ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in contextमनुष्य का यथार्थ स्वरूप ४१
तुम इसे अपने हाथो मे लेकर धीरे धीरे ले जाओ—इसे सर्वांग सुन्दर ज्योतिर्मय देह से सम्पन्न करो—इसे उसी स्थान मे ले जाओ जहाँ पितृगण वास करते है, जहाँ दुःख नही है, जहाँ मृत्यु नही है।" तुम देखोगे कि सभी धर्मों मे यही एक भाव विद्यमान है, और इसके साथ ही हम एक और तत्व भी पाते है। आश्चर्य की बात है—सभी धर्म एक स्वर से घोषणा करते है कि मनुष्य पहले निष्पाप और पवित्र था, इस समय उसकी अवनति हो गई है—यही भाव, चाहे वे रूपक की भाषा मे, या दर्शन की सुस्पष्ट भाषा मे, अथवा कविता की सुन्दर भाषा मे लपेट कर प्रकाशित क्यो न करे किन्तु सभी इस एक तत्व की घोषणा करते अवश्य है। सभी शास्त्रो और पुराणो मे यही एक तत्व पाया जाता है कि मनुष्य जैसा पहले था वैसा अब नही है और इस समय वह पहले था वैसा अब नही है और इस समय वह पहले से गिरी हुई दशा मे है। यहूदियों के शास्त्र बाइबिल के प्राचीन भाग मे आदम के पतन की जो कथा है उसमे भी सार यही है। हिन्दू शास्त्रो मे इसका बार बार उल्लेख हुआ है। उन्होने सतयुग कहकर जिस युग का वर्णन किया है, जब कि मनुष्य की मृत्यु उसकी इच्छानुसार होती थी, जब मनुष्य जितने दिन चाहे अपने शरीर को धारण कर सकता था, जब मनुष्यों का मन शुद्ध और दृढ था, इस सब मे भी उसी एक सार्वभौमिक सत्य का इशारा दीखता है। वे कहते है कि उस समय मृत्यु नही थी एवं किसी प्रकार का अशुभ और दुख नहीं था, और वर्तमान युग उसी उन्नत अवस्था का अवनत भाव ही तो है। इस वर्णन के साथ साथ हम सभी धर्मों मे जलप्लावन अर्थात् जलप्रलय का वर्णन भी पाते है। यह जलप्रलय की कथा ही इस बात को प्रमाणित करती है कि सभी धर्म वर्तमान