

सभी विद्याभिमानी सन्तोंकी कृपा बिना शरीयत—कर्मकाण्ड—में बँधकर मनमुख हो गये। सन्त राजा हैं। पठित अपठित मनुष्य उनकी प्रजा हैं। राजाको कर देना तथा उसकी आज्ञाकारिता करना उचित है, जो न करेगा वह अवश्य कैंद होगा। संसारके सन्त गुरु शिक्षक हैं। जो रीतिसे गुरुकी सेवा न करेगा वह पदसे भ्रष्ट हो जावेगा। गुरु और ईश्वरका धन्यवाद करना आवश्यक है। जिसका गुरु नहीं है उसका ईश्वर भी नहीं है। गुरु और सन्तसे ईश्वर की प्राप्ति होती है। जिसका गुरु न हो वह एक अथवा दो ईश्वरोंकी भक्तिका दावा करे तो झूठा है, उसको द्वैत अथवा अद्वैत किसी प्रकारसे ईश्वरकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार विद्याभिमानी अपने ऊपर आपत्ति उठाते हैं। इसके ऊपर एक दृष्टान्त है कि—

बुल्लेशाह और शरई—साई बुल्लेशाह साहब, विरक्त महात्मा, लाहोरके निकट कुसूर नामक कसबामें रहते थे। उनकी भजन भक्ति माहात्म्य समस्त पंजाबमें प्रसिद्ध है। उनके समयमें कुसूरमें एक बड़ा आलिम शरई रहता था। वह सर्वदा बुल्लेशाह साहबकी निन्दा किया करता था उनसे शत्रुता रखता था। उसने समस्त कुसूरके पठानोंको बहकाया कि, यह बुल्लेशाह बड़ा बेशरा है। उसकी बातोंको सुनकर सब पठान लोग शाह साहबके विरोधी हो गये। शाह साहब तो विरक्त थे, उनको मुसलमानी रोजा निमाजसे अथवा कर्मकाण्डसे क्या सरोकार था यह सब तो प्राकृतिक मनुष्योंके लिये हैं, विरक्त उसको क्यों मानने लगे? इस भेदसे प्राकृतिक जन अज्ञात हैं। वह मौलवी