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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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रह गया। मनुष्य उसे देखकर नहीं खरीदते थे। बोधिसत्त्व को छोड़ शेष
बटेरों के समाप्त हो जाने पर, चिड़ीमार पिंजरे को ला दरवाजे पर रख (उसमें
से) बोधिसत्त्व को हाथ पर ले देखने लगा कि इस बटेर को क्या हुआ ? उसे
असावधान देख बोधिसत्त्व ने पर फैलाए और उड़कर जंगल जा पहुँचा।
बटेरों ने बोधिसत्त्व को देखकर पूछा—"पता नहीं रहा कि कहाँ गए थे ?"
"मुझे चिड़ीमार ने पकड़ लिया था।" "कैसे मुक्त हुए ?" पूछने पर
बोधिसत्त्व ने कहा मैंने उसका दिया हुआ दाना-पानी नहीं ग्रहण किया, और
मुक्त होने का तरीका सोचकर छूट गया। (इतना कह) यह गाथा कही—
नाचिन्तयन्तो पुरिसो विसेसमधिगच्छति,
चिन्तितस्स फलं पस्स मुत्तोस्मि वधबन्धना ॥
[जो आदमी विचार नहीं करता, वह विशेष (=मोक्ष) को प्राप्त नहीं
होता। विचार करने के फल को देखो मैं मरण-बन्धन से मुक्त हो गया ।]
सारांश यह है। पुरिसो, दुःख में पड़कर मैं इस उपाय से मुक्त होऊँगा,
इस प्रकार न विचार करनेवाला अपने दुःख से मुक्ति स्वरूप विसेस नाधि
गच्छति । अब मैंने जो विचार से काम लिया, उसके फल को देखो। उसी
उपाय से मैं मुत्तोस्मि वधबन्धना, मैं मरण से तथा बन्धन से मुक्त हुआ।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने अपनी कृति का वखान किया।
शास्ता ने इस धर्मदेशना को ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मरने
से मुक्त हुआ बटेर मैं ही था।