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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १११९

वाला। मान लो कि समाज में दोष है और एक दल उठकर गाली गलौज करने लगा। बहुत दिन तक ये लोग केवल कट्टरपन्थी रहे। सभी देशों और समाजों मे ये लोग देखे जाते हैं; और स्त्रियाँ तो अधिकांश इस चीत्कार में योग दिया करती हैं, कारण वे स्वभाव से भावुक होती है। जो व्यक्ति खड़े होकर किसी विषय के विरुद्ध लेक्चरबाजी करेगा उसके दल की वृद्धि होगी ही। तोड़ना सहज होता है, पागल आदमी जो चाहे तोड फोड़ सकता है, किन्तु किसी वस्तु का बनाना उसके लिये कठिन है।

सभी देशो मे इस प्रकार के गन्दे विषयों के प्रतिवादी किसी न किसी रूप मे पाये जाते हैं, और वे समझते हैं कि केवल गाली-गलौज से और दोषो को प्रकाश मे लाकर ही वे लोगो का उपकार कर रहे हैं। उनको देखने से ऐसा लगता है कि वे कुछ उपकार कर रहे है, किन्तु वास्तव मे वे अनिष्ट ही अधिक करते हैं। एक दिन मे तो कोई काम नहीं होता। समाज एक ही दिन मे तो -बन नहीं गया, और परिवर्तन का अर्थ है, कारणो को दूर करना। मान लो कि बहुत से दोष है, किन्तु केवल गालीगलौज से तो कुछ होगा नही; हमें उनकी जड़ तक जाना पड़ेगा। पहले तो दोष का कारण क्या है यह जानना होगा, फिर उसे दूर करने से दोष स्वतः ही दूर हो जायगा। चिल्लाने से लाभ होने के स्थान पर हानि की ही अधिक सम्भावना है।

किन्तु पूर्ववर्णित दूसरे दल के हृदय में सहानुभूति थी। वे समझ गये थे कि दोषो को दूर करने के लिये उनके कारणों को देखना