कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
About this granth
Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.
Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.
The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.
२४
कवीररुणगीता ।
पुन नारद रानीकहैं पूछा । सुत विन तोर गोद भयो छूछा ॥
गुरु विन राम नाम नहिं पावा । रामचंद्र गुरु नाम लखावा ॥
कहैं रानी गहुं नृपके पाऊं । छूछा सोईजो गुरु न कराऊ ॥
गुरु विन राम नाम नहिं पावा । रामचंद्र गुरुनाम लखावा ॥
हमरे स्वाधी सिरपर आहीं । गुरु साधन बल हर्ष कराहीं ॥
कहा कृपी तैं डाइन आही । तेही पुत्र स्वाय निज चाही ॥
सही ऋषितै निहचे यह भाषा । ऐसी बोले सहे तुव साखा ॥
मात पिता जो सुतकहैं खाले । कहु जन्म छटी प्रतिपाले ॥
जैसे निरंजन पाले वाले । ऐसी चाल तुमहिं कहैं चाले ॥
हमरे साहेब सत्कव्वीरा । अमित प्राप्त तेही अजर शरीरा ॥
सो पालक बालक निराकाला । ताहिगिसल तुमवो अस चाला ॥
निरंकार बहु तन धर मूवा । पुरुषके वंश निरंजन तूवा ॥
दश अवतार महा दगपाला । हरि हर अज धर खाये काला ॥
कवीरके हंससे काल निनारा । सो पहुँचे सतपुरुष दरवारा ॥
सत् पुरुष सोई सत्कव्वीरा । कोइ जन भूले देख शरीरा ॥
ऐसी मम संगत ऋषिराई । कैसी संगत कहहु बुझाई ॥
जश पंछी लिये वृक्ष बसेरा । चुगन चले जित कित तब फेरा ॥
को केहि पूछ कुशल औ क्षेमा । ऐसो पुन निरयोह व्रत नेमा ॥
पुन नानाविध भावना कीन्हा । एक रती कछु मोह न चीन्हा ॥
नारद पूछा कुंभर बियाही । तुव मन बहुर जारके पांही ॥
कहैं बहुर नृपके सिर नाहीं । सास बंद गुरु स्वाधी सुख चाही ॥
हमरे स्वामी सुवा न मरि हैं । तजके देह अमर तन धरिहैं ॥
कवीरकृष्णगीतः ।
३५
सचछोक सुख अभूतस्नानी । एके संग रहब दोह प्राणी ॥
तुम्हरे वंश होइहे रांडी । कंथ बेसुख धगडन सो मांडी ॥
मैं पतिव्रता सटुरुके चेली । आप देऊं तो साथ मत हेली ॥
एक कहाँ सो सब सुन राखो । प्रातीह नारद सुख नाम भाषो ॥
नारद कोप कीन्ह परनामा । मोपर कोप न कीजे बाया ॥
जाकर स्वामी भर जग जाई । सुनतहीं रोर करे चिल्लाई ॥
कुंभर बध कहे सुन कपि सुर्षा । रोष जिये तो मरे न पुरुषा ॥
मरे सोइ जो गुरु नहीं कीन्हा । हमरे शिरपर सपर्य चीन्हा ॥
जेते दिना लिखा एक संग । वोही जोत मई धसत पतंगा ॥
ऐसी संगत हमरे पाई । अस सोइ करे ज्ञान जेहि याडे ॥
कैसी संगत तुम्हरी बाला । जसपनिहारिन कलशभरि चाला ॥
दस घरकी तब एकहिं ठाई । कलश भारि २ लीन्ह उठाई ॥
घाट पंथ जित तित भई नारी । ऐसी संगत कृषी हमारी ॥
ऐसी समय कुंभर चलि आये । नारद सुख देख कारिख आये ॥
कुंभर उतर कीन्हे प्रणामा । परम गुरु पितृ मात द्विज रामा ॥
नारद कुंभरसो विनती लाई । हम यह दरश एक बात जनाई ॥
मिथ्या वचन कहा हम आई । तुम्हरे सुयेकी खबर जनाई ॥
कोइ तोह लाग रोवे नहीं भाई । तुव मृतु सुन सबगती कराई ॥
कहैं कुंभर रोवे किहि काहीं । जो रोवे भरना पुनि ताही ॥
सुये कारण नहीं रोइये स्वामी । तब मृत्युका गाडे प्राणी ॥
सुये चलावा मंगल गाई । गुरु साधुकी सेवा लाई ॥
अन्नदान कंचन दिज जाना । मृतुका पहुंचे गुरु निज धामा ॥
३
२६
कबीरकृष्णगीता ।
अविनाशी राम सोइसत कबीरा । सो मम सतगुरु अजर शरीरा ॥
ऐसी संगत हमरी पांडे । हम सब जीवहिं जाने भांडे ॥
कहो कुंअर अस संगत तोरी । सुनहु ऋषी अस संगत मोरी ॥
जैसे पथिक बसे सराई । प्रात भये अपने पथ जाई ॥
कोउ काहूको बात न पूछा । प्राण गये जस काया छूछा ॥
हम सबके जीवन सतनामा । सतसंगत गुरु भक्त विथामा ॥
नारद उठ परिक्रमा कीन्हा । तब चूप सुतहिं जो बैठक दीन्हा ॥
ऋषी विनय कर पाक कराई । नाना व्यंजन परसे जवाई ॥
दोहा-बिदा भये ऋषि नृपते, आप नगर महद्देख ।
हर्ष विस्मय ऋषि चित्तमें, कला निरमोह अलेख ॥
एक चमार चलेउ पुर माहीं । सोई मृत्यु कहैं रोवत नाहीं ॥
तहां जाव नारद भये ठाढा । कृत्य करत मृतुक ले काढा ॥
तब ऋषि पूछा सभरहि जाई । कस नहिं रोवस मनुष भराई ॥
हाडी कहै रोवहिं कोहि लागी । गुरु मुख होय मुख अतुरागी ॥
साकट भरे काल मुख जाई । गुरुमुख तनतज हरिपहैं जाई ॥
राजा भयो कबीरको शिष्या । हम सब रामचरण चित लिख्या ॥
राम भजे सो साधुकी चाली । भिला कबीर भिटा जंजाली ॥
जो जन्मे तेहि मृत्यु कर लेखो । महितन अच्छत जियत ना देखो ॥
जिन प्रभु दिया तिनहिं हरलिथा । मरन जियनकी सोच न किया ॥
ऐसी संगत आय हमारी । कैसी संगत कहो विचारी ॥
ऐसी संगति ऋषि सुनि मोरी । तिरबो अस जस लकडी जोरी ॥
सच्चे गुरुकी पहिचान
कवीरकृष्णगीता ।
२७
छूटे भँवर होय दोय दीशा । दोमहँ एक रोक नहिं दीसा ॥
कुशल काहुकहँ पूछहिं भाई । ऐसी संगत हमरि गोसाईं ॥
दोहा सुन नारद अचरज भये, हरि पहुँ कीन्ह पयान ।
हरिसे चरित्र कहा सब, धन निरमोह सुजान ॥
ऋषि उवाच ।
कहँ ऋषि सुन दीन दयाला । नृप निरमोह जियत कलिकाला ॥
अस २ संत आहिं जग माहीं । धन्य जो सतकवीर जेहि छाहीं ॥
अस योहि दया करो भगवाना । वस्ती तज वन करहिं पयाना ॥
कुल परिवार झूठ हम जानी । सत्तनाम एक सार बखानी ॥
कृष्ण वचन ।
कहँ कृष्ण वन किभि चलि जाहू । गुरुके गूह निज भाकि कमाहूँ ॥
हम ब्रह्मा सुत सब ते जेठे । जगमें और सकल मम हेठे ॥
कहँ कृष्ण जो करता आवे । बिन गुरु ते उबार नहिं पावे ॥
तुम कितने आहू किह माहीं । मम निरवाह गुरु बिन नाहीं ॥
गुरु बिन साकट प्रेत समाना । साकटके सिर जमको थाना ॥
धरती कहँ साकट है भारी । औ प्राणी भारी बेविचारी ॥
जस चंदा बिन रैन औधरी । तस साकट ले जिव जन घेरी ॥
रवि न दिवस ईश बिन सैना । गुरु बिन साकट अंध जन नैना ॥
बिन देवल देवस्थल जैसे । बिन गुरुके प्राणी है तैसे ॥
बिन दीपक जस घर औधियारा । तस गुरु बिन साकट जम चारा ॥
कहँ नारद गुरु का कहँ करऊं । जेहिने तुम्हरे चित संचरऊं ॥
२८
कबीरकृष्णगीता ।
कहैं कृष्ण गुरु कर निरबंदा । नारी तजै तजै कुल दंदा ॥
विष्णव गृह त्यागीं वैरागी । ऐसे गुरुके शरणन लागी ॥
गुरु कबीर पंथतन धारी । सदुरुके सब जिव निस्तारी ॥
सदुरु सत्कबीर निरवाना । जाके त्रास काळ भय माना ॥
अब तो गुरु तुम प्रातहिं करहु । प्रात प्रथम मिलै तेहि पण धरहु ॥
दोहा-नारद गवने निज मठ, प्रात जाय गुरु कीन्ह ।
मछवा मिलै पंथ महँ, तासो दीक्षा लीन्ह ॥
दीक्षा ले वैकुंठ पगु धारे । हरिके आगे वचन उचारे ॥
गुरु कियौपै जातके हीना । तुव आज्ञा मछवा गुरु कीन्हा ॥
कहैं कृष्ण गुरु कहैंपै लाऊ । अब ऋषि तुम चौरासी जाऊ ॥
बेगि जाहु तुम गुरुके पास । अपने औगुण करहु प्रकाशा ॥
तब गुरु आज्ञा जैसी होई । किये निसतार सुनहु ऋषि सोई ॥
चले ऋषि तेहि जग महँ आथे । बहुर तहां गुरु दर्शन पाथे ॥
चरण सीस दे विनती लाई । मोहिसे अवगुण भयउ गोसाई ॥
कैसे अवगुण बेगि सो कहहु । गुरुसे कह अंतर अवकरहु ॥
गुरुसे कपट करे गुरु जिंदा । साधु द्रोह नर यमके बंदा ॥
सुनत ऋषि थरहर पगु धरेऊ । केहि अवगुणसे प्रगट कहेऊ ॥
भयउ दया तुम दीक्षा दीन्हा । ठाकुर मोसन पूछन लीन्हा ॥
कहहु ऋषी गुरु कैसन कीन्हा । तब हम कहैं गुरु कीन्ह कर्थाना ॥
ऐसे कहि हम वचन अधीना । हमरे जोग नहीं गुरु ध्याना ॥
औपै नीच जातपै आना । * * * * *
नारदके गुरु करने और चौरासी भोगसे छूटनेकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
२९
यह सुन कृष्ण कहा मोहि सेती । जात मनुष्य गुरु कहे अनेती ॥
तुम ठाकुर कहो कौन सजाई । कहे नारद तुम कहो बुझाई ॥
कृष्ण कहा भरमो चौरासी । तब छूटे ऋषि यम गर फांसी ॥
ताते तुम पहुँ आयउँ स्वामी । कहो सो करहुँ मैं अंतयंगिनी ॥
अब तुम कहो कृष्णसों जाई । क्षित चौरासी लिख दिसलाई ॥
तब हरि लिखें पृथ्वी चौरासी । लोट पोट कर छटे फांसी ॥
चले ऋषि गुरु कहैं सिर नाई । ठाकुरसे गये विनती लाई ॥
लिख देव स्वामी मम चौरासी । बूझ लेव तब भर्मउ दासी ॥
लिखा कृष्ण भूतल अघरवानी । लोटहिं नारदमुनि विलखानी ॥
कहे कृष्ण तुम यह का काहूँ । महि महीं लोट रेहे तुम करहूँ ॥
भरमो चौरासी हरि सुन वैना । हरि भर आये जल धर नैना ॥
कहें ऋषी यह बुध किन दीन्हा । कहें ऋषी गुरु मोक्ष मम कीन्हा ॥
कहा कृष्ण अस गुरु परतापा । गुरुसम जग हित नहिं पितुभाता ॥
पिता निरंजन गुरुसम मोरा । गुरु दुरवासा ऋषि गतघोरा ॥
सदृढ़ सचकवीर हमारे । कवीरके शरण इकोतर तारे
दोहा—कहें कृष्ण सुन नारद गुरु, बढेके द्विजराज ।
कह ऋषि गुरु सबते बढे, गुरु गरीब निवाज ॥
गुरुसम काहु न देख गोसाई । करता पितु जननी ओ भाई ॥
गुरु हैं सवपर ईश गोसाई । कहें कृष्ण नारद समुझाई ॥
नारद ऋषि उठ चरणन लागे । श्रीपति तुम मोहि कीन्ह सुभागे ॥
जो हम ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । गुरु विन इतने बात न जानी ॥
३०
कबीरकृष्णगीता ।
धन्य गुरु अब धन्य सो कहिये । जासु चिन्हाये गुरुपद लहिये ॥
यथमहि रजगुण गुरुकी महिमा । सुनहु सतोयुण गुरुकी महिमा ॥
तमगुण गुरुकी कहहुँ सुभाऊ । देवी पंथकर चाल लखाऊ ॥
देव निरंजन पंचम कहिये । जोत अकाश होय दरशन लहिये ॥
छठयें जीव सतयें सतनामा । सत्यनाम संतन सुखधामा ॥
संतके प्राण सब जीव सुखदाई । सोई सत कबीर गोसाई ॥
एक जीव त्रिगुण दरशावे । इंगला पिंगला सुखमन भावे ॥
दोहा-वौये इंगला दहिने पिंगला, मध्यसुषुम्णा नार ।
तापर मनपर मन निज मन है, सोई रूप हमार ॥
निज मनपर तिहासन साजा । तापर सतकबीर विराजा ॥
तहैं न काल जंजाल न व्यापा । नहिं तहैं पुन्य नहीं तहैं पापा ॥
तहां न रवि शाशिके उजियारी । एक रोम विध कोट चिकारी ॥
पांच पचीस तीन नहिं तहां । त्रिगुण न नाम कबीरसो जहां ॥
रूप स्वरूप सो निर्मल काया । अजरहिरंवर हंस रहाया ॥
दोहा-एक हंसकी शोभा, रवि शाशिको कोटन तूल ।
तहां सो सत्यकबीर विराजे, सब जीवनके मूल ॥
पूरण पुन्यमान जिव होई । सतकबीर कहैं सेवे सोई ॥
लखन कोट माहीं एक जीवा । सो करिहैं कबीरको पीवा ॥
जेहि होय दाम सो खाय मिठाई । मकरा घांस रंक ले खाई ॥
तैसे दाम सहज सतदाया । पूरण पुण्य सदुरु पद पाया ॥
सदुरु सत्यकबीर जिव व्याही । जीव व्याह अयरलोकलै जाही ॥
सुपथ कुपथका वर्णन व त्रिगुणी जीवका वर्णन
कवीरकृष्णगीता ।
३१
अमरलोक सुख वराणि न जाई । छिप एक महमें गये अघाई ॥
अजर सुक चाहे जो कोई । सो सद्गुरु कवीर शिष्य होई ॥
बिना कवीर सांच कहु नाहीं । तीन लोकसो आवहि जाई ॥
सत्कवीर सो सचनिवासी । सत्यलोक अमरपुरवासी ॥
जीव दयाको जन पगु धारा । दासा तन धरि शब्दपुकारा ॥
दास कहाय प्रगट भये काशी । शिष्य कहाय रामानंद विलासी ॥
सन्यासीसे भये वैरागी । रामदत्त रामानंद अनुरागी ॥
कवीर ब्रह्म आपन जगआदा । तिन गुरु कीन्ह बाध भरजादा ॥
पाछे तब हमहूं गुरु कीन्हा । तब गुरु कीन्ह सबन भल दीन्हा ॥
रामानंद आनंद सरूपी । जन कवीर परमानंद रूपी ॥
रामानंद कला एक मोरा । सत्यकवीर समर्थ बंदीछोरा ॥
बडा नवे छोटा अभिमाना । शीतल ज्ञानकोध अज्ञाना ॥
ताते अमरपद चीन्है भाई । सुपंथ चले सो कवीर घर पाई ।
कछु सुपंथ कछु पंथे चाहे । सो तो रामचरणचित्त आहे ॥
झूठे लंपट चोर छिनारा । यह लक्षण रजगुण निरवारा ॥
क्रोध कपट पारसंड बढाई । यह तम गुण जीव दुखदाई ॥
सतगुण सत् कपट नहिं भावे । प्रेम भक्त गुरु दर्शन पावे ॥
गुरुदर्शन प्रभुदर्शन मानो । साधु दर्श गुरु दर्श बखानो ॥
सत्कवीर सतगुणके मूला । उनकी पटतर कोई नहिं तूला ॥
और सवे छल छुद्र समाना । रागद्वेष मान अभिमाना ॥
कहैं कृष्ण मोहि मन वच सेवे । हरदम नाम ह्यारा लेवे ॥
पाण्डव और कृष्ण संवाद
३२
कवीरकृष्णगीता ।
दया क्षमा सत गहे सो पंथा । दीन दुखी पातक भगवंता ॥
गुरु साधमहैं मोकहैं देखे । घात द्रोह तज पंथ परेखे ॥
भेटो आप मृतककी नाई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥
रहे जो पुण्य सो प्राणी । रामनाम भज वरतन जानी ॥
नरतन पाय जो भजे कबीरा । कवीर भेंट मिटे तनपीरा ॥
शिव तमगुणकी भक्तिजो करई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥
देवि भक्त चौरासी वासा । भक्त करे तन परे यम फांसा ॥
शूकर भान गिद्ध मंजारी । परे चौरासी मांस अहारी ॥
दिन रस चेटक भूत यसाना । नामभक्त बिन यमघर थाना ॥
जाहि ज्ञान जाके मन थाका । आतम परमातम पंथ ताका ॥
परआतम सब आतम कीन्हा । बिरलेआतम परमातम चीन्हा ॥
जिन चीन्हा तिन्ह सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सत्कवीर निज भेवा ॥
नारद मगन भये सुन वाणी । धन्य कवीरजो कीन्ह वखानी ॥
अर्जुनउवाच ।
अर्जुन पूछे सीस नवाई । अवलग्न हय नहीं पूछ गोसाई ॥
को कवीर कहवाते आये । जाकी ऐसी स्तुति लाये ॥
भक्त कवीर जो रहे एक तोरा । तुमते कौन बड़ा सुन मोरा ॥
युधिष्ठिरवचन ।
कहैं युधिष्ठिर सुनहु महिंदा । गुरु साधकर जितकर निंदा ॥
गुरुके निंदा साधुके खोटी । जुरेनसे जन वस्तर रोटी ॥
ताकर वंश होय निर्दंशा । जो साधुके निंदा परसंसा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
३३
भीम वचन ।
कहे भीम अर्जुन भल कहा । सुना कबीर जुल्हा एक रहा ॥
ताकी एतिक करे बड़ाई । तब सहदेन बोले रिस आई ॥
तुम कबीर कह सके बूझा । अबहिं तोहिं गुरुमत नहिं सुझा ॥
कबीर नाम करता आविनासी । कबीर भजे तेहि छूटे चौरासी ॥
नकुल वचन ।
कहे नकुल भक्त कहा गोसाईं । जेहि मधु तारे सो तर जाई ॥
सुनिके कृष्ण कहा सुन भीमा । अर्जुन पठे तिनहु नहिं चीन्हा ॥
दोहा—सोई कबीर तुम चीन्हहु, जेहि शिष्य घंट बजाय ॥
द्वार भक्त सुदरसन, डोम स्वपच बरणाय ॥
कबीर सोई जाको अस शिष्या। हम सब जीव कबीर घर भीषा ॥
जोलहा आद जासु जगताना । सुरझे साथ साकट अरुझाना ॥
चंदसूर जाके दोय तारा । करि गह काया बिनहि रिसारा ॥
इंगला पिंगला चले दोय घोटी । मध्य सुषुम्णा हांथ जोटी ॥
सरसों तीन साठ लग जानी । अर्ध उर्ध दोय खूँटी तानी ॥
तानी ताना भरनी सुत स्वासा । निहचल बिनहि कबीरा दासा ॥
धरती अकाश पवन औ पानी । रचा कबीर सकल रजधानी ॥
फिरहिं जगतमहँ आप छिपाये । भक्त सुक पथ इनाहिं चलाये ॥
जासे तबहिं निरंजन राई । हम तुम कौन गलीमहँ भाई ॥
संकट माहिं कबीर सहाई । बंदी छोर कबीर गोसाईं ॥
करताका कोइ अंत न पावे । तरे सोई जो भक्त कमावे ॥
कपिल मुनि वचन (निज वृत्तान्त)
३४
कबीरकृष्णगीता ।
अर्जुन भीम कृष्ण पग लगे । निहचछ सोयते अब जाये ॥
कृष्ण युधिष्ठिर कहैं इसारा । अधम उधारन नाम कबीरा ॥
राम नाम कबीर प्रकाशा । राम कबोर दोष एक अवासा ॥
युधिष्ठिर वचन ।
कहैं युधिष्ठिर सुनहु स्वामी । आज कहों तोहि अंतर्धारिनी ॥
जा दिन कहा तुव पुर्षा तारे । बुढ़े नरकते जाय विकारे ॥
तब तुव आज्ञा सिरपर राखा । बांये अंगुली नरकमहैं नांखा ॥
पांव पकड़ मोहिं पित्रन रैंचे । नाम कबीर सुमर तब बांचे ॥
और नाम बहु सुमरेहुं जाई । तजहिं न पित्र मोहिले जाई ॥
तब मैं सचकबीर पुकारा । तत्तिछिण भयउँ नरकते न्यारा ॥
तबसे हम कबीरको चीन्हा । कबीर कहत भये अघते भिन्ना ॥
जबहिं हम युधिष्ठिर ऐसी कहा । तबहिं कपिलमुनि उठकर गहा ॥
कपिलमुनि वचन ।
धन्य युधिष्ठिर कह दुलराये । तुमहु लख कबीर कहैं पाये ॥
कबीर आप हैं समर्थ साई । जाकी रची सकल दुनिआई ॥
आपन बढाई विष्णुहिं दीन्हा । आप दास भये अस अधीना ॥
एक दिन व्यास निरंजन ईशा । औरहिं भया चितवे यम दीसा ॥
सवा लाख सँग पहुँचे जाई । सूर्य दैय यम चला गौसाई ॥
तब कबीर कहैं कीन्ह चिकारा । भिन्यर के मोहि निरंजन डारा ॥
दूतहिं कहा हंस केहि आना । भाष बेग नतो करौ निदाना ॥
बोला श्रीहर दूत होय आगे । डरहिं दूत सब कांपन लागे ॥
कबीरकृष्णगीता ।
३५
इन नहिं कीन्ह कबीरपुकारा । निरसत जोत तहाँ हम मारा ॥
यहां आय कबीर गोहरायै । वहाँ जोगके गर्भ खुलायै ॥
जोग भोग नहिं जानो भाई । कबीर नाम भज काल न खाई ॥
तबहिं निरंजन दूतहिं बुझावा । यहि धारि डार तुरत तब नावा ॥
दोहा—इतना कहा निरंजन, तत्क्षण प्रगट कबीर ॥
किन मम हंस दुखावा, केहि भारी भौ शरीर ॥
दूत अंध भय पैल पुराने । चल न सके बलहीन तुलाने ॥
देख कबीर निरंजन नीरा । धाय कबीरके चरणन गीरा ॥
थरहर कहे चूक नहिं मोरा । अलग हंस बैठारडं तोरा ॥
सतकबीर सुनि कपिलहि पूछा । कहा कपिल कुछ नाहिं विगूचा ॥
दोहा—तब कबीर दाय़ा करि, मोहे ले चलेउ लियाय ॥
कहे काल मैं चेशो ते ये, तुम राखो मम ठान ॥
तब हम कबीर उर धारा । कहे कबीर भये जभते न्यारा ॥
कहे कपिल सुनि सुन हो भीमा । धन्य कबीर निरंजन सीमा ॥
जहां निरंजन कहैं सब धावे । वहाँ अंत जीवन झरकावे ॥
कहैं कपिल सुनि सुन सहदेवा । विरले पावे कबीरको भेवा ॥
अब हम लेव कबीर प्रवाना । भज कबीर निज घर कहैं जाना ॥
सुने कबीर के महिमा भारी । इच्छा दर्श सबन चित धारी ॥
अर्जुन विनति कृष्णसों करही । हमहुं सतकबीर पगु धरही ॥
कहे कृष्ण तुम हमहीं चीन्हा । अबही कस साहेब चित दीन्हा ॥
३६
कवीरकृष्णगीता ।
हम कहैं तुम मानुष कर जाना । तुम नहिं वचन हमारा माना ॥
अजुन कह तोहे मोहन छूटा । मोह मार सिद्ध सुनि लूटा ॥
जेठा बढा जो कहै सिखाई । मानिये ताको सीस नवाई ॥
राय युधिष्ठिर कबीर गुण कहा । हमहू कहा सो चित नहिं रहा ॥
हम सब कहैं कबीर सिखावा । मनसे मोह प्रगट सब भावा ॥
दीन्ह निरंजन कहैं बिलोका । जीवन सुखदे तुमाहिं निसोका ॥
सकल जीव औ सतकी दाया । जोत अष्टंगी पुरुष निरमाया ॥
दीन्ह निरंजन कहैं जागरी । ओइ पुरुष सोइ सत्तकवीरा ॥
सतलोकवासी अविचल नामा । अविचल नाम कबीर सुखधामा ॥
सत्तकवीर हम सबहि सिखावा । राम निरंजन जगहि ददावा ॥
राम निरंजन प्रगट विस्तारी । कृष्ण अज औ हर संसारी ॥
इन सब कहैं लूटवे हर साजा । क्षौर असवारी पीछे राजा ॥
जो निरगुणकी सब महिमा पावे । तोसरगुणके कोइ निकट न आवे
निरगुण कबीर त्रिगुणते न्यारा । निरंजन त्रिगुण सरगुण पक्षारा ॥
निरंजन कहैं जग निरगुण कहता । निरगुण तो जोइन नहिं वहता ॥
निरंजन तो जोइन मह आये । तन धर कृतम नरक भुगतये ॥
क्रीतम सखा त्रिगुण कियो कर्ता । कर्ता हर्ता भर्ता नहिं मरता ॥
जो कर्ता आपहि भर जाई । तो तेहि क्रीतम कहिये भाई ॥
निरंजन तो तन धर २ मूवा । आदि कर्ता कहु कैसे हूवा ॥
आदि कर्ता सो सत्तकवीरा । जो नहिं गले न जरे शरीरा ॥
अकह अगह छाया तन नाहीं । स्वासा से तस रंग लखाही ॥
कवीरकृष्णगीता ।
( ३७ )
स्वासा पूंजी सवके भाई । सो स्वासा कवीर निरमाई ॥
स्वासा देह लिये संगे चले । निकसत स्वासा देह महि मिले ॥
देहीं त्रिगुण राय निरंजन । स्वासा अंस कवीर दुख भंजन ॥
स्वासा आद पवन है भाई । नासिका वाट सो आवहिं जाई ॥
नासिका निकट सो दरसे आतम । आतम दरस दरसे परमातम ॥
छचीस नीर और पवन पचासी । ताते न्यारा सोहंग अविनासी ॥
सोहंग जीव सुखसागर केरा । तन धर भुगते दुःख घनेरा ॥
केदली ब्रह्मके नाम सोहंगा । जाको मूल सो शब्द विहंगा ॥
जीवके नाम केदल ब्रह्म कहिये । विहंग प्रचै कवीर मिल छहिये ॥
रोरा नल कुमत अठ गांठी । गुरुके ज्ञानन भिमके साठी ॥
दोहा—अजुर्न भीम सकल मिला, कीन्ह कवीर प्रणाम ॥
सतकवीर जीवरक्षक, जै २ कवीर सतनाम ॥
निरंजन दरवारकर दूता । पाती ले आव अवधूता ॥
विष्णुहिं धाय पाती तिन दान्हा । विष्णु वांच विहसे प्रवीना ॥
फुरमाई राजाके आई । विष्णु वांचके सबहिं सुनाई ॥
पत्री निकसा चाहिय जलपाना । पुण्यमान औ जिव बलवाना ॥
भीमसु तबहीं भीमकहैं हेरा । दूत धाय गल गहा भीमकेरा ॥
घैचेउ लट पाछे करि आना । सुरक बांध ले कीन्ह पयाना ॥
भीमको अकल सबहीं भूला । मूसहिंले मंजार जस झूला ॥
कहैं कृष्ण सुन भीम हठीला । कहाँ गयो बलरंग भयो ठीला ॥
कहैं कृष्ण सुन भीम गहीरा । गाढ रक्षक सत्कवीरा ॥
कबीर शरण विना मुक्ति नहीं
३८
कर्बारुक्षणगीता ।
सत्कवीर कहहु मनमाहीं । बहुरि प्रगट कहु काल नसाहीं ॥
सुनके भीम कवीर कहि बोला । सत्कवीरको आसन डोला ॥
छिनभै समर्थ पहुँचे आई । कवीरसुनत यम चला पराई ॥
छांड भीमकहँ भागेउ काला । सत्कवीर भेटा जंजाला ॥
कृष्ण उठाय भीम कहँ लीन्हा । तब कवीरके स्तुति कीन्हा ॥
सकल देव उठ ठाढे भयऊ । सत्कवीर कहँ सोस नवायऊ ॥
दोहा-पगु छूवन सब चाहे, काहु न आवे हाथ ॥
जापर दया कवीरके, जिन पगु देहीं माथ ॥
योगयज्ञसे सैर न कामा । जबलग भजै न सदुरुनामा ॥
सदुरु सत्यकवीर दयाला । शरण कवीर भिटे ययजाला ॥
दोहा-सत्यकवीरके स्तुति, करे निरंजनराय ॥
विष्णु व्यास सुख गुरु कहत है, भाग दृश्श सतनाम ॥
अधर विवान ग्रानभै सोहा । अद्भुत चंद सूर नख मोहा ॥
स्तुति आप २ सब करहीं । जै २ सत्यकवीर उच्चरहीं ॥
कोटिन चंद सूर उगआये । अद्भुत लीला कला दिखाये ॥
विष्णु व्यास जै स्तुति सारा । सत्यकवीर जै सब उच्चार ॥
जै २ नमो २ सब कहहीं । अधर स्तुति सब एकटक रहहीं ॥
जै २ सत्यकवीर सुखदाई । विष्णु व्यास पंडौ गुण गाई ॥
जै २ सत्यकवीर दयाला । कवीरकृपाते जीतेऊँ काला ॥
जै जै समर्थ सत्य कवीर । सब घट व्यापक अजर शरीरा ॥
कवीरुष्णगीता ।
३९
सत्यकवीर संसार तेहि दीन्हा । जै जै सत्यकवीर प्रवीना ॥
जै जै अकह सो नाम कवीरा । पुष्पवास घृत घ्राण शरीरा ॥
जै जै रुपाळ कवीर गोसाईं । गऊ कपिलहिं ले यमते छुडाईं ॥
जै जै अयर नाम कवीरा । लखा घर जरत खंभ मई चौरा ॥
थाके भीम खंभ नहि आना । वाचा वंध व्याकुल भगवाना ॥
तवहीं रुष्ण कवीर पुकारा । जै पतालते खंभ उखारा ॥
जै जै कहि बहु बार कवीरा । जै राम लक्ष्मण एक शरीरा ॥
जै भरथ शत्रुघन सीता सती । जै दशरथ दायो सो क्रांती ॥
जै कवीर अमोलख भाई । जै पुष्पवास प्रति रहे समाई ॥
जै काया दल वीर कवीरा । जै अधर धजा फहरात शरीरा ॥
जै एक स्वास बहु मूंदे आंखी । भीतर सबके कवीर सुतसाखी ॥
आप आप मन ध्यान औराधे । दसों द्वार मन पवन कस बांधे ॥
प्रेम भक्त बस साहेब सोईं । माया चहे सो प्रभु नहिं होईं ॥
सत्कवीर आप निरमाया । आप न्यारा माया जग छाया ॥
माया बस पर जीव कहावे । निहमाया सतकवीर रहावे ॥
जहां अस्मिमान कपट चतुराईं । तेहि नहिं सत्यकवीर दरसाईं ॥
तन मन धन जोवन बन फूला । मन भौरा ताके रस भूला ॥
जब वन्सपती बन गई सुखाईं । भौरहि भूख लाग अधिकाईं ॥
जेहि बन देखत भौर सुलाना । तेहि बन वरस अंगार सयाना ॥
तब भौरा सरवर दिशि धांसा । पुरइन कंबल जाय अलवासा ॥
कहे कंबल भौरा वनवासी । विपत परेउ आयउ मम पासी ॥
सब देवताओंका कबीरकी स्तुति करना और कबीरका उपदेश देना
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कबीरकृष्णगीता ।
जब बन डगठा आग धंधाना । तब बनते मधुकर विलगाना ॥
जैसे बिन निरास अल भयऊ । तैसे माया लोभित पछतयऊ ॥
चरण कमल गुरु प्रथम न सेवा । काल वस्य तब भयऊ बहेवा ॥
विपत परत को सभर्थ चीन्हा । होय सुशील उपकारसो चीन्हा ।
अनचीन्हे विपत जो होय सहाई । तो तेहि जानिय सभर्थ साई ॥
दोहा-सत्यकबीर मोहि अनचीन्ह, सियरे परिचय नाहि ॥
कपिलमुनि भज गाठे कबीर, छोड़ाय लीन्ह जमपाहीं
बाघ निरंजन काल कसाई । तेहि सुख ते लिय कपिल छोड़ाई
कपिला गऊ कपिल मुनि कहहीं । सतकबीर सो सभर्थ अहहीं ॥
उत्तर विवान आव सत सीसा । विष्णु व्यास सुख कपिलसिरदीसा
स्तुति कीन्ह सिंहासन सारा । कंचन भर ले चरण पखारा ॥
महाप्राण कहैं दीजे अज्ञा । निराधार कबीर कहु सज्ञा ॥
पूछाहि ज्ञान विष्णु अरु व्यासा । छोटे बड़े सुनहि विश्वासा ॥
विष्णुवचन ।
कहैं कृष्णगीता मत सारा । पाठ कीय सुख लहे सो चारा ॥
पाठ करै समुझे पंथ चाले । सचदयासो जिव प्रति पाले ॥
आप जीवके रक्षा करई । ताके संकट साहेव हरई ॥
अपनी रक्षा औरकी हानी । ऐसे चाल नहा अघरानी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास प्रवीना । सुनो कथा निरगुणको चीन्हा ॥
दोहा-कहैं कृष्ण कबीरसे, होय अधीन कर जोर ॥
कहिये कथा आदि उत्पतकी, सत कबीर बंदीछोर ॥
कवीरकृष्णगीता ।
४१
कवीरवचन ।
कहैं कवीर निर्गुणकी कथा । निर्गुण सर्गुण प्रगट जथा ॥
प्रथम सत्पुरुष निर्गुण सोई । तिनके निर्गुण सर्गुण होई ॥
त्रिगुण न्यारा निर्गुण सो जानी । सो सत्यपुरुष अमृततन खानी ॥
रचा लोक अमृतकी काया । देह हिरंमर सुवास सुहाया ॥
अमृत अयको लोक संवारा । इच्छा सुर्त सकल विस्तारा ॥
प्रथमहिं सुरत अंस प्रगटाये । सुरत विहंग सकल निरमाये ॥
शब्द अजर सतनाम वखाना । तासु अंस सुरति उत्पाना ॥
प्रथमहिं ज्ञान अंस सुखदाई । दुतिय विवेक विचार निरमाई ॥
त्रितय सहजशील निरबाना । चौथे क्षमा संतोष वखाना ॥
पंचय निरंजन छठयें भवानी । सतयें योगजीत जम हानी ॥
अठयें धीरज नवें शुचि भाऊ । दसयें दया दीनता आऊ ॥
एकादसे सत सुकित नामा । द्वादश दुरमत नाम निहकामा ॥
त्रैदस आद कुम निरमाऊ । चतुर्दश जलहरंग झलकाऊ ॥
पंचैदस सो प्रेम प्रमारथ । षट्यैदस अचित पद सारथ ॥
श्रवदास कहनकी छोटा । सत्रह सुतसे काल अटोटा ॥
सोरह सुत एकपुत्री वामअंगी । देख निरंजन प्रेम उभंगी ॥
जाहे सुत जो दीयदिय स्वामी । पुरुष आज्ञा बैठे सब धामी ॥
निरंजन धरहिं अकुलाने । चौसठ जुग छिन सेवा ठाने ॥
देख अंगी काल ललचाने । होय अधीन बहु विनती ठाने ॥
दीन्हो लाय संग अष्टभुजी । मानसरोवर राज करोजी ॥
अस जिवरा ताही कहैं दीन्ह। । पारस स्वास विस्तार जोकीन्ह। ॥
व्यासका कबीरसे सत्यलोक दिखानेकी प्रार्थना करना
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कबीररुणगीता ।
दोहा- उठी अवाज पुरुषकी, मानसरोवर जाहु ।
बांये दहिने जिन हेरहु, सन्मुख होय सुख लाहु ॥
अमर चोलना जीवको दीन्हा । बिसरहिंनहिंजिवपुरुषपरवीना ॥
चले निरंजन आज्ञा पाई । मानसरोवर वैठे जाई ॥
मानसरोवर हंसनि रहहीं । अद्भुत चंद्र सूर्य छवि लहहीं ॥
गावहिं सब मंगल अति प्रीति । होय झनकार अनाहद रीति ॥
एक २ हंसनि छवि अनलेखा । अमरचौर काछे बहु भेषा ॥
पग अंगुली नख चंद्रकी खानी । तरवन रवि शाशि जुथलोभानी ॥
जंघ नाभी कटि चंद्रकी रासी । उरसर कंमल नाल बिनु भांसी ॥
चंद्र सूर्यकी खान हंसनी । सुखछविनिरखअकहसुखहंसनी
शोभा कौन हंसनि छवि कहऊँ । उपमा सरिस न कुछजगलहऊँ ॥
नित आरती समान सरोवर । लोककी नार नर्क न्यारा घर ॥
तहां हंसनी सुखुच्छि सयानी । शोभा अमल चंद्रकी खानी ॥
मांग टीका पटवासी सुंदर । चंद्र चौथ विधु अद्भुत दिनकर ॥
निरख हंस सब एक टक लाये । पुरुष कला छविरूप सुहाये ॥
एक कामनि सेंदुर रवि कोटी । सेंदुर सद्रु नाम अटोटी ॥
सोहे बेसर हंसनि नाका । उगे चंद्र जुथथप बांका ॥
बांका सोइ जेहि कौन नवावे । सो कबीर सब जगगुण गावे ॥
कबीरनाम भये अस सोभा । सोभा सुनत सबन मन लोबा ॥
व्यास उवाच ।
कहै व्यास देखे विन स्वाधी । कस पतिआव सो अंतयाभी ॥
कलउ भक्त गुरुवचन विश्वासी । तीनों जुग देखे विन रासी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
४३
कबीरवचन ।
कहे कबीर देह धर देखौ । आप माहिं तुम सबहिं परेसौ ॥
कोट चंद्रके सोभा जिवके । नर्क देह धर सुख नहिं पिवके ॥
ऐसे समय हंस एक पूरा । सत्कबीर जये सो सूरा ॥
ठांका देह पूरा घट जाई । पुष्प विधान हंस बैठाई ॥
हंस सहस्र सठिहार बहुता । आसपास लागे सभ जुगता ॥
परिछन हंस विवान चढि आये । अधर धजा फहराय सहाये ॥
दोहा-वाजत वाजत सरस अति, होत अंजोर अपार ।
उतरे हंस वैकुंठ तब, नाम कबीर उचार ॥
भाये हंस वैकुंठ को जवहीं । अद्वुत चंद्र सूर्य उगे तवहीं ॥
चला हंस कबीर पगु पारा । मस्तक पग दीन्हा बलभारा ॥
सकल हंस परिक्रमा करहीं । कबीर चरण रज सिरपर धरहीं ॥
हंसवचन ।
कहे हंस कबीर यम बांचे । विना कबीर काल धर नाचे ॥
सदुरु मोकेह दीन्ह परवाना । सत्कबीर सभ गुरुकहैं जाना ॥
यम त्रिण तोड काल सुख भूका । पाय प्रवाना झगरा चूका ॥
सरगुण त्रिविध झगरा ठागा । तैतिस कोट देव सब भागा ॥
जेहि पूजहु सो कछु भल माने । बिन पूजे सब झगरा ठाने ॥
ताने निर्गुण भक्त अधारा । जप कबीर यमराजहिं छारा ॥
दोहा-धन्य कबीरको नाम है, धन्य कबीरको शरण ।
जो कबीर लौ लावे, ताको जरा न मरण ॥