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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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[ २.६.२४०
हिंसितो नाना प्रकार के दण्ड बलि आदि से पीडा दी। पिङ्गलेन पिङ्गल
आँख वाले ने, उसकी दोनो आँखें एकदम पिङ्गल वर्ण की, बिल्ली की आँखो
के समान थी। इसीसे उसका नाम पिङ्गल हुआ। पच्चयं वेदयन्ति प्रीति
अनुभव करते हैं। अकण्हनेत्तो पिङ्गल आँख वाला। कस्मा नु त्वं तू किस
कारण से रोता है ? अट्टकथा में कस्मा तुवं पाठ है।
उसने उसकी बात सुन उत्तर दिया—मैं इस शोक से नही रोता हूँ कि
महापिङ्गल मर गया। मेरे सिर को तो सुख हुआ है। पिङ्गल राजा प्रासाद
से उतरते हुए और चढ़ते हुए हथौडी से चोट लगाने की तरह मेरे सिर पर
आठ आठ टोके लगाता था। वह परलोक जाकर भी जैसे मेरे सिर में टोके
लगाता था उसी तरह निरयपालको तथा यमराज के सिर में भी टोके लगाएगा।
'यह हमे बहुत कष्ट देता है' सोच वह इसे फिर यहाँ लाकर छोड जा सकते
हैं। वह मेरे सिर में फिर टोके मारेगा। मैं इस भय के कारण रोता हूँ। यह
अर्थ प्रकट करते हुए दूसरी गाथा कही—
न मे पियो आसि अकण्हनेत्तो
भायामि पच्चागमनाय तस्स,
इतो गतो हिंसेय्य मच्चुराजं
सो हिंसितो आनेय्य पुन इध ॥
[ मुझे पिङ्गल नेत्र प्रिय न था। मुझे डर है कि वह फिर न लौट आए।
यहाँ से जाकर वह यमराज को कष्ट दे। और (कही) यमराज कष्ट पाकर
उसे फिर यहाँ ले आए । ]
बोधिसत्त्व ने उसे आश्वासन दिया—वह राजा लकडी के हजार भारो
से जला दिया गया है। सैकडो घडो से (चिता) बुझा दी गई है। जिस जगह
जलाया गया, वह जगह चारो ओर से खन दी गई है। जो परलोक जाते हैं
उनका यह स्वभाव है कि वह दूसरी जगह जन्म ग्रहण करते हैं। फिर उसी शरीर
से नही आते हैं। इसलिए तू मत डर।
यह गाथा कही—