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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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मनुष्य का यथार्थ स्वरूप ४९

का गठन और परिचालन करने के लिये इस शरीर के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता है तो इसी कारण से उस ज्योतिर्मय देह का गठन और परिचालन करने के लिये भी तदतिरिक्त और कुछ चाहिये। यही “ और कुछ ” आत्मा नाम से पुकारा जाने लगा। आत्मा ही मानो इस ज्योतिर्मय देह के भीतर से स्थूल शरीर के ऊपर काम कर रहा है। यही ज्योतिर्मय शरीर मन का आधार कहा जाता है, और आत्मा इससे अतीत है। आत्मा मन नहीं है, वह मन के ऊपर कार्य करता है और मन के भीतर से शरीर के ऊपर कार्य करता है। तुम्हारे एक आत्मा है, मेरे भी एक आत्मा है सभी के पृथक् एक-एक आत्मा है और एक-एक सूक्ष्म शरीर भी है; इसी सूक्ष्म शरीर की सहायता से हम स्थूल शरीर के ऊपर कार्य करते है। अब प्रश्न उठा—आत्मा और उसके स्वरूप के सम्बन्ध मे। शरीर और मन से पृथक् इस आत्मा का क्या स्वरूप है ? बहुत से से वाद प्रतिवाद होने लगे, बहुत से सिद्धान्त और अनुमान माने जाने लगे, बहुत से दार्शनिक अनुसन्धान होने लगे—मै आपके समक्ष इस आत्मा के सम्बन्ध मे उन्होने जो कई एक सिद्धान्त अपनाये है उनका वर्णन करने की चेष्टा करूँगा। भिन्न-भिन्न दर्शनों का इस एक विषय मे मतैक्य देखा जाता है कि आत्मा का स्वरूप जो कुछ भी हो, उसकी कोई आकृति नही है, और जिसकी आकृति नहीं वह अवश्य ही सर्वव्यापी होगा। काल मन के अन्तर्गत है—देश भी मन के अन्तर्गत है। काल को छोड़ कार्य-कारण-भाव भी नहीं रह सकता। क्रमवर्तिभाव को छोड़ कार्य-कारण-भाव भी नहीं रह सकता। अतएव, देश-काल-निमित्त मन के अन्तर्गत है और यह आत्मा, मन से अतीत और निराकार है, इसलिये वह भी अवश्य

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