ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in contextअमरत्व ३१५.
कोई गति नहीं हो सकती । प्रत्येक वस्तु को ही घूम फिर कर अपने पूर्व स्थान पर लौट आना पड़ता है, क्योकि सरल रेखा अनन्त भाव से बढाने पर वृत्त मे परिणत होती है। यदि ऐसा ही हुआ तो अनंत काल तक किसी आत्मा की अवनति हो ही नही सकती—यह किसी तरह हो ही नही सकता । इस जगत् मे प्रत्येक वस्तु, शीघ्र हो या विलम्ब से ही हो, अपनी अपनी वर्तुलाकार गति को सम्पूर्ण कर फिर अपनी उत्पत्ति के स्थान पर पहुँचती है । तुम, मै अथवा ये सब आत्माएँ क्या है ? पहले क्रमसकोच तथा क्रमविकास तत्व की आलोचना करते हुए हमने देखा है. तुम, हम, उसी विराट् विश्वव्यापी चैतन्य या प्राण या मन के अंशविशेष हैं; हम उसी के सकोचस्वरूप है । अतएव घूमकर हम क्रमविकास की प्रक्रिया के अनुसार उस विश्वव्यापी चैतन्य मे लौट जायेगे—वह विश्वव्यापी चैतन्य ही ईश्वर है। लोग उसी विश्वव्यापी चैतन्य को प्रभु, भगवान, ईसा, बुद्ध या ब्रह्म कहते है—जडवादी उसी की शक्ति के रूप मे उपलब्धि करते है एवं अज्ञेयवादी उसी की उस अनंत अनिर्वचनीय सर्वातीत पदार्थ के रूप मे धारणा करते है। वही वह विश्वव्यापी प्राण है, वही विश्वव्यापी चैतन्य है—वही विश्वव्यापिनी शक्ति है और हम सब उसी के अंश है ।
किन्तु आत्मा के अमरत्व को प्रमाणित करने के लिये इतना ही पर्याप्त नही है। अभी भी अनेक संशय और आशकाये रह गई । किसी शक्ति का नाश नही है, यह बात सुनने मे बडी अच्छी लगती है, किन्तु वास्तविक बात यह है कि हम जितनी भी शक्तियाँ देखते है सभी मिश्रणोत्पन्न हैं, जितने भी रूप देखते है सभी मिश्रण से उत्पन्न है। यदि आप शक्ति के सम्बन्ध मे विज्ञान का मत ग्रहण कर