Skip to content
SarvaKosh
ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 293 of 332

Read in context
Page 293

आत्मा का मुक्त स्वभाव २८९

प्राप्त होते हैं । समस्त जगत् ही जैसे भगवान का शरीर है । ईश्वर समस्त प्रकृति एव आत्माओ के आत्मा स्वरूप है ।

सृष्टि का अर्थ है ईश्वर के स्वरूप का विकास—कुछ समय तक यह विकास जारी रहकर फिर संकुचित होने लगता है। प्रत्येक जीवात्मा के लिए इस संकोच का कारण है—असत् कर्म। मनुष्य के असत् कर्म करने से उसकी आत्मा की शक्ति क्रमशः संकुचित होने लगती है—जितने दिनो तक वह सत्कर्म आरंभ नही करता । तब फिर उसका विकास होने लगता है। इन भारतीय विभिन्न मतो मे—एव मेरे विचार मे, जान मे या अनजान मे जगत् के सभी मतो मे—एक साधारण भाव दिखाई देता है, मै उसे “मनुष्य का देवत्व” या ईश्वरत्व कहना चाहता हूँ । जगत् मे ऐसा कोई मत नहीं है, प्रकृत धर्म नाम के उपयुक्त ऐसा कोई धर्म नहीं है जो किसी न किसी तरह पौराणिक या रूपक मात्र से ही हो अथवा दर्शनो की परिमार्जित स्पष्ट भाषा मे हो, यह भाव प्रकाशित न करता हो कि जीवात्मा जो कुछ भी हो, अथवा ईश्वर के साथ उसका जो भी सम्बन्ध हो, वह स्वरूपतः शुद्ध स्वभाव एव पूर्ण है। पूर्णानन्द और ऐश्वर्य उसके प्रकृतिगत हैं; दुःख या अनैश्वर्य उसकी प्रकृति नहीं है। यही दुख किसी रूप मे उसमे आगया है । सभी अमार्जित मतो मे इस अशुभ के व्यक्तित्व ( Personified Evil ) की कल्पना कर शैतान या अहीमन को इन अशुभो का सृष्टिकर्ता कहकर अशुभो के अस्तित्व की व्याख्या की जा सकती है ।

दूसरे मतो के अनुसार एक ही आधार मे ईश्वर और शैतान दोनों का भाव आरोपित किया जा सकता है, एव किसी प्रकार की

१९