जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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करे सरिक्खो अथवापि सेट्ठो
निहीनको चापि करेय्य एको,
करेय्यु ते व्यसने उत्तमत्थं
यथा अहं कुसनाळी रुचायं ॥
[ अपने समान, अपने से श्रेष्ठ अथवा अपने से कम (दर्जे वाले) से साथ
भी मित्रता करे। जैसे कुशा-घास (वाले) ने मुझ रुख-वृक्ष (के देवता)
का (उपकार किया), उसी प्रकार ये भी विपत्ति आ पड़ने पर उपकार
करते हैं।]
——
करे सरिक्खो—जाति आदि में जो अपने बराबर हो, उससे से भी
मित्रता करे। अथवापि सेट्ठो, जाति आदि म जो श्रेष्ठ हो, अधिक हो उससे भी
(मित्रता) करे। निहीनको चापि करेय्य एको, जाति आदि से नीच से भी
मित्र धर्म करे। इस प्रकार इन सभी को मित्र बनाना चाहिए, यह स्पष्ट करता
है। क्यों ? करेय्यु ते व्यसने उत्तमत्थं, यह सभी मित्र पर दुःख आ पड़ने पर
अपने अपने कर्तव्य भार को वहन करते हुए उपकारी होते हैं, अर्थात् उस मित्र
को शारीरिक तथा मानसिक दुःख से मुक्त करते हैं। इसलिए अपने से छोटे
से भी मित्रता करनी चाहिए, दूसरों की तो बात ही क्या ? यहाँ यह उपमा
है। यथा अह कुसनाळी रुचायं, जैसे मै रुख में पैदा हुआ देवता और यह कुशा-
घास का देवता, हममें भी मित्रता थी। उसमें में ऊँचे कुल वाला होकर भी
अपने पर आई विपत्ति को मूर्खता के कारण उपाय न जानने के कारण दूर
नहीं कर सका, इस छोटे दर्जे वाले पण्डित-देवता की सहायता से दुःख से मुक्त
हुआ। इसलिए और भी जो दुःख से मुक्त होना चाहे उन्हें भी चाहिए कि
बराबरी अथवा श्रेष्ठता का ख्याल न कर कम दर्जे वाले से भी मित्रता करें।
रुखदेवता देवता-समूह को इस गाथा द्वारा धर्मोपदेश कर आयुपर्यन्त,
जीवित रह कुशानाळी देवता के साथ कर्मानुसार परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना सा जातक का सारांश निकाला। उस समय
रुख-देवता आनन्द था। कुसाळी-देवता तो मैं था ही।