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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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प्रकृति सहन नहीं कर सकती दूसरे वे नियम हैं जो नियतिके नियंत्रणोंके ही परिस्फुट रूप हैं।

ईश्वरीय नियम ।

ईश्वरकी आज्ञा उसकी प्रकृतिके नियमोंके विरुद्ध कभी नहीं हो सकती। क्योंकि, प्रकृति उसीकी है उसीके जिम्मे संसारका निर्माण है अर्थात् उसीसे सब कुछ बना है। इस बातमें किसी भी ईश्वरवादी या खुदाबादी व्यक्तिको इनकार नहीं हो सकता कि, यह दुनिया जगदीशकी बताई हुई है फिर उसके मुखके कहे नियम उससे विरुद्ध कैसे हो सकते हैं? इससे हम इस निश्चय पर पहुँचे हैं कि, जो प्राकृतिक नियमोंका विरोध नहीं करते वे ईश्वरीय नियम हैं वही परमात्माके कहे हुए हो सकते हैं किन्तु जो प्राकृतिक नियमोंका विरोध करते हैं वे नियम परमात्माके बताये हुए नहीं हो सकते चाहे वो किसी भी मजहबके लोगोंने खुदाके भेरे कहकर अपना रखें हों।

परीक्षा ।

पहिली परीक्षा तो यही है कि, वे प्रकृतिके नियमोंके विरुद्ध न होने चाहिये। दूसरे उनमें अपनी आत्माकी सच्ची भावना भी ओतप्रोत होनी चाहिये। जो बात अपनी आत्माके सच्चे स्वरूपके प्रतिकूल हो वह कदापि धर्म नहीं हो सकता। तीसरी बात वह है कि, सबसे ईश्वर वादियोंका परमात्मा है। वह एक है अनेक नहीं हो सकता उसकी आज्ञा एक होगी जिसमें जन साधारणका हित निहित रहता है। यह काम परमात्माका नहीं हो सकता कि, एकको एक काम करनेमें पाप बता दे तथा दूसरेको पुण्य बतावे, उसकी आज्ञा सब मनुष्योंके लिये एक है जो सब धर्मोंमें अदुःखदायी एकसी बात है वही परमात्माकी आज्ञा है दूसरी परमात्माकी आज्ञाएँ नहीं हो सकती किन्तु वे केवल स्वार्थकी भावनासे सनी हुई बातें हैं।

धर्म क्या होता है? धर्म किसे कहते हैं? जब तक यह बात न जानता हो तब तक निकट रहने तथा अति उत्कट सम्बन्ध होनेपर भी उसको पहुँचानना कठिन है।

धारण—संसारमें नानाप्रकारके धर्म प्रचलित हैं। सब कोई अपने अपने धर्मकोही धर्म कहता है उसीको पसन्द करता है। दूसरे धर्मोंको बुरा समझता है। बहुतेरे तो ऐसे हैं जो अपने बाप दादेकी रीति, रस्म और तरीकोंकोही धर्म माने बैठे हैं। इसी प्रकार सब अपने अपने राग गाते हैं पर जबतक अपना सच्चा धर्म न जाना जाय तब तक पशु और मनुष्यमें कुछ भी विभिन्नता नहीं है। यहाँ