कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
About this granth
Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.
Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.
The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.
कबीरकृष्णगीता ।
३३
भीम वचन ।
कहे भीम अर्जुन भल कहा । सुना कबीर जुल्हा एक रहा ॥
ताकी एतिक करे बड़ाई । तब सहदेन बोले रिस आई ॥
तुम कबीर कह सके बूझा । अबहिं तोहिं गुरुमत नहिं सुझा ॥
कबीर नाम करता आविनासी । कबीर भजे तेहि छूटे चौरासी ॥
नकुल वचन ।
कहे नकुल भक्त कहा गोसाईं । जेहि मधु तारे सो तर जाई ॥
सुनिके कृष्ण कहा सुन भीमा । अर्जुन पठे तिनहु नहिं चीन्हा ॥
दोहा—सोई कबीर तुम चीन्हहु, जेहि शिष्य घंट बजाय ॥
द्वार भक्त सुदरसन, डोम स्वपच बरणाय ॥
कबीर सोई जाको अस शिष्या। हम सब जीव कबीर घर भीषा ॥
जोलहा आद जासु जगताना । सुरझे साथ साकट अरुझाना ॥
चंदसूर जाके दोय तारा । करि गह काया बिनहि रिसारा ॥
इंगला पिंगला चले दोय घोटी । मध्य सुषुम्णा हांथ जोटी ॥
सरसों तीन साठ लग जानी । अर्ध उर्ध दोय खूँटी तानी ॥
तानी ताना भरनी सुत स्वासा । निहचल बिनहि कबीरा दासा ॥
धरती अकाश पवन औ पानी । रचा कबीर सकल रजधानी ॥
फिरहिं जगतमहँ आप छिपाये । भक्त सुक पथ इनाहिं चलाये ॥
जासे तबहिं निरंजन राई । हम तुम कौन गलीमहँ भाई ॥
संकट माहिं कबीर सहाई । बंदी छोर कबीर गोसाईं ॥
करताका कोइ अंत न पावे । तरे सोई जो भक्त कमावे ॥
कपिल मुनि वचन (निज वृत्तान्त)
३४
कबीरकृष्णगीता ।
अर्जुन भीम कृष्ण पग लगे । निहचछ सोयते अब जाये ॥
कृष्ण युधिष्ठिर कहैं इसारा । अधम उधारन नाम कबीरा ॥
राम नाम कबीर प्रकाशा । राम कबोर दोष एक अवासा ॥
युधिष्ठिर वचन ।
कहैं युधिष्ठिर सुनहु स्वामी । आज कहों तोहि अंतर्धारिनी ॥
जा दिन कहा तुव पुर्षा तारे । बुढ़े नरकते जाय विकारे ॥
तब तुव आज्ञा सिरपर राखा । बांये अंगुली नरकमहैं नांखा ॥
पांव पकड़ मोहिं पित्रन रैंचे । नाम कबीर सुमर तब बांचे ॥
और नाम बहु सुमरेहुं जाई । तजहिं न पित्र मोहिले जाई ॥
तब मैं सचकबीर पुकारा । तत्तिछिण भयउँ नरकते न्यारा ॥
तबसे हम कबीरको चीन्हा । कबीर कहत भये अघते भिन्ना ॥
जबहिं हम युधिष्ठिर ऐसी कहा । तबहिं कपिलमुनि उठकर गहा ॥
कपिलमुनि वचन ।
धन्य युधिष्ठिर कह दुलराये । तुमहु लख कबीर कहैं पाये ॥
कबीर आप हैं समर्थ साई । जाकी रची सकल दुनिआई ॥
आपन बढाई विष्णुहिं दीन्हा । आप दास भये अस अधीना ॥
एक दिन व्यास निरंजन ईशा । औरहिं भया चितवे यम दीसा ॥
सवा लाख सँग पहुँचे जाई । सूर्य दैय यम चला गौसाई ॥
तब कबीर कहैं कीन्ह चिकारा । भिन्यर के मोहि निरंजन डारा ॥
दूतहिं कहा हंस केहि आना । भाष बेग नतो करौ निदाना ॥
बोला श्रीहर दूत होय आगे । डरहिं दूत सब कांपन लागे ॥
कबीरकृष्णगीता ।
३५
इन नहिं कीन्ह कबीरपुकारा । निरसत जोत तहाँ हम मारा ॥
यहां आय कबीर गोहरायै । वहाँ जोगके गर्भ खुलायै ॥
जोग भोग नहिं जानो भाई । कबीर नाम भज काल न खाई ॥
तबहिं निरंजन दूतहिं बुझावा । यहि धारि डार तुरत तब नावा ॥
दोहा—इतना कहा निरंजन, तत्क्षण प्रगट कबीर ॥
किन मम हंस दुखावा, केहि भारी भौ शरीर ॥
दूत अंध भय पैल पुराने । चल न सके बलहीन तुलाने ॥
देख कबीर निरंजन नीरा । धाय कबीरके चरणन गीरा ॥
थरहर कहे चूक नहिं मोरा । अलग हंस बैठारडं तोरा ॥
सतकबीर सुनि कपिलहि पूछा । कहा कपिल कुछ नाहिं विगूचा ॥
दोहा—तब कबीर दाय़ा करि, मोहे ले चलेउ लियाय ॥
कहे काल मैं चेशो ते ये, तुम राखो मम ठान ॥
तब हम कबीर उर धारा । कहे कबीर भये जभते न्यारा ॥
कहे कपिल सुनि सुन हो भीमा । धन्य कबीर निरंजन सीमा ॥
जहां निरंजन कहैं सब धावे । वहाँ अंत जीवन झरकावे ॥
कहैं कपिल सुनि सुन सहदेवा । विरले पावे कबीरको भेवा ॥
अब हम लेव कबीर प्रवाना । भज कबीर निज घर कहैं जाना ॥
सुने कबीर के महिमा भारी । इच्छा दर्श सबन चित धारी ॥
अर्जुन विनति कृष्णसों करही । हमहुं सतकबीर पगु धरही ॥
कहे कृष्ण तुम हमहीं चीन्हा । अबही कस साहेब चित दीन्हा ॥
३६
कवीरकृष्णगीता ।
हम कहैं तुम मानुष कर जाना । तुम नहिं वचन हमारा माना ॥
अजुन कह तोहे मोहन छूटा । मोह मार सिद्ध सुनि लूटा ॥
जेठा बढा जो कहै सिखाई । मानिये ताको सीस नवाई ॥
राय युधिष्ठिर कबीर गुण कहा । हमहू कहा सो चित नहिं रहा ॥
हम सब कहैं कबीर सिखावा । मनसे मोह प्रगट सब भावा ॥
दीन्ह निरंजन कहैं बिलोका । जीवन सुखदे तुमाहिं निसोका ॥
सकल जीव औ सतकी दाया । जोत अष्टंगी पुरुष निरमाया ॥
दीन्ह निरंजन कहैं जागरी । ओइ पुरुष सोइ सत्तकवीरा ॥
सतलोकवासी अविचल नामा । अविचल नाम कबीर सुखधामा ॥
सत्तकवीर हम सबहि सिखावा । राम निरंजन जगहि ददावा ॥
राम निरंजन प्रगट विस्तारी । कृष्ण अज औ हर संसारी ॥
इन सब कहैं लूटवे हर साजा । क्षौर असवारी पीछे राजा ॥
जो निरगुणकी सब महिमा पावे । तोसरगुणके कोइ निकट न आवे
निरगुण कबीर त्रिगुणते न्यारा । निरंजन त्रिगुण सरगुण पक्षारा ॥
निरंजन कहैं जग निरगुण कहता । निरगुण तो जोइन नहिं वहता ॥
निरंजन तो जोइन मह आये । तन धर कृतम नरक भुगतये ॥
क्रीतम सखा त्रिगुण कियो कर्ता । कर्ता हर्ता भर्ता नहिं मरता ॥
जो कर्ता आपहि भर जाई । तो तेहि क्रीतम कहिये भाई ॥
निरंजन तो तन धर २ मूवा । आदि कर्ता कहु कैसे हूवा ॥
आदि कर्ता सो सत्तकवीरा । जो नहिं गले न जरे शरीरा ॥
अकह अगह छाया तन नाहीं । स्वासा से तस रंग लखाही ॥
कवीरकृष्णगीता ।
( ३७ )
स्वासा पूंजी सवके भाई । सो स्वासा कवीर निरमाई ॥
स्वासा देह लिये संगे चले । निकसत स्वासा देह महि मिले ॥
देहीं त्रिगुण राय निरंजन । स्वासा अंस कवीर दुख भंजन ॥
स्वासा आद पवन है भाई । नासिका वाट सो आवहिं जाई ॥
नासिका निकट सो दरसे आतम । आतम दरस दरसे परमातम ॥
छचीस नीर और पवन पचासी । ताते न्यारा सोहंग अविनासी ॥
सोहंग जीव सुखसागर केरा । तन धर भुगते दुःख घनेरा ॥
केदली ब्रह्मके नाम सोहंगा । जाको मूल सो शब्द विहंगा ॥
जीवके नाम केदल ब्रह्म कहिये । विहंग प्रचै कवीर मिल छहिये ॥
रोरा नल कुमत अठ गांठी । गुरुके ज्ञानन भिमके साठी ॥
दोहा—अजुर्न भीम सकल मिला, कीन्ह कवीर प्रणाम ॥
सतकवीर जीवरक्षक, जै २ कवीर सतनाम ॥
निरंजन दरवारकर दूता । पाती ले आव अवधूता ॥
विष्णुहिं धाय पाती तिन दान्हा । विष्णु वांच विहसे प्रवीना ॥
फुरमाई राजाके आई । विष्णु वांचके सबहिं सुनाई ॥
पत्री निकसा चाहिय जलपाना । पुण्यमान औ जिव बलवाना ॥
भीमसु तबहीं भीमकहैं हेरा । दूत धाय गल गहा भीमकेरा ॥
घैचेउ लट पाछे करि आना । सुरक बांध ले कीन्ह पयाना ॥
भीमको अकल सबहीं भूला । मूसहिंले मंजार जस झूला ॥
कहैं कृष्ण सुन भीम हठीला । कहाँ गयो बलरंग भयो ठीला ॥
कहैं कृष्ण सुन भीम गहीरा । गाढ रक्षक सत्कवीरा ॥
कबीर शरण विना मुक्ति नहीं
३८
कर्बारुक्षणगीता ।
सत्कवीर कहहु मनमाहीं । बहुरि प्रगट कहु काल नसाहीं ॥
सुनके भीम कवीर कहि बोला । सत्कवीरको आसन डोला ॥
छिनभै समर्थ पहुँचे आई । कवीरसुनत यम चला पराई ॥
छांड भीमकहँ भागेउ काला । सत्कवीर भेटा जंजाला ॥
कृष्ण उठाय भीम कहँ लीन्हा । तब कवीरके स्तुति कीन्हा ॥
सकल देव उठ ठाढे भयऊ । सत्कवीर कहँ सोस नवायऊ ॥
दोहा-पगु छूवन सब चाहे, काहु न आवे हाथ ॥
जापर दया कवीरके, जिन पगु देहीं माथ ॥
योगयज्ञसे सैर न कामा । जबलग भजै न सदुरुनामा ॥
सदुरु सत्यकवीर दयाला । शरण कवीर भिटे ययजाला ॥
दोहा-सत्यकवीरके स्तुति, करे निरंजनराय ॥
विष्णु व्यास सुख गुरु कहत है, भाग दृश्श सतनाम ॥
अधर विवान ग्रानभै सोहा । अद्भुत चंद सूर नख मोहा ॥
स्तुति आप २ सब करहीं । जै २ सत्यकवीर उच्चरहीं ॥
कोटिन चंद सूर उगआये । अद्भुत लीला कला दिखाये ॥
विष्णु व्यास जै स्तुति सारा । सत्यकवीर जै सब उच्चार ॥
जै २ नमो २ सब कहहीं । अधर स्तुति सब एकटक रहहीं ॥
जै २ सत्यकवीर सुखदाई । विष्णु व्यास पंडौ गुण गाई ॥
जै २ सत्यकवीर दयाला । कवीरकृपाते जीतेऊँ काला ॥
जै जै समर्थ सत्य कवीर । सब घट व्यापक अजर शरीरा ॥
कवीरुष्णगीता ।
३९
सत्यकवीर संसार तेहि दीन्हा । जै जै सत्यकवीर प्रवीना ॥
जै जै अकह सो नाम कवीरा । पुष्पवास घृत घ्राण शरीरा ॥
जै जै रुपाळ कवीर गोसाईं । गऊ कपिलहिं ले यमते छुडाईं ॥
जै जै अयर नाम कवीरा । लखा घर जरत खंभ मई चौरा ॥
थाके भीम खंभ नहि आना । वाचा वंध व्याकुल भगवाना ॥
तवहीं रुष्ण कवीर पुकारा । जै पतालते खंभ उखारा ॥
जै जै कहि बहु बार कवीरा । जै राम लक्ष्मण एक शरीरा ॥
जै भरथ शत्रुघन सीता सती । जै दशरथ दायो सो क्रांती ॥
जै कवीर अमोलख भाई । जै पुष्पवास प्रति रहे समाई ॥
जै काया दल वीर कवीरा । जै अधर धजा फहरात शरीरा ॥
जै एक स्वास बहु मूंदे आंखी । भीतर सबके कवीर सुतसाखी ॥
आप आप मन ध्यान औराधे । दसों द्वार मन पवन कस बांधे ॥
प्रेम भक्त बस साहेब सोईं । माया चहे सो प्रभु नहिं होईं ॥
सत्कवीर आप निरमाया । आप न्यारा माया जग छाया ॥
माया बस पर जीव कहावे । निहमाया सतकवीर रहावे ॥
जहां अस्मिमान कपट चतुराईं । तेहि नहिं सत्यकवीर दरसाईं ॥
तन मन धन जोवन बन फूला । मन भौरा ताके रस भूला ॥
जब वन्सपती बन गई सुखाईं । भौरहि भूख लाग अधिकाईं ॥
जेहि बन देखत भौर सुलाना । तेहि बन वरस अंगार सयाना ॥
तब भौरा सरवर दिशि धांसा । पुरइन कंबल जाय अलवासा ॥
कहे कंबल भौरा वनवासी । विपत परेउ आयउ मम पासी ॥
सब देवताओंका कबीरकी स्तुति करना और कबीरका उपदेश देना
४०
कबीरकृष्णगीता ।
जब बन डगठा आग धंधाना । तब बनते मधुकर विलगाना ॥
जैसे बिन निरास अल भयऊ । तैसे माया लोभित पछतयऊ ॥
चरण कमल गुरु प्रथम न सेवा । काल वस्य तब भयऊ बहेवा ॥
विपत परत को सभर्थ चीन्हा । होय सुशील उपकारसो चीन्हा ।
अनचीन्हे विपत जो होय सहाई । तो तेहि जानिय सभर्थ साई ॥
दोहा-सत्यकबीर मोहि अनचीन्ह, सियरे परिचय नाहि ॥
कपिलमुनि भज गाठे कबीर, छोड़ाय लीन्ह जमपाहीं
बाघ निरंजन काल कसाई । तेहि सुख ते लिय कपिल छोड़ाई
कपिला गऊ कपिल मुनि कहहीं । सतकबीर सो सभर्थ अहहीं ॥
उत्तर विवान आव सत सीसा । विष्णु व्यास सुख कपिलसिरदीसा
स्तुति कीन्ह सिंहासन सारा । कंचन भर ले चरण पखारा ॥
महाप्राण कहैं दीजे अज्ञा । निराधार कबीर कहु सज्ञा ॥
पूछाहि ज्ञान विष्णु अरु व्यासा । छोटे बड़े सुनहि विश्वासा ॥
विष्णुवचन ।
कहैं कृष्णगीता मत सारा । पाठ कीय सुख लहे सो चारा ॥
पाठ करै समुझे पंथ चाले । सचदयासो जिव प्रति पाले ॥
आप जीवके रक्षा करई । ताके संकट साहेव हरई ॥
अपनी रक्षा औरकी हानी । ऐसे चाल नहा अघरानी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास प्रवीना । सुनो कथा निरगुणको चीन्हा ॥
दोहा-कहैं कृष्ण कबीरसे, होय अधीन कर जोर ॥
कहिये कथा आदि उत्पतकी, सत कबीर बंदीछोर ॥
कवीरकृष्णगीता ।
४१
कवीरवचन ।
कहैं कवीर निर्गुणकी कथा । निर्गुण सर्गुण प्रगट जथा ॥
प्रथम सत्पुरुष निर्गुण सोई । तिनके निर्गुण सर्गुण होई ॥
त्रिगुण न्यारा निर्गुण सो जानी । सो सत्यपुरुष अमृततन खानी ॥
रचा लोक अमृतकी काया । देह हिरंमर सुवास सुहाया ॥
अमृत अयको लोक संवारा । इच्छा सुर्त सकल विस्तारा ॥
प्रथमहिं सुरत अंस प्रगटाये । सुरत विहंग सकल निरमाये ॥
शब्द अजर सतनाम वखाना । तासु अंस सुरति उत्पाना ॥
प्रथमहिं ज्ञान अंस सुखदाई । दुतिय विवेक विचार निरमाई ॥
त्रितय सहजशील निरबाना । चौथे क्षमा संतोष वखाना ॥
पंचय निरंजन छठयें भवानी । सतयें योगजीत जम हानी ॥
अठयें धीरज नवें शुचि भाऊ । दसयें दया दीनता आऊ ॥
एकादसे सत सुकित नामा । द्वादश दुरमत नाम निहकामा ॥
त्रैदस आद कुम निरमाऊ । चतुर्दश जलहरंग झलकाऊ ॥
पंचैदस सो प्रेम प्रमारथ । षट्यैदस अचित पद सारथ ॥
श्रवदास कहनकी छोटा । सत्रह सुतसे काल अटोटा ॥
सोरह सुत एकपुत्री वामअंगी । देख निरंजन प्रेम उभंगी ॥
जाहे सुत जो दीयदिय स्वामी । पुरुष आज्ञा बैठे सब धामी ॥
निरंजन धरहिं अकुलाने । चौसठ जुग छिन सेवा ठाने ॥
देख अंगी काल ललचाने । होय अधीन बहु विनती ठाने ॥
दीन्हो लाय संग अष्टभुजी । मानसरोवर राज करोजी ॥
अस जिवरा ताही कहैं दीन्ह। । पारस स्वास विस्तार जोकीन्ह। ॥
व्यासका कबीरसे सत्यलोक दिखानेकी प्रार्थना करना
४२
कबीररुणगीता ।
दोहा- उठी अवाज पुरुषकी, मानसरोवर जाहु ।
बांये दहिने जिन हेरहु, सन्मुख होय सुख लाहु ॥
अमर चोलना जीवको दीन्हा । बिसरहिंनहिंजिवपुरुषपरवीना ॥
चले निरंजन आज्ञा पाई । मानसरोवर वैठे जाई ॥
मानसरोवर हंसनि रहहीं । अद्भुत चंद्र सूर्य छवि लहहीं ॥
गावहिं सब मंगल अति प्रीति । होय झनकार अनाहद रीति ॥
एक २ हंसनि छवि अनलेखा । अमरचौर काछे बहु भेषा ॥
पग अंगुली नख चंद्रकी खानी । तरवन रवि शाशि जुथलोभानी ॥
जंघ नाभी कटि चंद्रकी रासी । उरसर कंमल नाल बिनु भांसी ॥
चंद्र सूर्यकी खान हंसनी । सुखछविनिरखअकहसुखहंसनी
शोभा कौन हंसनि छवि कहऊँ । उपमा सरिस न कुछजगलहऊँ ॥
नित आरती समान सरोवर । लोककी नार नर्क न्यारा घर ॥
तहां हंसनी सुखुच्छि सयानी । शोभा अमल चंद्रकी खानी ॥
मांग टीका पटवासी सुंदर । चंद्र चौथ विधु अद्भुत दिनकर ॥
निरख हंस सब एक टक लाये । पुरुष कला छविरूप सुहाये ॥
एक कामनि सेंदुर रवि कोटी । सेंदुर सद्रु नाम अटोटी ॥
सोहे बेसर हंसनि नाका । उगे चंद्र जुथथप बांका ॥
बांका सोइ जेहि कौन नवावे । सो कबीर सब जगगुण गावे ॥
कबीरनाम भये अस सोभा । सोभा सुनत सबन मन लोबा ॥
व्यास उवाच ।
कहै व्यास देखे विन स्वाधी । कस पतिआव सो अंतयाभी ॥
कलउ भक्त गुरुवचन विश्वासी । तीनों जुग देखे विन रासी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
४३
कबीरवचन ।
कहे कबीर देह धर देखौ । आप माहिं तुम सबहिं परेसौ ॥
कोट चंद्रके सोभा जिवके । नर्क देह धर सुख नहिं पिवके ॥
ऐसे समय हंस एक पूरा । सत्कबीर जये सो सूरा ॥
ठांका देह पूरा घट जाई । पुष्प विधान हंस बैठाई ॥
हंस सहस्र सठिहार बहुता । आसपास लागे सभ जुगता ॥
परिछन हंस विवान चढि आये । अधर धजा फहराय सहाये ॥
दोहा-वाजत वाजत सरस अति, होत अंजोर अपार ।
उतरे हंस वैकुंठ तब, नाम कबीर उचार ॥
भाये हंस वैकुंठ को जवहीं । अद्वुत चंद्र सूर्य उगे तवहीं ॥
चला हंस कबीर पगु पारा । मस्तक पग दीन्हा बलभारा ॥
सकल हंस परिक्रमा करहीं । कबीर चरण रज सिरपर धरहीं ॥
हंसवचन ।
कहे हंस कबीर यम बांचे । विना कबीर काल धर नाचे ॥
सदुरु मोकेह दीन्ह परवाना । सत्कबीर सभ गुरुकहैं जाना ॥
यम त्रिण तोड काल सुख भूका । पाय प्रवाना झगरा चूका ॥
सरगुण त्रिविध झगरा ठागा । तैतिस कोट देव सब भागा ॥
जेहि पूजहु सो कछु भल माने । बिन पूजे सब झगरा ठाने ॥
ताने निर्गुण भक्त अधारा । जप कबीर यमराजहिं छारा ॥
दोहा-धन्य कबीरको नाम है, धन्य कबीरको शरण ।
जो कबीर लौ लावे, ताको जरा न मरण ॥
कबीरका उपदेश
४४
कबीरकृष्णगीत ।
चरण टेक चले हंस सुजाना । सत्यकबीर कहत घर ताना ॥
पुन वैकुंठ भये अंधियारा । बोले कृष्ण धन्य करतारा ॥
सत्यकबीर जन गुप्तहोय फिरहीं । तिनके दास ऐसे सुख करहीं ॥
सबे देव विनती अनुसारा । ले चलहु जहां अस उजियारा ॥
कबीरवचन !
कहे कबीर सत्यलोक जो जाई । अस उजियार जो तोहिं मिलाई ॥
दोहा--कर्म भर्म सब त्यागे, त्यागे जगके आस ।
सबमहैं एक ब्रह्म लखि, कबीर भजन सुखरास ॥
सबे कहें शोहिं दीजे पाना । यमसे जीव बचजाय ठिकाना ॥
कहे कबीर सुनो सब कोई । सदुरु सेय मुकफल लेई ॥
कहौं सो करौं सबहिं तब तारौं । जन्ममरण दुख दारुण टारौं ॥
सबे देव सुमरो रामके नामा । छांडो भूत प्रेत अब कामा ॥
जो जाको गुरु रामसो ताही । गुरुविन राम न तारेउ काही ॥
करहु भक्त दाया सत ठानी । अंस पृथ्वी तन घर भर नामी ॥
करु नित संतनकी सेवकाई । हृदय कबीर नाम जौलाई ॥
निरगुण सरगुण एक समाना । बीज वृक्ष विस्तार बखाना ॥
सुखमंडन पितु मातु जथाई । हृदय प्रीत पिव सदुरु साई ॥
जो कोई भक्त करे गुरुसेवा । सेवा भक्त सार पद लेवा ॥
अमृत सेवे अमृतफल लेई । विषतरु सेवे विष मिल लेई ॥
अमृतफल गुरुराम कबीरा । आगे तारव पुण्य शरीरा ॥
विन कौडी सौदा मिल नाहीं । गुरु विनको गहिहै पुन बाहीं ॥
गुरु सोई जो अंतहु मीठा । जन्ममरण सब लागे सीठा ॥
कलियुगका वृत्तान्त
कबीरकृष्णगीता ।
४५
दोहा-जन्ममरण सरगुण गुरु, निरगुण अजर कबीर ।
शरण कबीरके जो गहे, सो बहुरन धरे शरीर ॥
कथा प्रसंग कहा सुनि व्यासा । भक्ति सुक्ति महिमा प्रकाशा ॥
भक्त सुक्त पंथ सत दाय। सत्यनाम भज अम्बर काया ॥
कहे कबीर सुनो विष्णु प्यासा । सत्यकबीर जपो हर स्वासा ॥
आद अनादिको नाम कबीरा । कल प्रगटहिं अघ नासन हीरा ॥
अब तोहिं अंत खोल हम कहा । सत्यकबीरजपकलिनिरवाहा ॥
ताहि न देउं मैं पान प्रवाना । जोजीवघातआमिश भषजाना ॥
दोहा-महापुनीत पवित्र जिव, गुरु भक्ता सोइ संत ।
पर आपन जिव एक लखे, ताहि कबीर मिल कंथ ॥
विष्णु-व्यासवचन ।
कहे सो विष्णु व्यास सिर नाई । कलयुग सुनिये जो आमिश खाई ॥
कहे कृष्ण कलयुग व्योहारा । कोइन करि है सत्य विचारा ॥
बूठहिं जगलग लेपवे साही । अतीत ब्राह्मणको धका दिवाही ॥
गुरुसे शिष्य सरवर करि बोले । तेहि दोष मरकट होय डोले ॥
गुरुके धन चौराय जो खाई । ताके घर फांसी सब जाई ॥
गुरुसे सरवर पितहिं दे गारी । साधुद्रोह जिवघात खुवारी ॥
जीवदयामय दाय। जानो । जीव घात मम घात बखानो ॥
काया विष्णु कंवल दल सोहा । भज कबीर गुरु पद मोहा ॥
सत्यकबीरको चाल निगारी । सुर नर सुनि गण जानेनहारी ॥
कलिमें होइ हैं प्रापत राजा । नृप बिगरे परजा अघ छाजा ॥
कलियुगमें तरनेका मार्ग
४६
कबीरकृष्णगीता ।
कलिके ब्राह्मण काल सुभाऊ । अजिया सुतवष झस परखाऊ ॥
प्रथम मीन भवै विष्णु सरुपा । पैठ पताल जला अंधकूपा ॥
कुर्मके नखसों मृतुका आना । राई प्रवान मृतुका सो जाना ॥
सो मृतुका हरमुख विवलई । फेनसमान उठा जब कई ॥
लै फेन पवन जल लाया । शीर साठी तस पृथ्वी जमाया ॥
पृथ्वी सात औ सात अकाशा । कदलीखंभदल पृथ्वीपर चासा ॥
विष्णु जल थलमाहि समाना । विष्णु अन्न पान पकवाना ॥
जो मीन दैह पूरण कर सेवे । जलमह भात डारि कर सेवे ॥
ताके संतत भक्त गर होई । पूजे कछु मुख पावे सोई ॥
विठल ब्रह्मरूप है मोरा । बावन नरसिंह राक्षस बल तोरा ॥
परसरामचंद्र सो हमही । कृष्ण चौध निहकलंकका जवहीं ॥
नारद व्यास औ सबमें वासा । रजगुण तमगुण सहगुण वासा ॥
चौथा स्वासा कबीरको दासा । स्वासा पार सतपुर वासा ॥
पंचयै निरंजन जिव घटवारा । कबीर मोहर लख पार उतारा ॥
जो नहीं भये कबीरके दासा । ता कहै काल निरंजन आसा ॥
पुण्य लीन्ह रस त्रस जिव केरा । पुन्यमान जस तरे विव भेरा ॥
पापिहिं डार दिये यम खाई । जार खोर चौरासी भमाई ॥
पाप पुण्य महीं नाहिं उबारा । दया सत् परमारथ सुधारा ॥
नाम कबीर प्रताप उबारा । क्रीतम नाम जपेउं यम मारा ॥
आद नाम कबीर दुखहरना । क्रीतम त्रिगुण नाम तप मरना ॥
जन्म मरण दुख बडे जंगाला । जन्म मरण झरकावे काला ॥
कबीरकृष्णगीता ।
४७
तेहि दुख कबीर गुरु पगु गहा। सत्यकबीर जप हंस निरवहा ॥
सरगुण श्रेष्ठ विष्णु अधिकारा । निर्गुण सत्यकबीर जिव तारा ॥
निर्गुण भक्त बिना जमलूटे । निर्गुण बिना न संगय छूटे ॥
नकल निर्गुण कहिये निराकारा । तिन जो जीवहि कीन्ह खुवारा ॥
दूजे निर्गुण मन यम अंसा । तजि धरती साध निहसंसा ॥
चाथे निर्गुण नीर लखाया । पंचये निर्गुण पवन बहाया ॥
छठये निर्गुण गगन बखाना । सतये सत्यकबीर निरबाना ॥
आतम पवन और तन आदी । सो राम कबीरका नादी ॥
नांद निरंजन नांद अष्टंगी । नांद सुरति सोहंग तरंगी ॥
नांद पुत्र शिष्य गुरु मुख जाये । बिना शिष्य कस मुख कहाये ॥
सीखे सुने शब्द कहैं खोजा । जहां सांच ताके भये सोजा ॥
असल सांच एक कपदी दूजा । असल बोलता तज भ्रम पूजा ॥
दोहा—असल सुरति साहेब का, नर सुरत अनुहार ॥
सबै रूप तन भासे, जोत पुंज उजियार ॥
नख सिख विमल सुठ आति लोना। अथर सिंहासन अंकित भवना ॥
सिंहासनके अथर सकल सब । अथर सिंहासन सत्यकबीर जप ॥
जाके दस्त पयाना लहजीऊ । कहे कबीर ताके सोइ पीऊ ॥
पुरुष सरूप यह हंस कडिहारा। पहुँचे हंस पुरुष दरवारा ॥
कंचन पृथ्वी हंस सब रहहीं । निज२दीप सबे मुख लहहीं ॥
जेते अंस प्रगट होय आवा । धर सरूप सो नाम धरावा ॥
पुरुष अमान सीलके खानी । समर्थ नाम अकह सो जानी ॥
सबे नाम है साहेब केरा । अकह नाम सो हंस निवैरा ॥
सद्गुरु और गुरुके लक्षण और चिह्न
( ४८ )
कविरक्तुणगीता ।
अकह नाम सो सद्गुरु भाषा । सद्गुरु सब पूरण अभिलाषा ॥
जासों डोरी पुरुषकी पावे । सत्पुरुष सम तेहि चित्तलोवे ॥
केने गुरुवा कपट कराहीं । सीखहिं शब्द सिखावत नाहीं ॥
कपटी गुरु जो शब्द न देई । पूजा पाठ लेख पुन लेई ॥
पूछे शिष्य तब ज्ञानके बाता । पूजा थोर क्रोध गुरु ताता ॥
गुरु सो जेहि अस कत सिष भाऊ। पूजे बिन पूजे एक ताऊ ॥
पूजा लेय पुनि राह बतावे । अमरलोक ले जिव पहुँचावे ॥
अकह कथाको गम न पावे । सो सद्गुरु कवीर समुझावे ॥
जे शिष्य बहुत गम्य कर बोले । गुरुकी सेवा करे दिल खोले ॥
मात पिताको सेवक जो सुत । सोइ सपूत जो गुरु सेवा जुगत ॥
दोहा-सेवा देवा लेवा करे, पखलधार तब जान ॥
गुरु सोई जो ज्ञान दे, सेवक सेवा ठान ॥
सेवक होय करे गुरु निंदा । ज्ञान पाय कहे गुरु दाहनबिंदा ॥
चेला गुरु पूंजी दे खोई । गुरु बिन सेवा लाभ न होई ॥
कविरचन ।
दोहा- कहैं कवीर सुन देव मुनि, कृष्णकपिल मुनि व्यास ।
तुम सब सेवो साधु गुरु, छोड़ धर्म विश्वास ॥
धर्म विश्वास कालकी फांसी । प्रेत भूत आस दुखरासी ॥
गुरु तज सकल आस दुखखानी । गुरु बिन नर्क परे अभियानी ॥
गुरु सोई जो अंतहु गीठा । जन्म मरण गुरु लागे सीठा ॥
सकलदेववचन व कुबेरका गुरु उपदेश लेना
कवीरकृष्णगीतः ।
४९
सकलदेव वचन ।
सकल देव उठ चरण यनावा । श्रीहरिविलस गलताव सुनावा ॥
हम सब परे निरंजन फांसा । सत्यकवीर काटे यम त्रासा ॥
जन्मत भरत बहुत दुख पावा । अब कवीरके चरण चितलावा ॥
यमसे एक तुम राखन हारा । कवीर वांचे सब यमके चारा ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर तुम सब तन धरहूँ । क्रितम देह हरि सेवा करहूँ ॥
अमृतदेह अमर घर जाई । क्रितम देह घर ठार समाई ॥
सत्य देह हंसके संग। सत्य देह विदेह प्रसंगा ॥
अब सुनो ज्ञान पान परचाई । थित पान दे लोक पठाई ॥
उठे कुबेर हरिपद लपटाने । सत्य कवीर गुरु लरन सो ठाने ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलाकित होय वाणी । सत्यकवीर सट्टुर सुखदानी ॥
कोट जन्म तप पुंज जेहि होई । सतकवीर कहैं सेवहिं सौई ॥
उठे हर्षित हरि आज्ञा पाई । कवीरके सन्मुख महिपर धाई ॥
कहैं कुबेर सीस महि लाई । आद पुरुष कवीर प्रगटाई ॥
कवीर वचन ।
कहैं कवीर तुम हरि गुरु भजहूँ । तजहु कुपंथ आमिख भष तजहूँ ॥
देवता आमिख लेय मधुवासा । और आमिख बहु देव गरासा ॥
कुबेर वचन ।
कहैं कुबेर मोहिं आपन करहूँ । दे परवाना कर्मज हरहूँ ॥
तुमही कर्ता मूल सकलके । तीन लोककर भक्त न कलके ॥
तुम्हरे अंस जीव सब स्वाभी । निरंजनके मूल तुम अंतर्थाभी ॥
५०
कबीरकृष्णगीता ।
कबीर वचन ।
सत्कबीर विहस कह बाता । सहि कुबेर शरण यम आता ॥
आरती साज अब आन तुरंता । नीरयर पान मिष्टान्न भुगंता ॥
बहुत सुगंध फूल बहुताई । सुरत सुवास सेत फललाई ॥
मेवा वस्तर पटंबर छाजा । लोक प्रभाव उदै मनु साजा ॥
अन्हद शब्द सो मंगलचारा । सानंद सट्टुर भक्त अपारा ॥
सबे देव मिल मंगल गावहिं । जै २ सत्कबीर उचारहिं ॥
साजेड थार जोत प्रकाशा । अथर थार सिंहासन स्वासा ॥
भोग लगाय पुरुष सतनामा । लियो छोर यम फंदते प्राणा ॥
यमराजा सो त्रिण नोडाई । काल भूतके सुंह भुकाई ॥
शब्द वाक्य कह दीन्हों बीरा । सुरति समानी सत्य कबीरा ॥
चरणामृत तुलसी माला । दीन्हें तिलक सर्व सुखचाला ॥
कहहिं सिखावन दंडवत गुरुसाता । तीन दंडवत साथ पिपुमाता ॥
रहिय गुरुके चरण लौलीना । रामनाम गुरु साधुहिं चीन्हा ॥
केतो पढके निडर रहई । गुरुकी शक्ति सबे निरवहई ॥
पढा देवता दया जेहि हिये । दयाहीन यम कातर हिये ॥
गुरु सिवायकछु आस न करिये । सट्टुर भज सतलोक पगु धरिये ॥
सट्टुर सत्यकबीर निज नामा । जहाँ प्रेम तँहँवा गुरुनामा ॥
बिना प्रेम जग होत बिगाना । तात मात बिन प्रेम बिगाना ॥
आन सो प्रेम करे सो सुरखा । कबीर कृष्ण तरे सब पुरखा ॥
कबीर बिना कोई तारे नाहीं । त्रिभुवन सब परंपची आहीं ॥
कृष्णका दीक्षा लेनेके लिये प्रार्थना करना
कवीरकृष्णगीता ।
५१
एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥
धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥
दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।
गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥
धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥
दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।
आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥
पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥
सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥
पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥
पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥
रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥
विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥
जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥
दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।
विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥
जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥
५२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा--कहैं कबीर कृष्णसे, मनमो राखो धीर ।
आगे वीरा देव तोहि,हमार अंस तुम वीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास कबीर हर वंसा । सबके मूल कबीर निहसंसा ॥
अपने मन सब सदुरु चेला । सदुरु शिष्य जेहि नाम थिला ॥
हम सब सदुरु निंदे सुनि जेतै । सबके सदुरु कबीर गति देतै ॥
रवि प्रकाश भौ तिगिर नासा । कीतम त्रिगुण तिगिर तन भासा ॥
निर्गुण भक्त प्रकाश रवि जाना । निरगुण सरगुण माहिं समाना ॥
निर्गुण स्वासा सरगुण देहीं । यमसे बांचे कबीर सनेहीं ॥
कबीरवचन ।
दोहा--कहैं कबीर हम सब घट, राम रूप तन स्वास ।
स्वासा पुरुष नार तन, स्वासा विकसत न नास ॥
व्यास सुखदेव वचन
कहैं व्यास सुखदेव कर जोरी । यम तन कांच जीव बंदी छोरी ॥
यह तन विनसत बार न लगे । ना जानो स्वासा कब वागे ॥
कपिलमुनि गाय सो तुमहि बचाया । जो बांचे सो कबीरकी दाया ॥
दीजे सुख पान मोहिं आतुर । सुखे प्रथम चेतै सो चातुर ॥
वाघ निरंजन सब जिव गार्ई । सवा लाख नित खाय कसाई ॥
सो जिव बांचे काल तुम आसा । नाम कबीर जाहिपर बासा ॥
दोहा--एक ठांव बन कपिल मुनि, दूसर स्वास सुखदेव ।
सब जिव प्रासे वाघ यम, तुम कबीर लख लेव ॥
तब कबीर जिव उपजी दाया । मानिद पान सो सबहिं खवाया ॥