Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 1036 of 1367

Read in context
Page 1036

अपनी २ जगहमें, अद्वैत और एक हैं क्योंकि, एकके समान दूसरा कदापि नहीं। फिर खुदाकी भक्तिकी कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि, ईश्वरोंके सामर्थ्य और ऐश्वर्यमें भेद है, कोई अधिक है कोई कम है। मूसाके अनुयायी प्रायः बुत्परस्ती कर करके खुदाके कोपमें पड़े, यदि वे एक अद्वितीयकी भक्ति जानते तो बुत्परस्ती क्यों करते? सुलेमान जैसा बुद्धिमान् तत्त्वज्ञ और खुदाका प्यारा जिसको कि, खुदाने तीन बार दर्शन और बहुतसे बर्दान दिये थे वह खुदासे विमुख होकर बुत्परस्तीमें फँस जावे? यह सम्भव नहीं कि, जो कोई एक परमात्माकी भक्ति जाने, वह फिर बुत्परस्तीमें फँसे। इसी कारण समस्त इव्रानी धोखेमें पड़े हुए बुत्परस्तीको खुदापरस्ती समझ रहे हैं।

तीनों तुच्छ हैं—सुलेमानने जब अपने बाप दादेका राज्य पाया, खुदाने उनको दर्शन देकर कहा कि, ऐ सुलेमान! तुझको पैगम्बरी, राज्य और तत्त्वज्ञानमें तीनों पदार्थ प्रदान करता हूँ, तेरे समान न कोई हुआ न होगा। जिस दशामें कि, खुदाने सुलेमानको ये तीनों पदार्थ, प्रदान किये उस दशामें भी सुलेमानको इतना विचार नहीं हुआ कि, अपनेको अयोग्य कर्मसे बचावे। इससे प्रमाणित होता है कि, ये तीनों पदार्थ तुच्छ हैं। ईश्वरीय ज्ञान (आत्मज्ञान) के तुल्य कोई दूसरा पदार्थ नहीं है।

हज़रत आदम सब पैगम्बरोंमें श्रेष्ठ तथा खुदाके प्यारे पुत्र हैं, ये खुदा उनके साथ वही भलाई करता था जो कि, पिता पुत्रके साथ करता है। खुदाने मना किया कि, ऐ आदम! तू इस वृक्षका फल न खाना, सावधान रहना, शैतान तेरा शत्रु है। वाह! फल खाना तो मना किया शैतानको शत्रु भी बतलाया पर इतना ज्ञान नहीं दिया, जिससे आदम शैतान तथा उसके कपटको समझ सकता। इससे यह सिद्ध होता है कि, उस खुदाको ज्ञान देनेकी सामर्थ्यही नहीं थी, अथवा आदमको छलसे भिन्नितसे बाहर करना चाहता था। खुदाका यह कर्तव्य दो बातोंसे पृथक् नहीं, एक तो कपट, दूसरी ज्ञान देनेकी असमर्थता। जब खुदाहीकी यह दशा हो, तो अपने भक्तोंको मुक्ति किस प्रकार दे दे किस प्रकार अँधेरेसे निकल सके।

२ बुत्परस्ती मत करो—अब जानना चाहिये कि, काम कामनासे शरीर-धारीकी भक्ति करनेका नाम बुत्परस्ती है, वे जड़ हों अथवा चैतन्य जीवित अथवा मृतक एकही समान है। मूसाका खुदा कहता है कि, “बुत्परस्ती मत करो” इसका यह आशय हुआ कि, जो तुमारे दृष्टिमें मेरी प्रतिमा है, उसकी पूजा करो दूसरेकी न करो क्योंकि, मैं बुतों (प्रतिमाओं) में श्रेष्ठ बुत हूँ। सब