कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
About this granth
Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.
Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.
The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.
५२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा--कहैं कबीर कृष्णसे, मनमो राखो धीर ।
आगे वीरा देव तोहि,हमार अंस तुम वीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास कबीर हर वंसा । सबके मूल कबीर निहसंसा ॥
अपने मन सब सदुरु चेला । सदुरु शिष्य जेहि नाम थिला ॥
हम सब सदुरु निंदे सुनि जेतै । सबके सदुरु कबीर गति देतै ॥
रवि प्रकाश भौ तिगिर नासा । कीतम त्रिगुण तिगिर तन भासा ॥
निर्गुण भक्त प्रकाश रवि जाना । निरगुण सरगुण माहिं समाना ॥
निर्गुण स्वासा सरगुण देहीं । यमसे बांचे कबीर सनेहीं ॥
कबीरवचन ।
दोहा--कहैं कबीर हम सब घट, राम रूप तन स्वास ।
स्वासा पुरुष नार तन, स्वासा विकसत न नास ॥
व्यास सुखदेव वचन
कहैं व्यास सुखदेव कर जोरी । यम तन कांच जीव बंदी छोरी ॥
यह तन विनसत बार न लगे । ना जानो स्वासा कब वागे ॥
कपिलमुनि गाय सो तुमहि बचाया । जो बांचे सो कबीरकी दाया ॥
दीजे सुख पान मोहिं आतुर । सुखे प्रथम चेतै सो चातुर ॥
वाघ निरंजन सब जिव गार्ई । सवा लाख नित खाय कसाई ॥
सो जिव बांचे काल तुम आसा । नाम कबीर जाहिपर बासा ॥
दोहा--एक ठांव बन कपिल मुनि, दूसर स्वास सुखदेव ।
सब जिव प्रासे वाघ यम, तुम कबीर लख लेव ॥
तब कबीर जिव उपजी दाया । मानिद पान सो सबहिं खवाया ॥
मनका वर्णन - मनकी ४० प्रकृति
कवीरकृष्णगीता ।
५३
कवीरवचन ।
कहैं कवीर निःशंक अव होहू । निरंजन वाष न आसे तोहू ॥
अव तुम सुनहु और एक वाता । प्रथम गुरुहैं पिता औ माता ॥
रज बीज माता पिताके चोला । पुरुषअंश तेहि तेज अमोला ॥
पांच तत्व प्रकृति पचीसा । चौदह यम त्रिगुण तैंतीसा ॥
रोम २ सब आरि तन जिवके । तन मन काल मार वल पिवके ॥
दोहा--चालिस सेरको मन भयो, चालिसमहैं एक सार ।
एक सांच सब झूठा, स्वास सार तन छार ॥
गुप्त प्रगट दस इंद्री लखहू । पचीस प्रकृती तैंतीसा भाषहू ॥
गुणभा तीन मिले अठतीसा । अक्षा अंस एक मन दीसा ॥
भाउं न चालिस चालिस जीऊ । जीवके सत्यनाम है पीऊ ॥
जीव अमर सो अमर कवीरा । सत्यकवीर सुक्त मन हीरा ॥
शरे तत्व औ गुण प्रकृती । अमर सो हंस पुरुषको रीती ॥
पांच अफीके काया बाहर । अमरलोक आसन तेहि ठाहर ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश जग अधपत । अधपतकी मत क्रीतम मलगत ॥
निरंजन पुनि तन घर मरऊ । ऊंच नीच बहु क्रीतम कियऊ ॥
अजब दिल निरंजन नाऊ । नाना रंग बसाये गार्ऊ ॥
अहंकार बस राहु अलाहू । ताते कोई न पावे थाहू ॥
कुमत कुसंग क्रोध अध चाली । ये सब विकट निरंजन माली ॥
आप निरंजन अल्लह कहाये । अजानिल्ल एक और बनाये ॥
दुनिया अजजिल्ल जग जानो । असल अजानिल्ल प्रभुको मानो ॥
गुरु और गुरुओंका वर्णन
५४
कबीरकृष्णगीता ।
तुरक अजानिल्ल हिंदू धर्मराई । है भक्षक रक्षक नहि भाई ॥
आप अजानिल्ल अलह कहलावा । अलह अलाहकी रूप छिपावा ॥
जीव का करे काल छल कीन्हा । जीव भुलाने खसम न चीन्हा ॥
जीवके खसम सो अमर कबीरा । विन परचे धरे धर चीरा ॥
देवा देवी जार गवारा । सटुरु खसम सो अमर भतारा ॥
असछी सटुरु सत्य कबीरा । नकली सटुरु बहु भौ भीरा ॥
बोरहिं शिष्यको नरक मंझारा । कहहिंके भौजल पार उतारा ॥
वेद पुराण कुराण पढ़ै सब । गुरुभत त्याग मनमत गहै सब ॥
वोर छोर गायत्री माहीं । सत्य दया तेहि माहे दढाहीं ॥
पंडित काजी यमके अगुवा । आप बाल बालें पछ लगुवा ॥
द्विजके कहे चले संसारा । सो द्विज मनमत बात अपारा ॥
कलयुग आवत है चल भाई । लै २ पान लोक बलि जाई ॥
करिहै निरंजन कलिय विचारा । वट२ कुमत उपजहि संसारा ॥
ब्राह्मण कलिमें मछरी खैहैं । विष्णु देह धर नरके जैहैं ॥
धरिहैं निरंजन रूप मलीक्षा । गऊ विगहिं दुख देहिं अदीक्षा ॥
बडा प्रपंच करि है जिव लागी । अनंत रूप धर नट बट पागी ॥
दोहा—चोरी और छिनारी, आमिष भष जिव घात ।
यह सब करिहैं निरंजन, जीवन वड उत्पात ॥
काजी रूप निरंजन पांडे । एके काल दोऊ घर भांडे ॥
एके विष्णौ दुतिय दूबे । त्रिविध तिवारी पांडे चौबे ॥
छठयें सतयें अठयें नौवें । दसयें दस प्रकार द्विज सोमे ॥
कबीरकृष्णगीता ।
५५
नौवैं नौ नारी प्रमोधा । दसवैं दस द्वार जिन सोधा ॥
अठवैं अष्ट कमल जो भिन्ना । सतयै सत्य वाक गहि लीना ॥
षट्ये षड्स त्यागे भाई । पाठै पचर्यै वेद पढाई ॥
चौवै चार वेद जो राता । तिवारी त्रिगुण देव भगु माता ॥
दूवै दुवधा दूर बहावे । एक असल सत्यनाम समावे ॥
एक सो जन कबीर विष्णो गता । दयाशील पतिपाल अगतगत ॥
व्यास सुखदेव वचन ।
कहे सुखदेव व्यास कर जोरी । कहहु चौरासी केतिक खोरी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । चार खान चौरासी लक्ष होई ॥
नौ लख जलमो जीव समाना । चौदह लक्ष पंछी परवाना ॥
ऊमि कीट सत्ताइस लाख । तीस लाख स्थावर भाषा ॥
चार लाख मालुष तन जाना । मालुष देह परमपद जाना ॥
चार खान अब सुनहु व्यासा । चौरासी चार निरंजन फांसा ॥
अंडज पिंडज ऊष्मज अंकुरा । चार खान जिव एकहिं पूरा ॥
पुरुष दीन्ह जिव अम्बर चोला । इच्छारूपी उडुगण खोला ॥
सौ चोला को निरंजन पैन्हा । नरक कलमा काया जिव दीन्हा ॥
भये असतो निरंजन जबते । आनके आप लियो अब जबते ॥
कुमत असत जिव घात निरंजन । जिव पालक सतनाम सो सज्जन ॥
आपन जनमल ताहु दुखदाई । त्रियसुत निराकार निज खाई ॥
कहेो जीव कैसेके बांचे । सत्यनाम विन यमघर नांचे ॥
मीन भक्षककी गतिका वर्णन
५६
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुवचन ।
उठके कृष्ण केहं कर जोरी । कल भखमीन कौनगति मोरी ॥
मीनरूप है विष्णुके स्वामी । जीव भक्षकके कस गत कामी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कधीर सुनो भगवाना । मीन भक्ष गडघात निदाना ॥
परनारीरत नरक अधोरा । लोहू पीव भिक्षा मह बोरा ॥
द्वादश तेहि योजन भौसागर । भिक्षा मूत्र कमि दचागर ॥
नरकको कुंड सात यम कीन्हा । घोर नरक भौसागर चीन्हा ॥
भिक्षाकुंड ॥ १ ॥ मूत्रकुंड ॥ २ ॥ रावीकुंड ॥ ३ ॥ रक्तकुंड ४
खरवारकुंड ॥ ५ ॥ नासिकामलकुंड ॥ ६ ॥ धातुकुंड ॥ ७ ॥
सुनहु आठे अग्रिकुंड ॥ ८ ॥ पांचसौ ते रे बडे सुंड ॥
पांचसौ योजन चकराई भाई । लक्ष योजन के हैं गहराई ॥
भौसागरका भंवर भयावन । बूडे पापी अधिक अपावन ॥
राम चीन्ह पुन चीन्हे नामा । सत्यनाम सो सुखके धामा ॥
सत्यनामको वेद न जाने । निराकार कह वेद बखाने ॥
निरंजन के स्वासा ते आयवेदा । आगे कैसे जाने भेदा ॥
वेद नीत बहु विमल बखाने । तांत्रिक घात सुनी मन जाने ॥
दोहा-वेद मते वैकुंठ मिल, दया भाव सतसंग ।
तांत्रिक नरक बुडावे, वैदिक रामप्रसंग ॥
परे बाढ मछरी जस भाई । सलिता बूडे मीन उतराई ॥
पलटत पानी चले जो मीना । परे सलिठ नीको तिन कीन्हा ॥
देहैं लोभ चारा बहुताई । परे फांस मन मति अरुझाई ॥
जीव बधनेका पाप
कवीरकृष्णगीता ।
५७
यह विध सिरजन बट जिव आये । यहां निरंजन कीर वझाये ॥
छिन्न सुखदे सब सुख हर लीन्हा । अन्मर जन्म जीव नहिं दीन्हा ॥
कहा करो जो काल नसायो । विना पेयादा दाय न पायो ॥
कहैं कवीर जो संतका द्रोही । निश्चय काल गरासे बोही ॥
कोटिन जीव वधे कर पापा । तेहि जो अजिया सुख एक लापा ॥
अजियासुत दूध भाई दौई । सो सांचा जिन शब्द विलौई ॥
सद्गुरु शब्द लखे अरि हीता । सब भक्षक एक सद्गुरु मीता ॥
जो जेहि काटे सो तेहि मारे । मारन छल तेहि काल सुधारे ॥
कोट बालक वधे एक त्रिया बालक । कोट त्रिया वधे पाप एक गायक ॥
कोट गाय वधे एक झख सार्व । झख मछरी कोटिन बुधतार्व ॥
कोटिन पाप बसे तेहि माहीं । विप्रघातसम पातक तार्व ॥
कोट विप्र वधे विष्णव एका । विष्णव वध होय पाप अनेका ॥
जीवत महितन भरत प्रतमाळा । तब तक नरक भोग बस काळा ॥
मालुष तन धर भक्त न कीन्हा । भक्तही बूढे कमीना ॥
सद्गुरु भक्त प्राप्त जिव होई । कहैं कवीर सतलोक गये सोई ॥
सद्गुरु भक्त प्राप्त बडभागी । बडे भाग्य बैरागी अलुरागी ॥
जन्म अनेक तब पुण्य कमाई । होय मास बासी सो जन्मे आई ॥
बनवासी न करे विवाहा । काहु पुरुष सुख दधि न बाहा ॥
सात जन्म जो सततन राखा । तब सो सब पुरुष पत भाषा ॥
सात जन्म सो पियासंग जरई । तब सो पतिव्रता औतरई ॥
सात जन्म पतिव्रत कमावे । सत्तभक्त कर सद्गुरु पावे ॥
सात जन्म करे गुरुसेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥
४
कबीरसाहबसे दर्शन देनेके लिये सब देवताओंका प्रार्थना करना
५८
कबीरकृष्णगीता ।
तीरथ वरतका तेजहिं आसा । गुरुके चरण केवल विश्वास । ॥
घात झोह तजे परनारी । आग्नि तजे ले बिसम विचारी ॥
हंसहि रंभर लोकहिं जाहीं । विष्णु सतगुन गुरु तारहिं ताहीं ॥
सतकबीर हंसन गते होई । सत्यकबीर निज सद्गुरु सोई ॥
गुरु सद्गुरु परमगुरु लोई । कहै कबीर अब गुप्त हम होई ॥
प्रगट होउं जब इच्छा तोही । मैं तो जात अबहि जग सोई ॥
एक बेर अब पृथ्वी जाऊं । यम सिर तोंड जीव सुत्काऊं ॥
सब मिल सुमरो सद्गुरु नामा । छांडहु कीतम देय सो वामा ॥
रामनाम सद्गुरु प्रवाना । सद्गुरु सत्यकबीर निरवाना ॥
सद्गुरु गये काल अरहैरा । ज्ञानधनुष कर ध्यान पवैरा ॥
मोरेउ मन माया अभिमानी । तारेउ साधु संत गलतानी ॥
तीन लोक बनकाथा भयऊ । तेहि मह बाघ सिंह ठग रहैऊ ॥
सत्यकबीर जो होय सहाई । तौन जीव यम जीत वनाई ॥
व्यासवचन ।
कहै सुख व्यास कृष्ण सो रोई । सत्यकबीर सम और न कोई ॥
दया करेहु तम कृष्ण गोसाई । सत्यकबीर कहैं लेहु बलाई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं खनंग आरि व्यास समेता । कहैं कृष्ण अर्जुन समहैता ॥
कहैं कृष्ण सतनाम कबीरा । न्यारा व्यापक सकल शरीरा ॥
दोहा—तुमहिसे सब प्रगटे, तुमते सब विस्तार ।
निराकार सिर मर्दन, सो कबीर औतार ॥
देहु दरश सत्पुरुष अनादी । तुव दर्शन विन जरो ब्रह्मादी ॥
कपिलमुनिका पान परवाना लेना
कबीरकृष्णगीता ।
५९
प्रगट सत्यकबीर देहु दरशन । कहैं कृष्ण मोहि पर होहु प्रशन ॥
कबीर दरश विन कृष्ण अधीरा । प्रगट भये तब सत्यकबीरा ॥
भौ वैकुंठ महा अज्ञानी । पुष्प विमान चढ़ि पहुँचे आनी ॥
भये सुवास वैकुंठ अंजोरा । सत्यकबीर देख चहुँ ओरा ॥
अधर विमान उत्तर नहिँ नीचा । आवत अभी सबनपर सींचा ॥
रतुत २ बोले सब देवा । अष्टांग दंडवत आशिष लेवा ॥
कहैं गरुड हरि होहु सवारी । उठ कबीरके चरणन पारी ॥
कहैं कृष्ण सुन गरुड सुजाना । अपना योग्य बात नहिँ आना ॥
हम सेवक कबीरके आही । स्वामीसे सरवर नहिँ चाही ॥
समर्थ अधरते करिहैं दया । इतना कहत आप प्रभुराया ॥
आय विमान वैकुंठ तेहि ठयऊ । स्तुति सकल देव मुनि कियऊ ॥
कृष्ण व्यास पंडो पगु लगे । चरण पखार सकल मिल पागे ॥
पूछहिँ ज्ञान कपिलमुनि देवा । सत्यकबीर कहु सत्यको भेवा ॥
दोहा—श्रोता वक्ता कौन घर, जब नर आवे नींद ।
शब्द विराजे कौन घर, पूछहिँ कपिल मुनींद ॥
कबीरवचन ।
सिद्ध जाहि दरबार महँ, ब्रह्मरंध्रके तीर ।
श्रोता वक्ता एक शब्द सुतसंग, मुनिसो कहैं कबीर ॥
कपिलमुनिवचन ।
कहैं कपिलमुनि मोकहैं तारो । निरंजन वाघसो मोहि उबारो ॥
हृदय जपिहों तुन्हरो नामा । जेहि दिन यमसों छोरैहु प्राणा ॥
रावणका वृत्तान्त
६०
कबीरकृष्णगीता ।
अब मोहिं करहु निकटक स्वामी । देहु पान प्रभु अंतर्धामी ॥
आरती पान शरण लौलाई । आदि अंत डर देहु छोड़ाई ॥
मोहि उबार सवनको तारो । काल मेट निज हंस उबारो ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर कपिलमुनि सेती । दैकै छोड़ लेय बढनेती ॥
कोइ दिनके आगे होय ऐसा । तुम कपिल मुनि भाखेहु जैसा ॥
अब तुम पान लेहु त्रिण तोरी । लेव कालके सुखसो छोरी ॥
तारो सब जिव सहज सहज ते । सो पशु पंछी भूंग नर जेतै ॥
सहज आरती कर दीन्हो पाना । भयउ मुक्त कपिलमुनि जाना ॥
चरणामृत सीत प्रशादी । लियो कपिलमुनि भक्त अराधी ॥
मगन भये सब संशय नाशी । सत्यकबीर मिले अविनाशी ॥
कहैं कबीर सुनो कपिलमुनि । हमरे नाम सुरत लायो धुनि ॥
हमरे नाम जप काल न पाई । हमरे नाम बिन काल चवाई ॥
जैसे रावण तप नित कीन्हा । दशाशिर काट शिवहिं नित दीन्हा ॥
मगन भये सेवा वश रुद्रा । दियो लंकागढ़ खाही समुद्रा ॥
कीन्हो कैद रावण सब देवा । सबै देव करें रावणकी सेवा ॥
रावणके मन गर्व सुहाती । एक लख पुत्र सवा लख नाती ॥
दश शीश बीस भुजा लख गाजा । कहे रावण मोहि समको राजा ॥
करता गर्व करें सो छाजा । सो करता संतन पगु माजा ॥
कहैं कबीर जिन कियो गर्व छल । सत्य भक्त बिन परे नरकमल ॥
रामचंद्रसो ताहि हताये । सब परवार रिष नगर रिताये ॥
कलि युगके धर्मका वर्णन
कवीरकृष्णगीता ।
६१
बांचे भक्त ठांन विभीषण । हंकारी प्रले भो सब जन ॥
तस छल गर्व निरंजन कीन्ह । जोग जीत तवहीं शिर छीना ॥
ताते भक्त करो मन लाई । सत्यनाम भज सब सुखपाई ॥
रामचंद्रके हृदय कवीरा । कृष्णके शीश गंभीर कवीरा ॥
ताते राम कृष्ण जग जीता । नाना रंग जुगन जुग कीता ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माही । थोडे पाप बहु पुण्य कमाही ॥
कलयुग पाप करिहैं बहु लोग । सुख किंचित् ताते बहु रोग ॥
दोहा-ब्राह्मण औ संन्यासी, काजी प्रजा झार ।
सब होइहैं आमिषभष, कोटि माहिये न्यार ॥
कलिके भूप कहैं गउ बंदा । प्रजा दुख दे आप अनंदा ॥
राजा तबलग भोगिहैं राजु । जबलग दान पुण्य व्रत साजु ॥
पुण्यहीन नृपत जड जुडा । पुण्य घटे राजा बिन सुढा ॥
पुण्य कीन्ह बहुते एक साकट । गुरु बिन सकल पुण्यभौकरकट ॥
कलिमहँ पतिव्रता बहु नाहीं । सर्ता यती गुरुभकविरलाअहीं ॥
पतिव्रता विश्वा कलि गारी । विश्वा सो जो बहुत भतारी ॥
दुनियाके पतिव्रता पत भजी । साधु सो जो पतिव्रत सजी ॥
गुरु सोई सो अंतहु मीठा । जन्ममरण गुरु लागहि सीठा ॥
दोहा-पतिव्रता सोइ जानिये, जो अपने पतिरात ।
अपना पति सोइ जानिये, जो कहै अमरपुरवात ॥
अमरदुलहिनअमरवरचाही । जीव अमर सत्पुरुषके व्याही ॥
सत्पुरुष अमर अमरापुर । तहँवा काल जंजाल दुख दुर ॥
६२
कबीरकृष्णगीता ।
सोई पुरुष संत्यनाम कबीरहम । हमरे डर डरें निराकार यम ॥
कहे कबीर हमरे सब कीन्हा । ताकर तोहि बताऊँ चीन्हा ॥
जाकर अंस दरद तेहि होई । गुरु विन राखनहार न कोई ॥
गुरु सोई जो भौते न्यारा । नहिं कुछ जातपात व्योहारा ॥
पूजे विन पूजे सुख माने । पूजा परम भक्त रत जाने ॥
कृष्ण सुनो गुरुमतकी वाता । गुरु संत करता पिलु भाता ॥
सबके गुरु अमरापुरवासी । कलिं प्रगटहिं डासातनकासी ॥
दास कबीर सोई सतनाया । कहें कबीर हमरे सोह कामा ॥
कहें कबीर बडा जो होई । होय गलतान प्रेम बस सोई ॥
पेटे गर्व करे छूंचेपर । गर्वके सीसा वा देखे धर ॥
छूंचे गर्भ बला शिव कीन्हा । संत्यनाम लखि सुरतन दीन्हा ॥
विष्णु सतो गुण कछुलखि पावा । ताते हमसों प्रेम बढावा ॥
विन कबीर जिव कोई न तारे । श्रीकृष्ण यह वचन उचारे ॥
कहें कबीर सब जीव है मोरा । करिहों जीवन बंदीछोरा ॥
सब जिव आहिं हमारीव्याही । विन परचे यमके सुख जाही ॥
पिया तज भये जार जम जारी । जार भजे बूढ़हिं भ्रम भारी ॥
जगकरजीवन नामसो सांचा । सोई नाम विदेह सुख रांचा ॥
सरगुण पांच तीन बस देहा । तासु परे है नाम विदेहा ॥
देह विदेह सकलको मूला । सोई सत्य कबीर हर बोला ॥
व्यास सुखदेव कपिल वचन ।
क हँव्यास सुखदेव कपिलमुनि । पतिव्रता सद्गुरु सेवक धनी ॥
राजा दण्डपालके पुत्रोंकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
६३
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सुन विष्णु व्यासा । सुनहुकपिलसुनिपतिव्रतभासा ॥
पुरब कुण्ड होय पतिव्रता । प्ररब कुर होय बहु भरता ॥
बहु भरता बेविचारी नाऊं । पतिव्रता शुभ चार कपाऊं ॥
राजा एक रहो दुगपाला । ताके गृह जन्मे दोह वाला ॥
कीन्ह व्याह दोनोंके ताता । बेविचारीकेमनस्वामीगहिंरता ॥
बेविचारीके स्वामी अनारी । कोहवर कछु न दीन्ह चिन्हारी ॥
सुभिचारी पतिव्रताके स्वामी । मनमो तर्क कीन्ह गुरु त्राणी ॥
पतिव्रताके स्वामी मन कहा । मैं जैहों देसंतर जहां ॥
तिबइ कीन्ह देहु कछु आजू । तब पुन होइहै दंपत काजु ॥
दंपति की पुरुषहिं कहिये । गुरुविनसुचिकबहुँनहिंलहिये ।
गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्ममरणगुरु विननहिं छूटा ॥
कहैं कुंभर सुन त्रिय पतिव्रता । चलि हैं दिसंतर तुम्हरे भरता ॥
अपने हांथ खवावहु मोही । भोजन चीन्ह देऊं मैं तोही ॥
मोर नाम ले वहू नृप अइहैं । हमार नाम ले तोहि खुले हैं ॥
दोहा--ताते कछु प्रशादके, मोकहैं आन कराव ।
जो आवे सो पुनि तेही, पूछिहौ भोजन प्रभाव ॥
सुनतहिं दुलहिन विकल भई मन । स्वामीके पग गिर करुणाकर ॥
बहुरि जोर युग कर युग रोई । तुम विन मोहिरक्षक नहिं कोई ॥
मोहि तजि पिया कितहु जनि जाहू । तुम विन मोर करे को निबाहू
मात पित बंधु परिजन जेते । पिय विन करकटदुर्जन भये तेते ॥
६४
कबीरकृष्णगीता।
मोहि त्रियहि गाडेहि चाहे डारी । केहि कारण पिय दिसंतर सारी ॥
व्याह करन चाहे सब कोई । नारि निवाह करे कोई कोई ॥
कहैं कुंअर सुभचार वैविचारी । सुनहु सुरत धर सीख हमारी ॥
कच्चा कली बन मधुकर योगू । तबलग मधुकर चिंताहि वियोगू ॥
हमरी तुम्हरी सुरत एक जानो । पिय गुरु वचन हृदयपर आनो ॥
नर होथ नारीके रँग राता । तिनको कोई न पूछे वाता ॥
नार सोइ जो कान न छोडे । मर्द सोइ जो एकोन न छोडे ॥
और काज हमरे कछु नाहीं । गुरु खोजन दिसंतर जाहीं ॥
गुरु विन काज कबहुँ नहिं होई । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर सम कोई ॥
करता आप जो तन धर आवे । तो गुरु विन नहिं जग यस पावे ॥
ना जग यश ना यमते छूटे । गुरु विन निराकार यम लूटे ॥
गुरु सोई जो निरंजन मारा । सो गुरु भौजल तारनहारा ॥
अमरलोक ले जिव पहुँचावे । त्रिगुण त्यागले चौथे मिलावे ॥
सोई गुरु जो अंतहू मीठा । गुरुते जन्म मरण सब छूटा ॥
ताते अब चित धीरज धरहू । मानहु वचन तुमहु गुरु करहू ॥
यह जीव है कहे सुष घरकैरा । कहे वेद सतलोक जिवढैरा ॥
सत्यलोकते सब जिव आया । निरंजनके डहन समावा ॥
निरंजनसो अधिक जो होई । ताके सुमरण बांचे लोई ॥
जाके ढर ढरे काल निरंजन । परम जोत सो काल शिर भंजन ॥
करुणा मैं कहाय जग प्रगटे । तिनके त्रास निरंजन हटे ॥
सोई अचिंत सत सुकृत सदुरु । सोई मुनींद्र त्रेता शुभ पग धरू ॥
कबीरकृष्णगीता ।
६५
दोहा—सोइ समरथ सत्यनामहै, तेहि प्रथम नाम कबीर ।
कलिके जिव तारन कारण, प्रगटहिं दास कबीर ॥
दास कबीर कलिमहैं कहाई । सत्यपुरुष जग प्रगटहिं आई ॥
तब यम सो छूटा हम भाई । जो कबीरके शरण समाई ॥
सुन पतवरता स्वामी कहई । गुरु विन मिथ्या सब जग अहई ॥
यात पिता सुत संपत्त दारा । स्वामी तन धन जोवन छारा ॥
जीवके स्वामी सांचा सोई । सो कबीर सदुरु दुख खोई ॥
हमहू लेव कबीर पंथ सीखी । तुमहू लेव कबीर हिय लीखी ॥
पतिव्रतावचन ।
कह पतिव्रता सुनो प्रभु स्वामी । कतहुँ स्त्री कहे पियसे दुरवानी ॥
स्त्रीके गुरु पुरुष जग कहई । पिया प्रताप निरभैं निरवहई ॥
पतिव्रता गुरु स्वामी सिखावा । और सबन गुरु भक्त हदावा ॥
कुंभर वचन ।
कहैं कुंभर हम तनके स्वामी । तुम अरधंगी व्याही वार्थी ॥
जीवके स्वामी सत्यकबीरा । तास शरण जिव व्यापे न पीरा ॥
करुणा मैं कबीरकी कला । कबीरके भक्त आद जे माला ॥
जो कबीर कलियुग ना प्रगटे । चले ना भक्त काल न हटे ॥
काल दोहाई कबीरके माने । और काहु यम नाहिं गुदाने ॥
बाले हरिश्चंद्र मोरध्वज राजा । जिनके सदा धर्म वरत साजा ॥
पांचो पंडव नरक गक्षो चाको । दानी करण महा अति बांको ॥
कहैलग कहौ तिहुपुर धर्मधारी । छलके सबहिं निरंजन भारी ॥
६६
कबीररुप्णगीता ।
जो कोइ शरण कबीरके लाग। ताकर दुख संकट सब भागा ॥
जिमि जग पतिव्रता शुभचारी । आदि पतिव्रता सद्गुरु व्रतधारी ॥
दोहा-सत्यकबीर विना जीव सब, कतहुँ संच न पाय ।
कहैं स्वामी सुन गुरुमुखी, पिय सत्यकबीर लौलाय ॥
स्वाधीके सिखापन ठियमहैं गुना। सुधावंत पिये लिखा दुख दूना ॥
पिया पगु टेक उठी श्रह ताका । रंगमहल मिल उरदक फांका ॥
जेहरकेर चुलह तिन कीन्हा । प्राणदानरूप घृत दीन्हा ॥
दीपक अग्नि वस्तर चूलह वारी । विनवर थार राख दल हारी ॥
ले स्वाधीके सन्मुख ठाडी । सलिता हगते वार अति बाडी ॥
“आज्ञा पाय धरेउ पिय आगे। बराबर दुइ भाग किहु कुंअर सुभागे ॥
एक आप लिय एक त्रिय दीन्हा। अपेण कर पुन भोजन कीन्हा ॥
दे खरचा पुन बीरा दीन्हा । सुख जूठन कुल्ला तब कीन्हा ॥
भये संतुष्ट जूठन देव दासी । हरिंत लेहु जो मिलि अविनाशी ॥
चरणोदक पुन प्रथमहिं लीन्हा । महाप्रसाद तब भोजन कीन्हा ॥
सुखसागर पिय दरश सुजानी । पिय विराहिन पिय दरश लुभानी ॥
लौंग जायफल पान मिलाई । बीरा रच देइ पियाहिं खवाई ॥
कहा कुंअर अब आज्ञा देहू । हम गवने तुव प्रतिव्रत लेहू ॥
यह सुन कुहकी मार धन रोई । कुहक सुनत धाय सब कोई ॥
मात पिता कह कुंअर नेवेली । गरे हार कर कुंअर चवेली ॥
रोई आन दुख बूझ सपाना । कहैं कुंअर चूप बोलिय आना ॥
हम कह परि ओर कछ धंधा । तुम सबके मन पापके संधा ॥
कुंअर सो बुध जान सब बूझा । कहा बुझाय तबे सब सूझा ॥
कवीरकृष्णगीता ।
६७
दोहा-ठांव २ सब सैना कहु, कुँअर सोइ अलसाय ।
पहिला भिन्न सार अगम पंथ, कुँअर धरे उठपांय ॥
निकसा कुँअर सत्तगुरु भापी । गुरु कर फिर आयो अस भापी ॥
निसरा कुँअर दिसंतर भारी । कुँअर जाग एक सर सेज पारी ॥
उठि अकुलाय अंगना भइ ठाई ॥ पियकी प्रीति अंतर्गत बाडी ॥
माय बाप कैंहें डांक जगावा । मम अभाग पिय तरिथ सिधावा ॥
रोर करे दुलहिन पिय लागी । पियके बोल हिये उठ वृह आगी
सये विकल होय रोवन लागे । कहैं नृपत कस रोवहु अभागे ॥
पठवहु मानुष पर आती । कुँअर होय पितु बंधु जमाती ॥
धाय बहुत खोज नहि पाये । नृपत समोव कुँअर समुझाये ॥
पतिवरताके स्वामी पूरा । सर्वस माग चेताय तेहि सुरा ॥
बेविचारी कर स्वामी कांचा । चीन्ह कछू नहि बोलिस वांचा ॥
वहां दिसंतर गयो कौने काजा । बेविचारी लिहे गौ दुतिय राजा ॥
बारह वर्ष बीत जब पूरा । आन कुँअर आवत वाजे तूरा ॥
कियो नृपत सन्मान बहूता । कस तन ठहरे ताके पूता ॥
पहिले पहर तेहि कुँअर बुलावा । पतिव्रता पट अंतर दियावा ॥
दोहा-पतिवरतासुं दुहि कहा, पूछ कुँअरकी बात ।
कौन वस्तु तुम खावो, पतिव्रता संग रात ॥
भगली कुँअर कहे भष भाता । बराबरी झकभास सुहाता ॥
कहे पतिव्रता यह नहि मम स्वामी । विदाई नहि कहैं लसकर जाही ॥
यही भांति भूप बहु भगली । पतिवरतहि ठग सके न नकली ॥
६८
कबीररुग्णगीता ।
भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥
नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती
गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥
जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥
गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥
बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥
तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥
सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥
पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥
कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥
सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥
बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥
सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥
पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥
परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥
कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥
यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥
परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥
कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥
कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥
यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥
कबीरकृष्णगीता ।
६९
पीछे लाग चली पतिव्रता । बहुर उचर दीन्हा तेहि भरता ॥
हम अब जात आह बरिआता । गुरु करव तो होन तुव साथा ॥
कहे कन्या गुरुदेव बोलाई । हमहू शरण सत्यनाभके जाई ॥
कहे कुंभर गुरुबंधु संग मोरे । तुरत पान लेहु तिनका तोरे ॥
भये जो मंगल अधिक उछाहा । तन गउवा मन जीवके व्याहा ॥
पतिव्रता कहे पियपद लागी । चल मंदिर मोहि करहु सुभागी ॥
तबलग मोर छुवा जिन खाहू । जो लगि मोहि गुरु शरण दिवाहू ॥
सुनत वचन पतिव्रता केरी । पाऊं परे कुँअर पगु वारी ॥
पतिव्रता गृह चल भौ स्वाभी । हर्ष चले पाछे पिय बानी ॥
मंदिर जाय पलंग सुभ डासा । फूल विछौना अधिक सुवासा ॥
पलंग बैठ पिय वचन उचारा । परआत्म कह दीन्ह अहारा ॥
दोहा—राजा कीन्ह सन्मान सब पुन, कीन्ह आरती साज ।
आरती होत सो मंगल, अनवन बाजन बाज ॥
सिंहासन बैठे कडिहारा । नरिअर मोर हंस निस्तारा ॥
तिनका जमते वेग तोडावा । दे प्रवाना जीव सुकावा ॥
पुन दे तिलक चरणोदक दीन्हा । कागते हंस रूप कर लीन्हा ॥
चरण टेके कीन दंडवत साता । सट्टुर दियो सीस तब हांथा ॥
दीन्ह प्रसाद नारियर गरी । बहुर प्रसाद नवहु देहु फेरी ॥
पुन सट्टुर तेहि सिखापन दीन्हा । सदा रहहु पिय चरण अधीना ॥
पतिव्रता सुन शब्द सिखापन । गुत प्रगट एक ब्रह्म पुरातन ॥
सत्यनामप्रति पिय गुण जानी । पतिव्रता पिय पद लपटानी ॥
कथाका सार दृष्टान्तका आध्यात्मिक अर्थ व निर्गुण भक्ति
७०
कबीरकृष्णगीता ।
चरण टेक पियसो कह बाला । हमहु देहु पिय तुलसीमाला ॥
दीनदयाल दिय भेष गुरुसेती । कहा करहु प्रसाद सुनेती ॥
पतिव्रता प्रसाद बनावा । सतसुछत कहैं भोग लगावा ॥
सद्गुरु कहैं पकवान पवाई । राजा निज कर बाव ढोलाई ॥
पतिव्रता पुनि स्वामि जिमावा । नाना व्यंजन थार भरावा ॥
हर्ष चूप प्रसाद पुन कीन्हा । सत्यनाम सुखसागर चीन्हा ॥
अचवन कर कुंअर असनादा । गुरुमुख किनका लेहु प्रसादा ॥
सद्गुरु कहैं सुनो पतिवरता । गुरु नारायण सम पिय भरता ॥
पतिव्रता पिय जूठ अहारा । औ चरणोदक सम वसु धारा ॥
दोहा—सब सुख पुर रहा तेहि, जेह घर पिय तन कंथ ।
वेनिचारी नष्ट गई, तेहिना मिले अध अंत ॥
बालापन पिय व्याहको, पिय जो गये विदेश ।
पतिव्रता पिय पाइया, विश्वा नरक प्रवेश ॥
कबीरखचन ।
कहैं कबीर यह जीवके लेखा । ज्ञानी होय सो करे विवेका ॥
तैसे जीव कंहैं जार झुलावा । काल निरंजन जार लखावा ॥
सत्यनाम सब जीवके पीऊ । निज पिय ताहि न चीन्हे जीऊ ॥
कृष्णव्यासवचन ।
विष्णु व्यास विनैवे कर जोरी । सत्यकबीर अगम मत तोरी ॥
सबके मूल तुमहि सतनामा । सब जीवनके तुम सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण मैं कबीर बल गाजौ । सद्गुरु चरण प्रताप विराजौ ॥
अर्जुन और कबीर संवाद
कवीरकृष्णगीता
( ७१ )
अब ऐसी दाय। प्रभु करहू । सब दिन तुम मम हृदय संचरहू ॥
जो तुम मम हिय करहु प्रकाशा। तब छूटे मम यमके त्रासा ॥
तुम विन को जिव राखन हारा । निरंजन जीवाहिं करे अहारा ॥
कहा करौ यमके डर दरपो। काल निरंजनके डर कपो ॥
अब मोहिं देहु सुकके पाना । यम त्रण ताडे करहु निरवाना ॥
हम सब तुम्हरे जाप पोषे । तुम जागे औ सब जग सोषे ॥
कवीरवचन ।
कहे कबीर सुन कृष्ण सुरारी । निर्गुण भक्त करे तेहि तारी ॥
निर्गुण आद अजर सतनामा । सद्गुरु सत्यनाम सुखधामा ॥
अर्जुनवचन ।
कहे अर्जुन सुन श्रीभगवाना । सत्यकबीर कर्ता निरवाना ॥
जीव कबीर साहेबके ठाहर । तेहि यम खाय जो कबीरसे ठाहर
कृष्ण वचन ।
कहे कृष्ण अर्जुन सुन वाणी । सतपद गहो कबहुं नहिं हानी ॥
सबसों कहौ कबीर है पहली । कबीरसो लगु सो रंग गहिली ॥
अर्जुनवचन ।
कहे अर्जुन हम हैं अज्ञानी । जेहि अब कर्म सोई अज्ञानी ॥
सोइ अज्ञानी शुभ पंथ न आनी। भ्रमत फिरे सदा अज्ञानी ॥
श्रीयदुपति मोहि दीन्ह चिन्हाई । तब हम कबीर पुरुष लख पाई ॥
दोहा--अर्जुन भीमाहि औ गले, भये युधिष्ठिर ठाठ।
सबदेवन कुल औ कृष्ण मिल, विनती कराहिं आति गाठ ॥