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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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हैं, उनमें खुदाके देखनेके बाद प्रथमकी अपेक्षा क्या अधिकता हो गई ? मने तो कहीं कुछ देखा न सुना ।

गुणोंका भेद — यदि जो गुण बेटेमें थे वे बापमें होंगे तो निःसन्देह सभीने खुदाको देखलिया, यद जो गुण हजरत ईसामें थे वेही खुदामें ठहरेंगे तो खुदाभी मनुष्योंके समान दीन और अपराधी ठहरेगा, इस कारण गुण भेद भी मानना ही पड़ेगा ।

प्रकाश — १ बाबकी ४ आयत जीवन उसमें था वह मनुष्यका प्रकाश था, वह प्रकाश अन्धकारमें चमकता था उसे अन्धकारने न पहचाना । विद्या और अविद्या, ज्ञान और अज्ञान, प्रकाश और अन्धकार सब मायासे बनाये गये हैं । वह प्रकाश जो मनुष्यके जीवनका प्रकाश है । पांचतत्व और तीन गुणका प्रागटच है । वह अंधेरेमें चमकता है उसको तत्वदर्शी लोग देखते हैं साधूलोग गुफों में बैठते हैं उस प्रकाशको अंधेरेमें देखते हैं । वह अंधेरेमें स्पष्टरूपसे दीख पड़ता है । जो जो स्वरोदय साधते हैं जो उसको पूर्णतातक पहुँचाते हैं उन्हें सब हाल प्रगट हो जाता है । जो जगतके जीव अज्ञानके अन्धकारोंमें फँसे हैं वो उस प्रकाशको नहीं पहचान सकते, वही शब्द समस्त संसारमें प्रकाशित है ।

विभाग—वही शब्द तीन भागोंमें विभक्त हुआ, जिसको “तसलीम बोलते हैं” एक अद्वैत जो है वो अविभाज्य है । जिसका भाग्य होता है वह माया है एक अद्वैत कदापि विभाज्य नहीं । अद्वैत परमात्मा न कभी विभाज्य हुआ न चर्म दृष्टिसे देखा ही जाता है । जिसने देखा उसने अन्तर्दृष्टिसे देखा अन्तरके श्रवणोंसे सुना । ो कुछ आँखोंसे देखा जाता है यह माया है मिथ्या है भ्रम मात्र है । यदि ईसाइयोंसे पूछा जाय कि, वह कौनसा शब्द है ? ओ खुदासे उत्पन्न हुआ, तो कोई कहते हैं कि, वह शब्द ईसा है—भलाजी ! ईसा तो मरियमके गर्भसे उत्पन्न हुये थे. खुदाकी ज्वानसे कहाँ ? यदि ईश्वरके मुखसे निकल पड़े थे तो उस समय उनका रूप क्या था, फिर क्या हुये ? जो शब्द खुदाके मुखसे पहले प्रगट हुआ था उस शब्दको ईसाइयोंमें कौन जानता है कौन मण्डली उसका उपदेश करती है ? ईश्वरके ज्ञानमें बुद्धि अनुमान किसीकी भी पहुँच नहीं । फिर वहां शब्दकी किस प्रकार पहुँच हो सकती है ? मुसल्मानोंका ईश्वरी ज्ञान मूसाके ईश्वरी ज्ञानके ऊपर हो चुका है, वही ईसाका भी है ।

जितनी पोल देख पड़ती है वह सब वायुसे भरी हुई है जब गतिमान होता है तब नानाप्रकारके शब्द होते हैं, जिसको कान सुनता है. क्योंकि, शिथिल वायुमें चञ्चल वायुके प्रवेश करनेसे स्वाभाविकही शब्द निकलता है इसी प्रकार अवघात