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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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अमरत्व ३१३

और सभी रूप नित्य हैं। मान लो कि मैं पासा खेल रहा हूँ। मान लो कि ६-५-३-४ आये। मै और खेलने लगा। खेलते खेलते एक समय ऐसा अवश्य आयेगा जब ये ६-५-३-४ इसी क्रम से आयेंगे। और खेलो, फिर ये आयेंगे किन्तु देर मे। मै जगत् के प्रत्येक परमाणु की एक एक पासे से तुलना करता हूँ। उन्हीं को बार बार फेका जा रहा है, और वे वार वार नाना प्रकार से गिरते हैं। आपके सम्मुख जो समस्त पदार्थ है वे सब परमाणुओं के एक विशिष्ट प्रकार के सन्निवेश से उत्पन्न है। यह गिलास, यह मेज, यह जलघट, ये सभी वस्तुये परमाणुओं का समवायविशेष है—क्षण भर के बाद शायद यह समुदाय-विशेष नष्ट हो जा सकता है। किन्तु एक समय ऐसा अवश्य आयेगा जब ठीक यही समवाय आकर उपस्थित होगा—जब आप सब इसी तरह बैठे होगे और यह जलघट अथवा अन्य वस्तुये जो कुछ भी है वे सभी यथास्थान रहेगी और ठीक इसी विषय की आलोचना होगी। अनन्त वार इसी प्रकार हुआ है और अनन्त वार इसी प्रकार होगा। यहाँ तक हमने स्थूल जगत् की—वाह्य वस्तुओं की आलोचना की। हमने क्या देखा? यही कि इन भौतिक पदार्थसमूहों की विभिन्न समवाय मे पुनरावृत्ति अनन्त काल तक होती रहती है।

इसके साथ ही साथ और एक प्रश्न उठखडा होता है—भविष्य को जानना सम्भव है या नहीं। आप लोगों ने शायद ऐसे आदमी को देखा है जो मनुष्य के अतीत व भविष्य की सारी बाते बतला देता है। यदि भविष्य किसी नियम के अधीन न हो तो किस प्रकार भविष्य के सम्बन्ध में हम कह सकते हैं? परन्तु हमने पहले ही देखा है कि भविष्य मे बीती घटनाओ की ही पुनरावृत्ति होती है। जो भी हो