कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextहैं, प्राचीन कालसे अँकार पर बड़ा शास्त्रार्थ होता आता है पर अबतक निवटेरा नहीं हुआ ।
अंकोंपर विचार ।
पहले मैंने अक्षरोंपर लिखा, अब अंकोंपर लिखता हूँ । सब अंकोंके पहले (१) एक है । यह क्या है ? यह अद्वैत है ? सो द्वैतमें किस प्रकार आता है । इसका माथा गोल और उसके नीचे खड़ी लकीरका स्वरूप क्यों है ? इस खड़ी लकीरके माथेपर गोली किस वास्ते बनाई जाती है । यह एक है, यदि एक है तो दो क्यों बनाया जाता है । एकमें दो रूप होनेका क्या कारण है । यदि दो हैं तो दोनोंके अलग २ क्या नाम हैं ? ये दोनों सच्चे हैं कि, झूठ । यदि ये दोनों सत्य हैं तो जो कुछ कहा सुना जाता है सब सत्य है, यदि झूठ है तो जो सर्व पदार्थ देखनेमें आते हैं झूठ हैं, यदि यह सबझूठ और ठौर ठिकाने हैं तो वेदके उपदेशसे कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है । यदि ऐसाही है तो मुक्तिके लिये किसी ऐसे पदर्थ की आवश्यकता है जो इनसे भिन्न मार्ग बतलावे, तथा अनिश्चित और नाशमान पदार्थसे जिसका कुछ भी सम्बन्ध न हो ।
मुसलमान विद्वान् ।
अब मैं अरबी, फारसी विद्वानोंके बारेमें विचार करता हूँ, क्योंकि, ये लोग भी संस्कृतके विद्वानोंके समान अपनेको योग्य समझते हैं, थोड़े पढ़े लिखे सिद्ध माहात्माओंको तुच्छ दृष्टिसे देखते हैं । ये लोग अपनेको बड़े अकिलमन्द, जानी समझते हैं । इनमें भी दो प्रकारके लोग होते हैं, एक तो वे हैं जो धार्मिक कार्यसे सम्बन्ध रखते हैं । दूसरे सांसारिक व्यवहारसे सम्बन्ध रखा करते हैं । सो पहले मैं धर्म सम्बन्धी विद्वानोंका वर्णन करता हूँ ।
खुदा और उसका कलाम — जिन्होंने कुरान, हदीस और फ़िक्का आदिक पढ़कर योग्यता प्राप्त की है वे अपनेको पूरा समझते हैं, कुरान और हदीसके वचन को खूब बूझते हैं । कलाम कुद्सी खुदाके वचन (बनवी) नबीका कलाम दोनोंकी टीका करते हैं । हर किसीको पैगम्बरकी शरीअतका उपदेश करते हैं । इन महाशयोंसे केवल इतना पूछना है कि, जो खुदा शहरगसे भी निकट है फिर उसका कलाम जिबराईलके द्वारा क्यों आता था क्योंकि, जो निकट हो उसका वचन दूरसे आवे वह आश्चर्यकी बात है । सत्य तो यह है कि, जहां वचन कहनेवाला हो, वहांही वचन भी होगा । क्या खुदा जुदा उसका कलाम जुदा रहता था ?
शिरके अर्थका अभाव — दूसरी यह बात पूछनी (कुरानमें ११४ सूत्रते हैं सब सूत्रोंपर अक्षर (मुक़तआत या मुफ़रदात) लिखे होते हैं । जिस सूत्रके