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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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Page 39

माया ३५

भारत के प्राचीन आचार्य, प्राचीन ऋषि जगल मे बैठे इस प्रश्न पर विचार कर रहे है, बड़े बडे वयोवृद्ध पवित्रमय महर्षिगण भी इसकी मीमांसा करने मे असमर्थ रहे है परन्तु एक बालक उनके बीच खड़े हो कर घोषणा करता है—" हे दिव्य धामवासी अमृत के पुत्रगण ! सुनो, मुझे मार्ग मिल गया है। जो अन्धकार से अतीत है उसे जान लेने पर अन्धकार के बाहर जाने का मार्ग मिल जाता है।

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ।
आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥
(श्वेताश्वतर उपनिषद्)

इसी उपनिषद् से हमे यह उक्ति भी मिलती है कि यह माया हमे चारों ओर से घेरे हुये है एवं वह अति भयङ्कर है। माया के बीच मे से होकर कार्य करना असम्भव है। जो यह कहता है कि “मै इस नदी के तट पर बैठा हूँ, जब सारा पानी समुद्र मे पहुँच जायगा तब मै नदी के पार जाऊँगा,” वह उतनी ही भूल करता है जितनी कि यह कहने वाला कि “जब तक पृथिवी पूर्ण मङ्गलमय नहीं हो जाती उतने दिन कार्य करते रहने के बाद सुख भोग करूँगा। दोनो ही बाते असम्भव है। माया के बीच मे से रास्ता नही है, माया के विरुद्ध चल कर ही रास्ता मिलेगा—यह बात भी माननी पड़ेगी। हमारा जन्म प्रकृति के सहायक रूप मे नहीं वरञ्च प्रकृति के विरोधी के रूप मे हुआ है। हम बन्धन के कर्ता होकर भी स्वय को बन्दी बनाने की चेष्टा करते है। यह मकान कहाँ से