ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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भाषा मे यह आत्मा ही ब्रह्म है, जो केवल नानारूप उपाधिवश अनेक प्रतीत हो रहा है। समुद्र की तरङ्गो की ओर देखो; एक भी तरङ् समुद्र से पृथक् नही है। तब फिर तरङ्ग पृथक् क्यो प्रतीत होती है? नामरूप ने—तरङ्ग की आकृति और हमने जो इसे तरङ्ग नाम दे दिया है उसी ने उसे समुद्र से पृथक् कर दिया है। नामरूप के नष्ट हो जाने या चले जाने पर वह जो समुद्र था वही रह जाता है। तरंग और समुद्र के बीच कौन प्रभेद कर सकता है? अतएव यह समुदाय जगत् एक स्वरूप हुआ। जितना भी पार्थक्य है वह सब नामरूप के ही कारण है। जिस प्रकार सूर्य लाखों जलकणो पर प्रतिबिम्बित होकर प्रत्येक जलकण के ऊपर सूर्य की एक सम्पूर्ण प्रतिकृति की सृष्टि कर देता है उसी प्रकार वही एक आत्मा, वही एक सत्ता विभिन्न वस्तुओ में प्रतिबिम्बित होकर नाना रूप मे दिखाई पड़ता है। किन्तु वास्तव मे वह एक है। वास्तव मे ‘मै’ अथवा ‘तुम’ नामक कुछ नहीं है—सब एक है। चाहे कहो—सभी मै हूँ, या कहो—सभी तुम हो। किन्तु यह द्वैतज्ञान बिलकुल मिथ्या है, और समुदाय जगत् इसी द्वैतज्ञान का फल है। जब विवेक उदय होने पर मनुष्य देख पाता है कि दो वस्तुएँ नहीं है, एक ही वस्तु है, तब उसे बोध होता है कि वही स्वयं यह अनन्त ब्रह्माण्ड स्वरूप हो गया है। मैं ही यह परिवर्तनशील जगत् हूँ, और मै ही अपरिणामी, निर्गुण, नित्यपूर्ण नित्यानन्दमय हूँ।
अतएव नित्यशुद्ध, नित्य, पूर्ण अपरिणामी अपरिवर्तनीय एक आत्मा है; उसका परिणाम कभी नहीं होता, और ये सब विभिन्न परिणाम उसी एकमात्र आत्मा मे ही प्रतीत होते हैं। उसके ऊपर नामरूप