जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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शास्ता ने यह धर्मदेशना ला यह अभिसम्बुद्ध गाथाएँ कह जातक का
मेल बैठाया—
सिगालो मानत्थद्धोव परिवारेन श्रत्थिको,
पापुणी महतिं भूमिं राजासि सब्बदाठिनं ॥
एवमेवं मनुस्सेसु यो होति परिवारवा,
सो हि तत्थ महा होति सिगालो विय दाठिनं ॥
[गीदड़ अभिमान मे चूर था। उसे और भी "परिवार" चाहिए था।
यह महान् पद को प्राप्त हो गया—सभी चौपायो का राजा हो गया। इसी
प्रकार मनुष्यो मे भी जिसका "परिवार" बडा होता है वह भी महान् हो जाता
है जैसे गीदड जानवरो मे।]
मानत्थद्धो अनुचरो के कारण उत्पन्न अभिमान से चूर। परिवारेन
अत्थिको और भी "परिवार" की इच्छा वाला होकर। महतिं भूमि महा-
सम्पत्ति को। राजासि सब्बदाठिन सब चौपायो का राजा था। सो हि तत्थ
महा होति जो परिवार युक्त आदमी है वह उन परिवारो में महान् होता है।
सिगालो विय दाठिन जैसे गीदड चौपायो मे महान् हुआ उसी प्रकार महान्
होता है। वह उस गीदड की तरह प्रमाद के कारण विनाश को प्राप्त होता है।
उस समय गीदड देवदत्त था। राजा सारिपुत्र था। पुरोहित तो में
ही था।
२४२. सुनख जातक
“बालो वतायं सुनखो . ” यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय
अम्बल-कोष्ठक आसनशाला में भात खाने वाले कुत्ते के बारे मे कही।