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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

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Devanagarihipublished168 pages

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कबीरकृष्णगीता ।

रामके भक्तन हरगण लावहिं । कबीरके दास नाम बल धावहिं ॥
रामके दास पूछे कहु केह बाता । जन कबीर सहुर रंगराता ॥
चहे विमान चले सब जाहीं । जागृत सतकबीर कहाहीं ॥
त्रिगुण जीव औ भूत पिशाची । पाप पुण्य आश्रित जमफांसी ॥
सतकबीरके जो हैं दासा । जेहि नहिं पाप पुण्यके आसा ॥
एकहि नाम कबीरहिं गावहिं । गुरुसाधुके सेवा लावहिं ॥
एकहि दूत गये जम धामा । साधु संत हरित लख रामा ॥
सबे देव औ सुखदेव व्यासा । को कबीर जेहि डर जमत्रासा ॥
केहे कृष्ण कबीरके लीला । सतनाम कबीर गहीला ॥
कबीर हैं अमरलोकके वासी । सो नहिं देह धरे चौरासी ॥
अमरलोक तिहु लोकते न्यारा । जहैंत यहां आये निरंकारा ॥
सो घर आदु सबनके मूला । सत्तलोक अमर अस्थूला ॥
जीव अमर सत्तलोकते आये । पूंजी सो अलस निरंजन पाये ॥

दोहा-आदु पिता सो सब, सो हैं सत्तकबीर ।

क्रीतम पिता सो बहुत, भये निरंजन नीर शरीर ॥
सत्तकबीरके अंस सोहंगा । आय रहै सो सबके संग ॥
सोहंग नाम ब्रह्मके दल । पांच पचीस त्रिगुण अहंकल ॥
तत ओंकार सोहंगम जीऊ । सत्तकबीर सब जिवके पीऊ ॥
जीव न चीन्है सत्तकबीरा । पांच तीनके धरे शरीरा ॥
अमर लोक हिरंभर काया । तहं सब हंसा केल कराया ॥
हम सब कहा सेवक बडभागी । जो कबीरके शरण न लागी ॥