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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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विषय पृष्ठ
१३५. चन्दाभ जातक .. .. .. .. ८७
[ मरते हुए आचार्य्य ने 'चन्दाभ सुरियाभं' कहा। ज्येष्ठ
शिष्य ही समझ सका।]
१३६. सुवण्णहंस जातक .. .. .. .. ८८
[ लोभवश ब्राह्मणी ने सुवर्ण-हंस के सभी पर एक साथ
उखाड़ लिए। वह सोने के न होकर साधारण पंख रह
गए।]
१३७. बब्बु जातक . .. .. .. ९१
[ चुहिया बिल्लो को मांस दे देकर अपनी जान बचाती
थी। बोधिसत्व के उपदेश से वह सब को मारने में समर्थ
हुई।]
१३८. गोध जातक .. .. .. .. ९६
[ तपस्वी गोह का मांस खाना चाहता था। गोह ने
ताड़ लिया—अन्दर से मैला है, बाहर ही साफ है।]
१३९. उभतोभट्ठ जातक .. .. .. .. ९८
[ घर मे भार्य्या ने पडोसिन से झगड़ा कर लिया।
बाहर मछली पकड़ने जाकर मछुवे की आँख फूट गई
और कपड़े चोरी चले गए; इस प्रकार वह उभयभ्रष्ट
हुआ।]
१४०. काक जातक .. .. .. .. १०१
[ कौवे ने ब्राह्मण के सिर पर बीट कर दी। ब्राह्मण
ने कौवों की जाति को ही नष्ट करने का संकल्प किया।
बोधिसत्त्व ने अपनी जाति की रक्षा की।]
१५. कक्कटक वर्ग १०५
१४१. गोध जातक (२) .. .. .. .. १०५
[ गोह की गिरगिट के साथ दोस्ती गोह-कुल नष्ट
करने का कारण हुई।]