कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसन्तोंकी बहुत सेवा शुश्रूषा होती थी, पर वर्त्तमानमें राजा प्रजा कोई भी साधु सन्तोंकी ओर दृष्टि नहीं करता, इस कारण भक्ति और साधु दोनोंही लुप्त हो गये।
संग्रह—साधुओंके विषयमें जो भी कुछ कहा गया है उसीका संग्रह इन नीचेके पद्योंमें दिखाये देते हैं—
गजल—कसरतने कुतुब ख्वानी इबादतको हटाई।
योरपसे चली बाद अब इस हिन्दमें आई ॥
गुम्म ज्ञान किया है न रहा इल्म इलाही।
दिल दिया हलाहल रहा सब दलमें समाई ॥
मैं आकिल व मैं दाना बहर सिम्त सदा है।
मैं आलिमों आजिल हमादाँ हेच गदाई ॥
फिरते हैं बहर नामें कुतुब किस्से ख्वाना।
मुशर्रव मूअ सच जो किसीके दिलमें रहाई ॥
मजहब न कोई साधु गुरु कौन हे आजिज।
दिल भूत सभीको रहे जुल्मात दिखई ॥
मुखम्मस तरजीअ बन्द।
अमबाजका बहरमें तला तम्। भक्तिका नहीं कहीं महातम्।
शैतान् नफस मतिअ नजातम्। क्यों कर हो किसीको लाभ आतम् ॥
भक्तिके लिये है नोहे मातम्।
तालिम मरअक्स प्रेम व भक्ति। सिखलाते हैं लोग जीव जगती ॥
दुनियावी को बात खूब लगती। क्यों कर कोई पावे राहमुक्त ॥ भक्ति० ॥
कसरत जो हुई है कुतुब ख्वानी। हर सिम्त हजार बैठे ज्ञानी ॥
बतलाते हयाते जाबदानी। दिखलाते नजात की निशानी ॥ भक्ति० ॥
कोई करता है दावा खुदाई। कोई कहता है दायेमूल जुदाई ॥
कोई कहता है कुछ न दर गदाई। पुर है बगुनः बअदाई ॥ भक्ति० ॥
सारे मुद्दमा बुजरुग भूले। गहवारये मौतमें सो झूले ॥
बे वजह यकीन करके भूले। कर चक्कर वर्ग ज्यो बगोले ॥ भक्ति० ॥
कोई मुद्ई वजझ जौशन। कहता मेरा दिमाश रौशन ॥
है हाथ मरे तफझ औ तौसन। मैं आकिल और जमाना कोदन् ॥ भक्ति० ॥
पुरसिस नहीं साधु और गुरुकी न फिके। हिसाब रूबरूकी ॥
अन्देशा न खुद खराब खोकी। परवाह नहीं साथके अदो की ॥ भक्ति० ॥