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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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आशय अलग अलग हैं, इनका गुण और प्रभाव भिन्न भिन्न है, सब मन्त्र इन्हीं अक्षरोंसे हैं। इन्हीं अक्षरों और मन्त्रों द्वारा सब दुःख सुख होते हैं। इन सब अक्षरोंकी माता एक अकार है। अ-इ-उ-स-व-म-ह-इन्हीं सात अक्षरोंसे लौकिक पारलौकिक सब व्यवहार ठहराये गये हैं। उत्पत्ति, स्थिति, नाश, कर्म, उपासना, योग, ज्ञान हरएक अक्षरके अर्थ प्रभाव और फल आदिक सब अलग अलग हैं। लोग प्रायः वेद और किताबोंको पढ़ते हैं पर अक्षरोंके अर्थ और आशयसे अचेत हैं। जिनको अक्षरोंका अर्थ और आशय न मालूम हो वे वेदोंको क्या जाने ? वह अचेत वेद भाष्य क्या करेगा ? दूसरोंको क्या समझावेगा। वह तो स्वयं अन्धा है दूसरोंको अन्धा करता है। जो अपने अन्धे गुरुसे भी थोड़ी बुद्धि रखते हैं, वे अन्धे कहते हैं कि, हमारे स्वामीजी वेदका अर्थ करते हैं, ऐसा दूसरा कौन कर सकता है। इस अन्धेके उपदेशको मान मान कर गुरु और चेले सब अन्धे कुएमें पड़े हैं। जब उनको भलीप्रकार सुधि हो और अपनी बुद्धि और समझके साथ विचार करें पक्षपातको छोड़ दें तो उनको सत्य असत्यका विवेक हो भ्रमसे छूटें। यह समस्त वेद और किताब जब मायासे ठहरें तो उनके द्वारा मायाके पार कौन जा सकता है, कौन गया ? यह सब विद्वानोंको भली प्रकार जानना पहचानना चाहिये कि, वेद किताब कहाँसे हुयीं ? सारी वाणी और वेद किताबकी माता यही है।

गजल—

उलमाको किये महो जो यह हूर परी है। सूरते सदहा उसने जमीपर जो धरी है ॥
कोई न सके सऊद कर कख ऊपरके। हर ख्वाँदाके पाय व जञ्जीर भरी है ॥
कोई हासिल कमाले अँग्रेजी किया है। कोई तुरकी व ताजी अरबी और दरी है ॥
सदहा हैं उलूम और फनून उनको फँसाये। लारैब गिरफ्तारीको उनके यह खड़ी है ॥
इसही में उलझ कर मरे उलमाय जमाना। आजिज किये दरकैद खुशकी और तरी है ॥

सबसेपहिलेकी वर्णमाला—पाठकगणको प्रगट हो कि, जितनी वर्णमाला हैं सबसे पहले संस्कृतकी वर्णमाला है। संस्कृतही सबका मूल है, शेष सब वर्णमाला उसीकी नक़ल हैं। संस्कृतकी वर्णमालाकी प्रणालीसे प्रगट है कि, किसी दूसरी भाषाकी वर्णमालाका ठीक प्रबन्ध नहीं है। महामाया कण्ठ स्थानमें रहती है, सब बोल और वाणीको ठीक करती है, सारे संसारकी पहुँच यहाँही तक है।

नलकीके तोतेका दृष्टान्त—विद्याभिमानी कहते और सुनते तो हैं पर उनकी समझ तोतेके समान है, उसीपर एक दृष्टान्त है कि:— एक साधुने