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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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१२. अपरोक्षानुभूति

मै तुम लोगों को एक और उपनिषद से कुछ अंश पढ़कर सुनाऊँगा। यह अत्यन्त सरल एवं अतिशय कवित्वपूर्ण है। इसका नाम है कठोपनिषद् । सर एडविन अर्नाल्ड कृत इसका अनुवाद शायद तुममे से बहुतो ने पढ़ा होगा। हम लोगो ने पहले देखा ही है कि जगत् की सृष्टि कहाँ से हुई। इस प्रश्न का उत्तर बाह्य जगत् से नहीं पाया जा सकता, अतः इस प्रश्न के समाधान के लिये लोगो की दृष्टि अन्तर्जगत् की ओर आकृष्ट हुई। कठोपनिषद् मे मनुष्य के स्वरूप के सम्बन्ध मे यह अनुसन्धान आरम्भ हुआ है। पहले यह प्रश्न होता था कि इस वाह्य जगत् की सृष्टि किसने की ? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई ? —इत्यादि। किन्तु अब यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि मंनुष्य के अन्दर कौन सी ऐसी वस्तु है जो उसे जीवित रखती है और उसे चलाती है, एवं मृत्यु के बाद मनुष्य का क्या होता है ? पहले मनुष्य ने इस जड़ जगत् को लेकर क्रमशः इसके आभ्यन्तर मे पहुँचने की चेष्टा की थी और इससे उसने पाया जगत् का एक जबरदस्त शासक—एक व्यक्ति—एक मनुष्य मात्र। हो सकता है कि मनुष्य के गुणसमूह को अनन्त परिमाण मे बढ़ाकर, वे उसके नाम के साथ जोड दिए गये हो, किन्तु कार्यतः वह एक मनुष्य मात्र है। परन्तु यह मीमांसा कभी पूर्ण सत्य नहीं हो सकती। अधिक से अधिक इसे आंशिक सत्य कह सकते है। हम लोग इस जगत् को मानवीय दृष्टि से देखते है, और हमलोगो का ईश्वर इस जगत् की मानवीय व्याख्या मात्र है।