ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
Page 328 of 332
Read in context३२४ ज्ञानयोग
बनाता है वही एक मात्र अशुभ है। मनुष्य को दुर्बल और भयभीत बनाने वाला संसार मे जो कुछ भी है वही पाप है और उसीसे बचना चाहिये। तुम्हे कौन भयभीत कर सकता है? यदि सैकड़ों सूर्य पृथ्बी पर गिर पड़े, सैकड़ों चन्द्र चूर हो जायँ, एक के बाद एक ब्रह्माण्ड विनष्ट होते चले जायँ तो भी तुम्हारे लिये क्या है? शिला की भाँति अटल रहो; तुम अविनाशी हो। तुम आत्मा हो, तुम्हीं जगत् के ईश्वर हो। कहो “शिवो ऽ हं, शिवोऽहं; मै पूर्ण सच्चिदानन्द हूँ।” और एक सिंह की भाँति पिंजड़ा तोड़ दो, अपनी शृंखलायें तोडकर सदा के लिये मुक्त हो जाओ। तुम्हे किसका भय है, तुम्हें कौन रोक सकता है? – केवल अज्ञान और भ्रम; और कोई तुम्हे पकड़ नही सकता। तुम शुद्धस्वरूप हो, तुम नित्यानन्दमय हो।
यह मूर्खों का उपदेश है कि 'तुम पापी हो, अतएव एक कोने में बैठकर हाय हाय करते रहो।' यह उपदेश देना मूर्खता ही नहीं, दुष्टता भी है। तुम सभी ईश्वर हो। ईश्वर को न देखकर मनुष्य को देखते हो? अतएव यदि तुममे साहस है तो इसी विश्वास पर खड़े होकर उसी के अनुसार अपने जीवन को बनाओ। यदि कोई व्यक्ति तुम्हारा गला काटे तो उसको मना मत करना, क्योंकि तुम तो स्वयं ही अपना गला काट रहे हो। किसी गरीब का यदि कुछ उपकार करो तो उसके लिये तनिक भी अहङ्कार मत करना। कारण, वह तो तुम्हारे लिये उपासना मात्र है, उसमें अहंकार की कोई बात नहीं है। क्या तुम्हीं समस्त जगत् नहीं हो? ऐसी कौन सी वस्तु है और कहाँ है कि जो तुम नही हो? तुम जगत् की आत्मा हो। तुम्हीं सूर्य, चन्द्र, तारा हो। समस्त जगत् तुम्हीं हो। किससे घृणा करोगे और किससे