कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
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Read in contextसत्यनाम ।
प्रस्तावना.
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अंगठ दोहा ।
श्रीगुरु दीनदयाल प्रभु, करुणामय शुभ नाम ।
जेहि सुमिरि नर पावई, अजर अमर सुखदाय ॥ १ ॥
ताकर चरणसरोजगुण, बारबार शिर नाय ।
लिखिहौं शुभ प्रस्ताव यह, सतगुरु होहि सहाय ॥ २ ॥
मानवजन्मका सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य “सर्व दुःखोंकी निवृत्तिपूर्वक पर-मानन्दकी प्राप्ति है।” इसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिये “धर्म” की आवश्यकता है। धर्म स्वरूपसे एक होनेपरभी, भिन्न अधिकारियोंके भेदसे अलग अलग रूपमें देख पड़ता है। इसी कारणसे महात्मा आस पुरुषोंने ऐसे उपदेशमय वचनोंको प्रगट किया है कि, जिससे सर्व श्रेणीके अधिकारियोंकी निज २ योग्यता और भावनाके अनुसार लाभ प्राप्त हो सके। इसी कारणसे एक ही वचन भिन्न २ टीकाकारों द्वारा भिन्न भिन्न विचारोंका बोधक जान पड़ता है यद्यपि इस भेदमें न तो मूल वक्ताओंकाही दोष है, न टीकाकारोंकाही; किन्तु विचारके यथार्थ स्वरूपको न जाननेवाले अरुणन् विचारहीन पुरुषोंको उसमें यथार्थकी झलक नहीं देख पड़ता। इसीसे वे उसके यथार्थ लाभसे वंचित रहकर अपना अमूल्य जीवन मिथ्या निन्दा और कुतर्कमें नाश कर देते हैं।
इस बातके जाननेवाले प्रत्येक धर्म और पंथोंके विचारवानोंको इसका पूर्ण निश्चय था। इसीलिये उन्होंने निज निज इष्ट गुरुओंके बताये मार्गकी बुद्धि तथा जीवोंके कल्याणके लिये ऐसी ऐसी पुस्तकें और वाणी वचनकी रचना की थी कि, जिससे बुद्धिमान् तो सम्यक् सिद्धान्तको जान ले और बालबुद्धिवाले अधिकारी, मयम निज इष्ट गुरुमें श्रद्धाको प्राप्त कर, क्रमशः तत्त्वकी ओर अग्रसर हों।
वैदिक धर्मके, महत् ज्ञान और सर्व प्रकारके अधिकारियोंके योग्य उपदेशोंसे भरे, पुराण, बौद्ध, जैन, पारसी इत्यादि सर्व धर्मोंकी कथा,