कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextबैल और १२०००० भेड़ें कुर्बानि की, खुदावन्दतालाने उसको दर्शन देकर बर्दान दिया । कहा कि, तेरे समान कोई बुद्धिमान् न हुआ न है और न होगा, वो सुलेमान ऐसा भोग विलासमें मग्न हुआ कि, उसका विश्वास ईश्वरसे भी फिर गया, अत्याचारमें लग गया ।
सब मायामें हैं—विचार करनेकी बात है, जिसने सुलेमानको बर्दान दिया था वह कौन था ? जो वरदान मिला वो क्या था ? यथार्थमें बर्दान देनेवाला और बर्दान, दोनोंही मिथ्या भ्रम और माया थे, इतने रक्तपातकी आज्ञा सच्चे ईश्वरकी ओरसे नहीं हो सकती क्योंकि, वह दयालू और करुणासागर हैं जिसने इतना भी विचार नहीं किया वो बुद्धिमान् नहीं हो सकता । यदि उन्होंने सहस्रों भाषायें की अनन्त पुस्तकोंको पढ़ लिया हो, तो क्या हुआ, सब मनाके बराबर हैं । कबीर साहिबने कहा है कि—
कागा पढ़ाया पीजरे, पढ़ गया चारों वेद ।
जब सुधि आई गूहकी, अन्त ढेहका ढेह ॥
श्रीकृष्णकी सम्मतिसे सबसे अन्तिम अश्वमेध यज्ञ महाराजा युधिष्ठिरने किया उस समय युधिष्ठिरका भाई सहदेव अपने समयका अद्वितीय विद्वान् था, वह श्रीकृष्णके सब भावोंको जानता था पर भाइयोंको युद्धसे न बचा सका ।
सब मायाका प्राकट्य है, उसीने सारे जगत्के मनको मोहित कर लिया है । सात करोड़ ७००००००० महा मन्त्र हैं वे सब उसी मायाके नाम हैं जो कुछ मायाके द्वारा प्राप्त होता है वो सब माया है ।
देखो देवीभागवतका ९ वां स्कन्ध सब सात करोड़ ७००००००० महामन्त्र और विराटरूप मायाकाही है ।
देखो देवीभागवतका ७ वां स्कन्ध ३२-३३-३४ अध्याय ।
जब देवीने अपना विराट रूप दिखलाया तो उसे देखतेही सब देवगण अचेत होकर गिर पड़े । फिर भगवतीने अपना वह रूप और प्रकाश गुप्त कर लिया । अपना मानवी रूप प्रगट किया सब देवते प्रसन्न होकर गद्गद कण्ठसे स्तुति करने लगे । देवीने कहा कि, हे देवताओ ! सर्व चराचर युक्त संसार मेरीही माया शक्ति द्वारा प्रगट होता है, वह माया मुझमें ही कल्पित है, वह सब नाशवान है । मैं अविनाशी हूँ ।
फिर इसी देवीभागवतके ९ वें स्कन्धके १३ वें अध्यायमें देखो । ब्रह्मा, विष्णु शिव, अनन्त, धर्म, इन्द्र, निशाकर, दिवाकर, मनु, मुनि, सिद्ध और तपस्वीगण, गङ्गाके लुप्त होनेसे निर्जलताके कारण प्याससे शुष्क कण्ठ तालूवाले