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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

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Devanagarihipublished168 pages

Page 29 of 168

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कवीरकृष्णगीता ।

१५

व्यासदेववचन ।

कहैं व्यास अस साहेब नीका । जमके आस मिटे जो जिवका ॥
ठाकुरसो विनवें सुनि व्यासा । कौन कवीर आवे तुव पास ॥
जब मैं सुमरों दीन दशाला । सट्टरु कवीर मगटे क्पाळा ॥
कहैं व्यास तुम ठाकुर मोरा । बेग मिठाव कवीर बंदीछोरा ॥
सुखदेवके मन उपजी इच्छा । कवीरकेर मैं लेऊं दीक्षा ॥
दान पुण्य बहु तीरथ जोगा । सचनाम विन भये सब रोगा ॥
माया मोह कछु काम न आवे । सट्टरु विना नर नरकसिंघावे ॥
धन सट्टरु सतनाम कबीरा । जम जालियको भेटे पीरा ॥

विष्णु वचन ।

कहा विष्णु महाविष्णु सो जाई । महाविष्णु निरंजन राई ॥
सुखदेव व्यास औ देव अनेका । कबीरहिं सट्टरु किये चहे ठेका ॥

निरंजन वचन ।

कहैं निरंजन गुताहिं राखो । कहु काहूके आगे न भाषो ॥
कबीर जोगजीत औतारा । तिन तो सीस हमारा मारा ॥

दोहा--मैं अछुंगी आसेऊं, जोग हने मम शीश ।

रूप रेख विन भयउं तब, नाम मोर जगदीश ॥

जेहिते कूर्म बिने शिर नाई । कोट विनति कै सीस दिबाई ॥
मोर सीस देहौ सत्त कबीरा । तबते डर भरहरे शरीरा ॥
जो कोइ सत्त कबीर पथ चहई । तेहिमें आपन माथ निरबहई ॥
सट्टरु कबीरकेर यह शीती । शरण गहे तेहि नहिं बेधीती ॥