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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 249 of 332

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Page 249

सभी वस्तुओं में ब्रह्मदर्शन २४५

आत्मा के सम्मुख तो अनन्त जीवन पड़ा हुआ है—अध्यवसाय के साथ चेष्टा करने पर तुम्हारी वासना अवश्य पूर्ण होगी।

“ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
(ईशोपनिषद्, ४-७ श्लोक)

“वह अचल है, एक है, मन से भी अधिक द्रुत गति वाला है। इन्द्रियाँ उसके पूर्व चल कर भी उसको प्राप्त नहीं होतीं। वह स्थिर रह कर भी अन्यान्य द्रुतगामी पदार्थों से आगे जानेवाला है। उसमे रह कर ही हिरण्यगर्भ सब के कर्मफलो का विधान करते है। वह चञ्चल है, वह स्थिर है, वह दूर है, वह निकट है, इस सब के भीतर है, फिर भी वह इस सब के बाहर भी है। जो आत्मा के अन्दर सब भूतो का दर्शन करते है, और सब भूतो मे आत्मा का दर्शन करते है वे कुछ भी छिपाने की इच्छा नहीं करते। जिस अवस्था मे ज्ञानी व्यक्ति के लिये समस्त भूत आत्मस्वरूप हो जाते हैं, उस अवस्था मे उस एकत्वदर्शी पुरुष को शोक अथवा मोह कहाँ रह सकता है?”