ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in context३. मनुष्य का यथार्थ स्वरूप
( लन्दन में दिया हुआ भाषण )
पञ्चेन्द्रियग्राह्य जगत् मे मनुष्य इतना अधिक आसक्त हो जाता है कि वह उसे सहज मे ही त्याग करना नहीं चाहता । किन्तु वह इस बाह्य जगत् को चाहे कितना ही सत्य या साररूप क्यो न समझे प्रत्येक व्यक्ति तथा जाति के जीवन मे एक समय ऐसा आता है कि जब उसे अनिच्छा से भी जिज्ञासा करनी होती है, कि क्या यह जगत् सत्य है ? जिन व्यक्तियों को अपनी इन्द्रियो की गवाही मे अविश्वास करने का तनिक भी समय नहीं मिलता, जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण किसी न किसी प्रकार के विषयभोग मे बीतता है, मृत्यु उनके भी सिरहाने आकर खड़ी हो जाती है और विवश होकर उन्हे भी कहना पड़ता है—क्या यह जगत् सत्य है ? इसी एक प्रश्न मे धर्म का आरम्भ होता है और इसी के उत्तर में धर्म की इति भी हो जाती है । इतना ही क्यो, सुदूर अतीत काल में जिसका निश्चित इतिहास भी अब नही मिलता, उसी रहस्यमय पौराणिक युग मे भी, सभ्यता के उस अस्फुट उषाकाल मे भी, हम देखते है कि यही एक प्रश्न उस समय भी पूछा गया है—क्या यह जगत् सत्य है ?
कवित्वमय कठोपनिषद् के प्रारम्भ मे हम यह प्रश्न देखते है, मनुष्य के मरने पर, कोई कोई लोग कहते है कि उसका अस्तित्व