Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

Report a copyright issue

Devanagarihipublished168 pages

About this granth

Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.

Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.

The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.

Page 57Permalink

कबीरकृष्णगीता ।

४३

कबीरवचन ।

कहे कबीर देह धर देखौ । आप माहिं तुम सबहिं परेसौ ॥
कोट चंद्रके सोभा जिवके । नर्क देह धर सुख नहिं पिवके ॥
ऐसे समय हंस एक पूरा । सत्कबीर जये सो सूरा ॥
ठांका देह पूरा घट जाई । पुष्प विधान हंस बैठाई ॥
हंस सहस्र सठिहार बहुता । आसपास लागे सभ जुगता ॥
परिछन हंस विवान चढि आये । अधर धजा फहराय सहाये ॥
दोहा-वाजत वाजत सरस अति, होत अंजोर अपार ।
उतरे हंस वैकुंठ तब, नाम कबीर उचार ॥
भाये हंस वैकुंठ को जवहीं । अद्वुत चंद्र सूर्य उगे तवहीं ॥
चला हंस कबीर पगु पारा । मस्तक पग दीन्हा बलभारा ॥
सकल हंस परिक्रमा करहीं । कबीर चरण रज सिरपर धरहीं ॥

हंसवचन ।

कहे हंस कबीर यम बांचे । विना कबीर काल धर नाचे ॥
सदुरु मोकेह दीन्ह परवाना । सत्कबीर सभ गुरुकहैं जाना ॥
यम त्रिण तोड काल सुख भूका । पाय प्रवाना झगरा चूका ॥
सरगुण त्रिविध झगरा ठागा । तैतिस कोट देव सब भागा ॥
जेहि पूजहु सो कछु भल माने । बिन पूजे सब झगरा ठाने ॥
ताने निर्गुण भक्त अधारा । जप कबीर यमराजहिं छारा ॥

दोहा-धन्य कबीरको नाम है, धन्य कबीरको शरण ।
जो कबीर लौ लावे, ताको जरा न मरण ॥

कबीरका उपदेश

Page 58Permalink

४४

कबीरकृष्णगीत ।

चरण टेक चले हंस सुजाना । सत्यकबीर कहत घर ताना ॥
पुन वैकुंठ भये अंधियारा । बोले कृष्ण धन्य करतारा ॥
सत्यकबीर जन गुप्तहोय फिरहीं । तिनके दास ऐसे सुख करहीं ॥
सबे देव विनती अनुसारा । ले चलहु जहां अस उजियारा ॥

कबीरवचन !

कहे कबीर सत्यलोक जो जाई । अस उजियार जो तोहिं मिलाई ॥

दोहा--कर्म भर्म सब त्यागे, त्यागे जगके आस ।

सबमहैं एक ब्रह्म लखि, कबीर भजन सुखरास ॥
सबे कहें शोहिं दीजे पाना । यमसे जीव बचजाय ठिकाना ॥
कहे कबीर सुनो सब कोई । सदुरु सेय मुकफल लेई ॥
कहौं सो करौं सबहिं तब तारौं । जन्ममरण दुख दारुण टारौं ॥
सबे देव सुमरो रामके नामा । छांडो भूत प्रेत अब कामा ॥
जो जाको गुरु रामसो ताही । गुरुविन राम न तारेउ काही ॥
करहु भक्त दाया सत ठानी । अंस पृथ्वी तन घर भर नामी ॥
करु नित संतनकी सेवकाई । हृदय कबीर नाम जौलाई ॥
निरगुण सरगुण एक समाना । बीज वृक्ष विस्तार बखाना ॥
सुखमंडन पितु मातु जथाई । हृदय प्रीत पिव सदुरु साई ॥
जो कोई भक्त करे गुरुसेवा । सेवा भक्त सार पद लेवा ॥
अमृत सेवे अमृतफल लेई । विषतरु सेवे विष मिल लेई ॥
अमृतफल गुरुराम कबीरा । आगे तारव पुण्य शरीरा ॥
विन कौडी सौदा मिल नाहीं । गुरु विनको गहिहै पुन बाहीं ॥
गुरु सोई जो अंतहु मीठा । जन्ममरण सब लागे सीठा ॥

कलियुगका वृत्तान्त

Page 59Permalink

कबीरकृष्णगीता ।

४५

दोहा-जन्ममरण सरगुण गुरु, निरगुण अजर कबीर ।

शरण कबीरके जो गहे, सो बहुरन धरे शरीर ॥

कथा प्रसंग कहा सुनि व्यासा । भक्ति सुक्ति महिमा प्रकाशा ॥

भक्त सुक्त पंथ सत दाय। सत्यनाम भज अम्बर काया ॥

कहे कबीर सुनो विष्णु प्यासा । सत्यकबीर जपो हर स्वासा ॥

आद अनादिको नाम कबीरा । कल प्रगटहिं अघ नासन हीरा ॥

अब तोहिं अंत खोल हम कहा । सत्यकबीरजपकलिनिरवाहा ॥

ताहि न देउं मैं पान प्रवाना । जोजीवघातआमिश भषजाना ॥

दोहा-महापुनीत पवित्र जिव, गुरु भक्ता सोइ संत ।

पर आपन जिव एक लखे, ताहि कबीर मिल कंथ ॥

विष्णु-व्यासवचन ।

कहे सो विष्णु व्यास सिर नाई । कलयुग सुनिये जो आमिश खाई ॥

कहे कृष्ण कलयुग व्योहारा । कोइन करि है सत्य विचारा ॥

बूठहिं जगलग लेपवे साही । अतीत ब्राह्मणको धका दिवाही ॥

गुरुसे शिष्य सरवर करि बोले । तेहि दोष मरकट होय डोले ॥

गुरुके धन चौराय जो खाई । ताके घर फांसी सब जाई ॥

गुरुसे सरवर पितहिं दे गारी । साधुद्रोह जिवघात खुवारी ॥

जीवदयामय दाय। जानो । जीव घात मम घात बखानो ॥

काया विष्णु कंवल दल सोहा । भज कबीर गुरु पद मोहा ॥

सत्यकबीरको चाल निगारी । सुर नर सुनि गण जानेनहारी ॥

कलिमें होइ हैं प्रापत राजा । नृप बिगरे परजा अघ छाजा ॥

कलियुगमें तरनेका मार्ग

Page 60Permalink

४६

कबीरकृष्णगीता ।

कलिके ब्राह्मण काल सुभाऊ । अजिया सुतवष झस परखाऊ ॥
प्रथम मीन भवै विष्णु सरुपा । पैठ पताल जला अंधकूपा ॥
कुर्मके नखसों मृतुका आना । राई प्रवान मृतुका सो जाना ॥
सो मृतुका हरमुख विवलई । फेनसमान उठा जब कई ॥
लै फेन पवन जल लाया । शीर साठी तस पृथ्वी जमाया ॥
पृथ्वी सात औ सात अकाशा । कदलीखंभदल पृथ्वीपर चासा ॥
विष्णु जल थलमाहि समाना । विष्णु अन्न पान पकवाना ॥
जो मीन दैह पूरण कर सेवे । जलमह भात डारि कर सेवे ॥
ताके संतत भक्त गर होई । पूजे कछु मुख पावे सोई ॥
विठल ब्रह्मरूप है मोरा । बावन नरसिंह राक्षस बल तोरा ॥
परसरामचंद्र सो हमही । कृष्ण चौध निहकलंकका जवहीं ॥
नारद व्यास औ सबमें वासा । रजगुण तमगुण सहगुण वासा ॥
चौथा स्वासा कबीरको दासा । स्वासा पार सतपुर वासा ॥
पंचयै निरंजन जिव घटवारा । कबीर मोहर लख पार उतारा ॥
जो नहीं भये कबीरके दासा । ता कहै काल निरंजन आसा ॥
पुण्य लीन्ह रस त्रस जिव केरा । पुन्यमान जस तरे विव भेरा ॥
पापिहिं डार दिये यम खाई । जार खोर चौरासी भमाई ॥
पाप पुण्य महीं नाहिं उबारा । दया सत् परमारथ सुधारा ॥
नाम कबीर प्रताप उबारा । क्रीतम नाम जपेउं यम मारा ॥
आद नाम कबीर दुखहरना । क्रीतम त्रिगुण नाम तप मरना ॥
जन्म मरण दुख बडे जंगाला । जन्म मरण झरकावे काला ॥

Page 61Permalink

कबीरकृष्णगीता ।

४७

तेहि दुख कबीर गुरु पगु गहा। सत्यकबीर जप हंस निरवहा ॥
सरगुण श्रेष्ठ विष्णु अधिकारा । निर्गुण सत्यकबीर जिव तारा ॥
निर्गुण भक्त बिना जमलूटे । निर्गुण बिना न संगय छूटे ॥
नकल निर्गुण कहिये निराकारा । तिन जो जीवहि कीन्ह खुवारा ॥
दूजे निर्गुण मन यम अंसा । तजि धरती साध निहसंसा ॥
चाथे निर्गुण नीर लखाया । पंचये निर्गुण पवन बहाया ॥
छठये निर्गुण गगन बखाना । सतये सत्यकबीर निरबाना ॥
आतम पवन और तन आदी । सो राम कबीरका नादी ॥
नांद निरंजन नांद अष्टंगी । नांद सुरति सोहंग तरंगी ॥
नांद पुत्र शिष्य गुरु मुख जाये । बिना शिष्य कस मुख कहाये ॥
सीखे सुने शब्द कहैं खोजा । जहां सांच ताके भये सोजा ॥
असल सांच एक कपदी दूजा । असल बोलता तज भ्रम पूजा ॥
दोहा—असल सुरति साहेब का, नर सुरत अनुहार ॥
सबै रूप तन भासे, जोत पुंज उजियार ॥
नख सिख विमल सुठ आति लोना। अथर सिंहासन अंकित भवना ॥
सिंहासनके अथर सकल सब । अथर सिंहासन सत्यकबीर जप ॥
जाके दस्त पयाना लहजीऊ । कहे कबीर ताके सोइ पीऊ ॥
पुरुष सरूप यह हंस कडिहारा। पहुँचे हंस पुरुष दरवारा ॥
कंचन पृथ्वी हंस सब रहहीं । निज२दीप सबे मुख लहहीं ॥
जेते अंस प्रगट होय आवा । धर सरूप सो नाम धरावा ॥
पुरुष अमान सीलके खानी । समर्थ नाम अकह सो जानी ॥
सबे नाम है साहेब केरा । अकह नाम सो हंस निवैरा ॥

सद्गुरु और गुरुके लक्षण और चिह्न

Page 62Permalink

( ४८ )

कविरक्तुणगीता ।

अकह नाम सो सद्गुरु भाषा । सद्गुरु सब पूरण अभिलाषा ॥
जासों डोरी पुरुषकी पावे । सत्पुरुष सम तेहि चित्तलोवे ॥
केने गुरुवा कपट कराहीं । सीखहिं शब्द सिखावत नाहीं ॥
कपटी गुरु जो शब्द न देई । पूजा पाठ लेख पुन लेई ॥
पूछे शिष्य तब ज्ञानके बाता । पूजा थोर क्रोध गुरु ताता ॥
गुरु सो जेहि अस कत सिष भाऊ। पूजे बिन पूजे एक ताऊ ॥
पूजा लेय पुनि राह बतावे । अमरलोक ले जिव पहुँचावे ॥
अकह कथाको गम न पावे । सो सद्गुरु कवीर समुझावे ॥
जे शिष्य बहुत गम्य कर बोले । गुरुकी सेवा करे दिल खोले ॥
मात पिताको सेवक जो सुत । सोइ सपूत जो गुरु सेवा जुगत ॥

दोहा-सेवा देवा लेवा करे, पखलधार तब जान ॥

गुरु सोई जो ज्ञान दे, सेवक सेवा ठान ॥

सेवक होय करे गुरु निंदा । ज्ञान पाय कहे गुरु दाहनबिंदा ॥

चेला गुरु पूंजी दे खोई । गुरु बिन सेवा लाभ न होई ॥

कविरचन ।

दोहा- कहैं कवीर सुन देव मुनि, कृष्णकपिल मुनि व्यास ।

तुम सब सेवो साधु गुरु, छोड़ धर्म विश्वास ॥

धर्म विश्वास कालकी फांसी । प्रेत भूत आस दुखरासी ॥

गुरु तज सकल आस दुखखानी । गुरु बिन नर्क परे अभियानी ॥

गुरु सोई जो अंतहु गीठा । जन्म मरण गुरु लागे सीठा ॥

सकलदेववचन व कुबेरका गुरु उपदेश लेना

Page 63Permalink

कवीरकृष्णगीतः ।

४९

सकलदेव वचन ।

सकल देव उठ चरण यनावा । श्रीहरिविलस गलताव सुनावा ॥
हम सब परे निरंजन फांसा । सत्यकवीर काटे यम त्रासा ॥
जन्मत भरत बहुत दुख पावा । अब कवीरके चरण चितलावा ॥
यमसे एक तुम राखन हारा । कवीर वांचे सब यमके चारा ॥

कवीरवचन ।

कहैं कवीर तुम सब तन धरहूँ । क्रितम देह हरि सेवा करहूँ ॥
अमृतदेह अमर घर जाई । क्रितम देह घर ठार समाई ॥
सत्य देह हंसके संग। सत्य देह विदेह प्रसंगा ॥
अब सुनो ज्ञान पान परचाई । थित पान दे लोक पठाई ॥
उठे कुबेर हरिपद लपटाने । सत्य कवीर गुरु लरन सो ठाने ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण पुलाकित होय वाणी । सत्यकवीर सट्टुर सुखदानी ॥
कोट जन्म तप पुंज जेहि होई । सतकवीर कहैं सेवहिं सौई ॥
उठे हर्षित हरि आज्ञा पाई । कवीरके सन्मुख महिपर धाई ॥
कहैं कुबेर सीस महि लाई । आद पुरुष कवीर प्रगटाई ॥

कवीर वचन ।

कहैं कवीर तुम हरि गुरु भजहूँ । तजहु कुपंथ आमिख भष तजहूँ ॥
देवता आमिख लेय मधुवासा । और आमिख बहु देव गरासा ॥

कुबेर वचन ।

कहैं कुबेर मोहिं आपन करहूँ । दे परवाना कर्मज हरहूँ ॥
तुमही कर्ता मूल सकलके । तीन लोककर भक्त न कलके ॥
तुम्हरे अंस जीव सब स्वाभी । निरंजनके मूल तुम अंतर्थाभी ॥

Page 64Permalink

५०

कबीरकृष्णगीता ।

कबीर वचन ।

सत्कबीर विहस कह बाता । सहि कुबेर शरण यम आता ॥
आरती साज अब आन तुरंता । नीरयर पान मिष्टान्न भुगंता ॥
बहुत सुगंध फूल बहुताई । सुरत सुवास सेत फललाई ॥
मेवा वस्तर पटंबर छाजा । लोक प्रभाव उदै मनु साजा ॥
अन्हद शब्द सो मंगलचारा । सानंद सट्टुर भक्त अपारा ॥
सबे देव मिल मंगल गावहिं । जै २ सत्कबीर उचारहिं ॥
साजेड थार जोत प्रकाशा । अथर थार सिंहासन स्वासा ॥
भोग लगाय पुरुष सतनामा । लियो छोर यम फंदते प्राणा ॥
यमराजा सो त्रिण नोडाई । काल भूतके सुंह भुकाई ॥
शब्द वाक्य कह दीन्हों बीरा । सुरति समानी सत्य कबीरा ॥
चरणामृत तुलसी माला । दीन्हें तिलक सर्व सुखचाला ॥
कहहिं सिखावन दंडवत गुरुसाता । तीन दंडवत साथ पिपुमाता ॥
रहिय गुरुके चरण लौलीना । रामनाम गुरु साधुहिं चीन्हा ॥
केतो पढके निडर रहई । गुरुकी शक्ति सबे निरवहई ॥
पढा देवता दया जेहि हिये । दयाहीन यम कातर हिये ॥
गुरु सिवायकछु आस न करिये । सट्टुर भज सतलोक पगु धरिये ॥
सट्टुर सत्यकबीर निज नामा । जहाँ प्रेम तँहँवा गुरुनामा ॥
बिना प्रेम जग होत बिगाना । तात मात बिन प्रेम बिगाना ॥
आन सो प्रेम करे सो सुरखा । कबीर कृष्ण तरे सब पुरखा ॥
कबीर बिना कोई तारे नाहीं । त्रिभुवन सब परंपची आहीं ॥

कृष्णका दीक्षा लेनेके लिये प्रार्थना करना

Page 65Permalink

कवीरकृष्णगीता ।

५१

एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥
धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥

दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।

गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥
धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥

दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।

आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥

कवीरवचन ।

कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥

पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥

सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥

पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥

पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥

रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥

विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥

जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥

दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।

विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥

जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥

Page 66Permalink

५२

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा--कहैं कबीर कृष्णसे, मनमो राखो धीर ।
आगे वीरा देव तोहि,हमार अंस तुम वीर ॥

व्यासवचन ।

कहैं व्यास कबीर हर वंसा । सबके मूल कबीर निहसंसा ॥
अपने मन सब सदुरु चेला । सदुरु शिष्य जेहि नाम थिला ॥
हम सब सदुरु निंदे सुनि जेतै । सबके सदुरु कबीर गति देतै ॥
रवि प्रकाश भौ तिगिर नासा । कीतम त्रिगुण तिगिर तन भासा ॥
निर्गुण भक्त प्रकाश रवि जाना । निरगुण सरगुण माहिं समाना ॥
निर्गुण स्वासा सरगुण देहीं । यमसे बांचे कबीर सनेहीं ॥

कबीरवचन ।

दोहा--कहैं कबीर हम सब घट, राम रूप तन स्वास ।
स्वासा पुरुष नार तन, स्वासा विकसत न नास ॥

व्यास सुखदेव वचन

कहैं व्यास सुखदेव कर जोरी । यम तन कांच जीव बंदी छोरी ॥
यह तन विनसत बार न लगे । ना जानो स्वासा कब वागे ॥
कपिलमुनि गाय सो तुमहि बचाया । जो बांचे सो कबीरकी दाया ॥
दीजे सुख पान मोहिं आतुर । सुखे प्रथम चेतै सो चातुर ॥
वाघ निरंजन सब जिव गार्ई । सवा लाख नित खाय कसाई ॥
सो जिव बांचे काल तुम आसा । नाम कबीर जाहिपर बासा ॥

दोहा--एक ठांव बन कपिल मुनि, दूसर स्वास सुखदेव ।
सब जिव प्रासे वाघ यम, तुम कबीर लख लेव ॥
तब कबीर जिव उपजी दाया । मानिद पान सो सबहिं खवाया ॥

मनका वर्णन - मनकी ४० प्रकृति

Page 67Permalink

कवीरकृष्णगीता ।

५३

कवीरवचन ।

कहैं कवीर निःशंक अव होहू । निरंजन वाष न आसे तोहू ॥
अव तुम सुनहु और एक वाता । प्रथम गुरुहैं पिता औ माता ॥
रज बीज माता पिताके चोला । पुरुषअंश तेहि तेज अमोला ॥
पांच तत्व प्रकृति पचीसा । चौदह यम त्रिगुण तैंतीसा ॥
रोम २ सब आरि तन जिवके । तन मन काल मार वल पिवके ॥

दोहा--चालिस सेरको मन भयो, चालिसमहैं एक सार ।

एक सांच सब झूठा, स्वास सार तन छार ॥

गुप्त प्रगट दस इंद्री लखहू । पचीस प्रकृती तैंतीसा भाषहू ॥
गुणभा तीन मिले अठतीसा । अक्षा अंस एक मन दीसा ॥
भाउं न चालिस चालिस जीऊ । जीवके सत्यनाम है पीऊ ॥
जीव अमर सो अमर कवीरा । सत्यकवीर सुक्त मन हीरा ॥
शरे तत्व औ गुण प्रकृती । अमर सो हंस पुरुषको रीती ॥
पांच अफीके काया बाहर । अमरलोक आसन तेहि ठाहर ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश जग अधपत । अधपतकी मत क्रीतम मलगत ॥
निरंजन पुनि तन घर मरऊ । ऊंच नीच बहु क्रीतम कियऊ ॥
अजब दिल निरंजन नाऊ । नाना रंग बसाये गार्ऊ ॥
अहंकार बस राहु अलाहू । ताते कोई न पावे थाहू ॥
कुमत कुसंग क्रोध अध चाली । ये सब विकट निरंजन माली ॥
आप निरंजन अल्लह कहाये । अजानिल्ल एक और बनाये ॥
दुनिया अजजिल्ल जग जानो । असल अजानिल्ल प्रभुको मानो ॥

गुरु और गुरुओंका वर्णन

Page 68Permalink

५४

कबीरकृष्णगीता ।

तुरक अजानिल्ल हिंदू धर्मराई । है भक्षक रक्षक नहि भाई ॥
आप अजानिल्ल अलह कहलावा । अलह अलाहकी रूप छिपावा ॥
जीव का करे काल छल कीन्हा । जीव भुलाने खसम न चीन्हा ॥
जीवके खसम सो अमर कबीरा । विन परचे धरे धर चीरा ॥
देवा देवी जार गवारा । सटुरु खसम सो अमर भतारा ॥
असछी सटुरु सत्य कबीरा । नकली सटुरु बहु भौ भीरा ॥
बोरहिं शिष्यको नरक मंझारा । कहहिंके भौजल पार उतारा ॥
वेद पुराण कुराण पढ़ै सब । गुरुभत त्याग मनमत गहै सब ॥
वोर छोर गायत्री माहीं । सत्य दया तेहि माहे दढाहीं ॥
पंडित काजी यमके अगुवा । आप बाल बालें पछ लगुवा ॥
द्विजके कहे चले संसारा । सो द्विज मनमत बात अपारा ॥
कलयुग आवत है चल भाई । लै २ पान लोक बलि जाई ॥
करिहै निरंजन कलिय विचारा । वट२ कुमत उपजहि संसारा ॥
ब्राह्मण कलिमें मछरी खैहैं । विष्णु देह धर नरके जैहैं ॥
धरिहैं निरंजन रूप मलीक्षा । गऊ विगहिं दुख देहिं अदीक्षा ॥
बडा प्रपंच करि है जिव लागी । अनंत रूप धर नट बट पागी ॥

दोहा—चोरी और छिनारी, आमिष भष जिव घात ।

यह सब करिहैं निरंजन, जीवन वड उत्पात ॥

काजी रूप निरंजन पांडे । एके काल दोऊ घर भांडे ॥
एके विष्णौ दुतिय दूबे । त्रिविध तिवारी पांडे चौबे ॥
छठयें सतयें अठयें नौवें । दसयें दस प्रकार द्विज सोमे ॥

Page 69Permalink

कबीरकृष्णगीता ।

५५

नौवैं नौ नारी प्रमोधा । दसवैं दस द्वार जिन सोधा ॥
अठवैं अष्ट कमल जो भिन्ना । सतयै सत्य वाक गहि लीना ॥
षट्ये षड्स त्यागे भाई । पाठै पचर्यै वेद पढाई ॥
चौवै चार वेद जो राता । तिवारी त्रिगुण देव भगु माता ॥
दूवै दुवधा दूर बहावे । एक असल सत्यनाम समावे ॥
एक सो जन कबीर विष्णो गता । दयाशील पतिपाल अगतगत ॥

व्यास सुखदेव वचन ।

कहे सुखदेव व्यास कर जोरी । कहहु चौरासी केतिक खोरी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो सब कोई । चार खान चौरासी लक्ष होई ॥
नौ लख जलमो जीव समाना । चौदह लक्ष पंछी परवाना ॥
ऊमि कीट सत्ताइस लाख । तीस लाख स्थावर भाषा ॥
चार लाख मालुष तन जाना । मालुष देह परमपद जाना ॥
चार खान अब सुनहु व्यासा । चौरासी चार निरंजन फांसा ॥
अंडज पिंडज ऊष्मज अंकुरा । चार खान जिव एकहिं पूरा ॥
पुरुष दीन्ह जिव अम्बर चोला । इच्छारूपी उडुगण खोला ॥
सौ चोला को निरंजन पैन्हा । नरक कलमा काया जिव दीन्हा ॥
भये असतो निरंजन जबते । आनके आप लियो अब जबते ॥
कुमत असत जिव घात निरंजन । जिव पालक सतनाम सो सज्जन ॥
आपन जनमल ताहु दुखदाई । त्रियसुत निराकार निज खाई ॥
कहेो जीव कैसेके बांचे । सत्यनाम विन यमघर नांचे ॥

मीन भक्षककी गतिका वर्णन

Page 70Permalink

५६

कबीरकृष्णगीता ।

विष्णुवचन ।

उठके कृष्ण केहं कर जोरी । कल भखमीन कौनगति मोरी ॥
मीनरूप है विष्णुके स्वामी । जीव भक्षकके कस गत कामी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कधीर सुनो भगवाना । मीन भक्ष गडघात निदाना ॥
परनारीरत नरक अधोरा । लोहू पीव भिक्षा मह बोरा ॥
द्वादश तेहि योजन भौसागर । भिक्षा मूत्र कमि दचागर ॥
नरकको कुंड सात यम कीन्हा । घोर नरक भौसागर चीन्हा ॥
भिक्षाकुंड ॥ १ ॥ मूत्रकुंड ॥ २ ॥ रावीकुंड ॥ ३ ॥ रक्तकुंड ४
खरवारकुंड ॥ ५ ॥ नासिकामलकुंड ॥ ६ ॥ धातुकुंड ॥ ७ ॥
सुनहु आठे अग्रिकुंड ॥ ८ ॥ पांचसौ ते रे बडे सुंड ॥
पांचसौ योजन चकराई भाई । लक्ष योजन के हैं गहराई ॥
भौसागरका भंवर भयावन । बूडे पापी अधिक अपावन ॥
राम चीन्ह पुन चीन्हे नामा । सत्यनाम सो सुखके धामा ॥
सत्यनामको वेद न जाने । निराकार कह वेद बखाने ॥
निरंजन के स्वासा ते आयवेदा । आगे कैसे जाने भेदा ॥
वेद नीत बहु विमल बखाने । तांत्रिक घात सुनी मन जाने ॥

दोहा-वेद मते वैकुंठ मिल, दया भाव सतसंग ।

तांत्रिक नरक बुडावे, वैदिक रामप्रसंग ॥

परे बाढ मछरी जस भाई । सलिता बूडे मीन उतराई ॥
पलटत पानी चले जो मीना । परे सलिठ नीको तिन कीन्हा ॥
देहैं लोभ चारा बहुताई । परे फांस मन मति अरुझाई ॥

जीव बधनेका पाप

Page 71Permalink

कवीरकृष्णगीता ।

५७

यह विध सिरजन बट जिव आये । यहां निरंजन कीर वझाये ॥
छिन्न सुखदे सब सुख हर लीन्हा । अन्मर जन्म जीव नहिं दीन्हा ॥
कहा करो जो काल नसायो । विना पेयादा दाय न पायो ॥
कहैं कवीर जो संतका द्रोही । निश्चय काल गरासे बोही ॥
कोटिन जीव वधे कर पापा । तेहि जो अजिया सुख एक लापा ॥
अजियासुत दूध भाई दौई । सो सांचा जिन शब्द विलौई ॥
सद्गुरु शब्द लखे अरि हीता । सब भक्षक एक सद्गुरु मीता ॥
जो जेहि काटे सो तेहि मारे । मारन छल तेहि काल सुधारे ॥
कोट बालक वधे एक त्रिया बालक । कोट त्रिया वधे पाप एक गायक ॥
कोट गाय वधे एक झख सार्व । झख मछरी कोटिन बुधतार्व ॥
कोटिन पाप बसे तेहि माहीं । विप्रघातसम पातक तार्व ॥
कोट विप्र वधे विष्णव एका । विष्णव वध होय पाप अनेका ॥
जीवत महितन भरत प्रतमाळा । तब तक नरक भोग बस काळा ॥
मालुष तन धर भक्त न कीन्हा । भक्तही बूढे कमीना ॥
सद्गुरु भक्त प्राप्त जिव होई । कहैं कवीर सतलोक गये सोई ॥
सद्गुरु भक्त प्राप्त बडभागी । बडे भाग्य बैरागी अलुरागी ॥
जन्म अनेक तब पुण्य कमाई । होय मास बासी सो जन्मे आई ॥
बनवासी न करे विवाहा । काहु पुरुष सुख दधि न बाहा ॥
सात जन्म जो सततन राखा । तब सो सब पुरुष पत भाषा ॥
सात जन्म सो पियासंग जरई । तब सो पतिव्रता औतरई ॥
सात जन्म पतिव्रत कमावे । सत्तभक्त कर सद्गुरु पावे ॥
सात जन्म करे गुरुसेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥

४

कबीरसाहबसे दर्शन देनेके लिये सब देवताओंका प्रार्थना करना

Page 72Permalink

५८

कबीरकृष्णगीता ।

तीरथ वरतका तेजहिं आसा । गुरुके चरण केवल विश्वास । ॥
घात झोह तजे परनारी । आग्नि तजे ले बिसम विचारी ॥
हंसहि रंभर लोकहिं जाहीं । विष्णु सतगुन गुरु तारहिं ताहीं ॥
सतकबीर हंसन गते होई । सत्यकबीर निज सद्गुरु सोई ॥
गुरु सद्गुरु परमगुरु लोई । कहै कबीर अब गुप्त हम होई ॥
प्रगट होउं जब इच्छा तोही । मैं तो जात अबहि जग सोई ॥
एक बेर अब पृथ्वी जाऊं । यम सिर तोंड जीव सुत्काऊं ॥
सब मिल सुमरो सद्गुरु नामा । छांडहु कीतम देय सो वामा ॥
रामनाम सद्गुरु प्रवाना । सद्गुरु सत्यकबीर निरवाना ॥
सद्गुरु गये काल अरहैरा । ज्ञानधनुष कर ध्यान पवैरा ॥
मोरेउ मन माया अभिमानी । तारेउ साधु संत गलतानी ॥
तीन लोक बनकाथा भयऊ । तेहि मह बाघ सिंह ठग रहैऊ ॥
सत्यकबीर जो होय सहाई । तौन जीव यम जीत वनाई ॥

व्यासवचन ।

कहै सुख व्यास कृष्ण सो रोई । सत्यकबीर सम और न कोई ॥
दया करेहु तम कृष्ण गोसाई । सत्यकबीर कहैं लेहु बलाई ॥

कृष्णवचन ।

कहैं खनंग आरि व्यास समेता । कहैं कृष्ण अर्जुन समहैता ॥
कहैं कृष्ण सतनाम कबीरा । न्यारा व्यापक सकल शरीरा ॥

दोहा—तुमहिसे सब प्रगटे, तुमते सब विस्तार ।

निराकार सिर मर्दन, सो कबीर औतार ॥

देहु दरश सत्पुरुष अनादी । तुव दर्शन विन जरो ब्रह्मादी ॥

कपिलमुनिका पान परवाना लेना

Page 73Permalink

कबीरकृष्णगीता ।

५९

प्रगट सत्यकबीर देहु दरशन । कहैं कृष्ण मोहि पर होहु प्रशन ॥
कबीर दरश विन कृष्ण अधीरा । प्रगट भये तब सत्यकबीरा ॥
भौ वैकुंठ महा अज्ञानी । पुष्प विमान चढ़ि पहुँचे आनी ॥
भये सुवास वैकुंठ अंजोरा । सत्यकबीर देख चहुँ ओरा ॥
अधर विमान उत्तर नहिँ नीचा । आवत अभी सबनपर सींचा ॥
रतुत २ बोले सब देवा । अष्टांग दंडवत आशिष लेवा ॥
कहैं गरुड हरि होहु सवारी । उठ कबीरके चरणन पारी ॥
कहैं कृष्ण सुन गरुड सुजाना । अपना योग्य बात नहिँ आना ॥
हम सेवक कबीरके आही । स्वामीसे सरवर नहिँ चाही ॥
समर्थ अधरते करिहैं दया । इतना कहत आप प्रभुराया ॥
आय विमान वैकुंठ तेहि ठयऊ । स्तुति सकल देव मुनि कियऊ ॥
कृष्ण व्यास पंडो पगु लगे । चरण पखार सकल मिल पागे ॥
पूछहिँ ज्ञान कपिलमुनि देवा । सत्यकबीर कहु सत्यको भेवा ॥

दोहा—श्रोता वक्ता कौन घर, जब नर आवे नींद ।
शब्द विराजे कौन घर, पूछहिँ कपिल मुनींद ॥

कबीरवचन ।

सिद्ध जाहि दरबार महँ, ब्रह्मरंध्रके तीर ।
श्रोता वक्ता एक शब्द सुतसंग, मुनिसो कहैं कबीर ॥

कपिलमुनिवचन ।

कहैं कपिलमुनि मोकहैं तारो । निरंजन वाघसो मोहि उबारो ॥
हृदय जपिहों तुन्हरो नामा । जेहि दिन यमसों छोरैहु प्राणा ॥

रावणका वृत्तान्त

Page 74Permalink

६०

कबीरकृष्णगीता ।

अब मोहिं करहु निकटक स्वामी । देहु पान प्रभु अंतर्धामी ॥
आरती पान शरण लौलाई । आदि अंत डर देहु छोड़ाई ॥
मोहि उबार सवनको तारो । काल मेट निज हंस उबारो ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर कपिलमुनि सेती । दैकै छोड़ लेय बढनेती ॥
कोइ दिनके आगे होय ऐसा । तुम कपिल मुनि भाखेहु जैसा ॥
अब तुम पान लेहु त्रिण तोरी । लेव कालके सुखसो छोरी ॥
तारो सब जिव सहज सहज ते । सो पशु पंछी भूंग नर जेतै ॥
सहज आरती कर दीन्हो पाना । भयउ मुक्त कपिलमुनि जाना ॥
चरणामृत सीत प्रशादी । लियो कपिलमुनि भक्त अराधी ॥
मगन भये सब संशय नाशी । सत्यकबीर मिले अविनाशी ॥
कहैं कबीर सुनो कपिलमुनि । हमरे नाम सुरत लायो धुनि ॥
हमरे नाम जप काल न पाई । हमरे नाम बिन काल चवाई ॥
जैसे रावण तप नित कीन्हा । दशाशिर काट शिवहिं नित दीन्हा ॥
मगन भये सेवा वश रुद्रा । दियो लंकागढ़ खाही समुद्रा ॥
कीन्हो कैद रावण सब देवा । सबै देव करें रावणकी सेवा ॥
रावणके मन गर्व सुहाती । एक लख पुत्र सवा लख नाती ॥
दश शीश बीस भुजा लख गाजा । कहे रावण मोहि समको राजा ॥
करता गर्व करें सो छाजा । सो करता संतन पगु माजा ॥
कहैं कबीर जिन कियो गर्व छल । सत्य भक्त बिन परे नरकमल ॥
रामचंद्रसो ताहि हताये । सब परवार रिष नगर रिताये ॥

कलि युगके धर्मका वर्णन

Page 75Permalink

कवीरकृष्णगीता ।

६१

बांचे भक्त ठांन विभीषण । हंकारी प्रले भो सब जन ॥
तस छल गर्व निरंजन कीन्ह । जोग जीत तवहीं शिर छीना ॥
ताते भक्त करो मन लाई । सत्यनाम भज सब सुखपाई ॥
रामचंद्रके हृदय कवीरा । कृष्णके शीश गंभीर कवीरा ॥
ताते राम कृष्ण जग जीता । नाना रंग जुगन जुग कीता ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माही । थोडे पाप बहु पुण्य कमाही ॥
कलयुग पाप करिहैं बहु लोग । सुख किंचित् ताते बहु रोग ॥

दोहा-ब्राह्मण औ संन्यासी, काजी प्रजा झार ।

सब होइहैं आमिषभष, कोटि माहिये न्यार ॥

कलिके भूप कहैं गउ बंदा । प्रजा दुख दे आप अनंदा ॥
राजा तबलग भोगिहैं राजु । जबलग दान पुण्य व्रत साजु ॥
पुण्यहीन नृपत जड जुडा । पुण्य घटे राजा बिन सुढा ॥
पुण्य कीन्ह बहुते एक साकट । गुरु बिन सकल पुण्यभौकरकट ॥
कलिमहँ पतिव्रता बहु नाहीं । सर्ता यती गुरुभकविरलाअहीं ॥
पतिव्रता विश्वा कलि गारी । विश्वा सो जो बहुत भतारी ॥
दुनियाके पतिव्रता पत भजी । साधु सो जो पतिव्रत सजी ॥
गुरु सोई सो अंतहु मीठा । जन्ममरण गुरु लागहि सीठा ॥

दोहा-पतिव्रता सोइ जानिये, जो अपने पतिरात ।

अपना पति सोइ जानिये, जो कहै अमरपुरवात ॥

अमरदुलहिनअमरवरचाही । जीव अमर सत्पुरुषके व्याही ॥
सत्पुरुष अमर अमरापुर । तहँवा काल जंजाल दुख दुर ॥

Page 76Permalink

६२

कबीरकृष्णगीता ।

सोई पुरुष संत्यनाम कबीरहम । हमरे डर डरें निराकार यम ॥
कहे कबीर हमरे सब कीन्हा । ताकर तोहि बताऊँ चीन्हा ॥
जाकर अंस दरद तेहि होई । गुरु विन राखनहार न कोई ॥
गुरु सोई जो भौते न्यारा । नहिं कुछ जातपात व्योहारा ॥
पूजे विन पूजे सुख माने । पूजा परम भक्त रत जाने ॥
कृष्ण सुनो गुरुमतकी वाता । गुरु संत करता पिलु भाता ॥
सबके गुरु अमरापुरवासी । कलिं प्रगटहिं डासातनकासी ॥
दास कबीर सोई सतनाया । कहें कबीर हमरे सोह कामा ॥
कहें कबीर बडा जो होई । होय गलतान प्रेम बस सोई ॥
पेटे गर्व करे छूंचेपर । गर्वके सीसा वा देखे धर ॥
छूंचे गर्भ बला शिव कीन्हा । संत्यनाम लखि सुरतन दीन्हा ॥
विष्णु सतो गुण कछुलखि पावा । ताते हमसों प्रेम बढावा ॥
विन कबीर जिव कोई न तारे । श्रीकृष्ण यह वचन उचारे ॥
कहें कबीर सब जीव है मोरा । करिहों जीवन बंदीछोरा ॥
सब जिव आहिं हमारीव्याही । विन परचे यमके सुख जाही ॥
पिया तज भये जार जम जारी । जार भजे बूढ़हिं भ्रम भारी ॥
जगकरजीवन नामसो सांचा । सोई नाम विदेह सुख रांचा ॥
सरगुण पांच तीन बस देहा । तासु परे है नाम विदेहा ॥
देह विदेह सकलको मूला । सोई सत्य कबीर हर बोला ॥

व्यास सुखदेव कपिल वचन ।

क हँव्यास सुखदेव कपिलमुनि । पतिव्रता सद्गुरु सेवक धनी ॥