ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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प्रकार के स्वर्ग हैं। वे वहाँ पर सूक्ष्मशरीर—देवशरीर प्राप्त करते हैं। वे देवता होकर वहाँ वास करते हैं और दीर्घ काल तक स्वर्ग के सुखों का उपभोग करते हैं। इस भोग का अन्त होने पर फिर उनका प्राचीन कर्म बलवान हो जाता है; अतः फिर उनका मर्त्यलोक मे पतन हो जाता है। वे सब वायुलोक, मेघलोक आदि लोकों के भीतर होकर आते हैं और अन्त मे वृष्टिधारा के साथ पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। वृष्टि के साथ गिर कर वे किसी शस्य का आश्रय ले कर रहते हैं। इसके बाद जब कोई व्यक्ति उस अन्न को खाता है तब उसकी औरस सन्तति मे वह जीवात्मा फिर शरीर धारण करता है। जो लोग अत्यंत दुष्ट हैं उनकी मृत्यु होने पर वे भूत अथवा दानव हो जाते हैं और चन्द्रलोक और पृथ्वी के बीच किसी स्थान मे वास करते हैं। उनमे से कोई कोई मनुष्यों के ऊपर बड़ा अत्याचार करते हैं और कोई कोई मनुष्यो से मैत्री भी कर लेते हैं। वे कुछ समय तक इसी स्थान मे रहकर फिर पृथ्वी पर आकर पशु-जन्म लेते हैं। कुछ समय पशु-देह मे रहकर वे फिर मनुष्यत्व लाभ करते हैं और फिर एक बार मुक्तिलाभ करने की उपयोगी अवस्था को प्राप्त करते हैं। तो हमने देखा कि जो लोग मुक्ति की निकटतम सीढ़ी पर पहुँच गये हैं, जिनके भीतर कम अपवित्रता रह गई है वे ही सूर्य की किरणों के सहारे ब्रह्मलोक मे जाते हैं। जो मध्य वर्ग के लोग हैं, जो स्वर्ग जाने की इच्छा से सत्कर्म करते हैं वे ही सब चन्द्रलोक मे जाकर वहाँ के स्वर्गों मे वास करते हैं और देवशरीर को भी प्राप्त करते हैं, किन्तु उन्हे मुक्तिलाभ करने के लिये फिर मनुष्य देह धारण करना पडता है। और जो अत्यन्त दुष्ट हैं वे भूत, दानव आदि रूप मे परिणत होते हैं, उसके बाद वे पशु होते हैं; और मुक्तिलाभ के लिये उन्हे फिर मनुष्यजन्म