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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

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Devanagarihipublished168 pages

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प्रस्तावना.

५

आचार्य, कबीरपन्थकी आज्ञासे, पुनः सुखे ग्रन्थोंके छपवानेका प्रबन्ध बम्बईमेंही कराना पडा है।

“अनुरागसागर” जो ४० ग्रन्थोंके द्वारा मुद्र किया है वही बम्बईमें छपगया है, इसका आकारभी इस ग्रन्थसे कुछही बड़ा है और ऐसे मोटे टाइप तथा ऐसी पूर्णताके साथ छपा है कि—आजतककी छपी हुई कोई प्रतिभी इसकी समता नहीं कर सकती। विशेष वृत्तान्त अनुरागसागरकी प्रस्तावनासे जानना चाहिये।

अन्तमें पाठकोंसे एक बात कहकर मैं इस प्रस्तावनाको समाप्त करता हूँ। मेरा नियम है कि—किसीभी ग्रन्थकी हस्तलिखित प्रति जब सुखे प्राप्त होती है और उसकी दूसरी प्रति मेरे पास नहीं होती है तथा ग्रन्थके छपवानेकी अत्यन्त आवश्यकता जान पड़ती है, तो प्राप्त प्रतिके अनुसार ज्योंकी त्यों उस ग्रन्थको छपवा देता हूँ। इसलिये हस्तलिखित प्रतियोंके समान यदि मेरे छपाये हुए प्रथम आवृत्तिके ग्रन्थमें अशुद्धियाँ जान पड़े अथवा किसीकी प्रतिके साथ उसका मिलान न हो तो क्रोध न कर उस अशुद्धिोंकी सूचना और हस्तलिखित प्रति भेज दें, जिससे आगेकी आवृत्तियोंमें गद्द करनेमें सहायता मिले।

इस “कबीरकृष्णगीता” की यद्यपि एकही प्रति मेरे पास थी जिससे यह छपवायी गयी है, तथापि यह प्रति छत्तीसगढ़की अनेक प्रतियोंसे मिली हुई है और छत्तीसगढ़में इसका इतना मान और इसकी इतनी चाहना है कि—लोगोंके बारम्बार अनुरोध करनेसे सुखे इसके शीघ्रही छपवानेकी आवश्यकता हुई है। इसकी छपाई, बंधाईकी सुन्दरता तथा सफाईके विषयमें कुछ कहना हाथ कंकनको आरसी दिखानेके समान है; इसलिये मेरे परिश्रमके ऊपर ध्यान देकर, यदि धर्मज्ञगण इसे शीघ्र अपना लेंगे तो अन्य ग्रन्थभी शीघ्रही शीघ्र छपवाकर उनकी सेवामें उपस्थित करता रहूंगा।

स्थान कबीरधर्मनगर

ता० १९-१-१४.

भवदीय

महंत युगलानन्द विहारी.