जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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मर्यादा लांघ दी, जो अकुशल धर्म में प्रतिष्ठित हो गए, ऐसे आदमियो कं
मन्त्र वा औषध से क्या चिकित्सा होगी ? ऐसे मूर्ख को दवाइयो से अच्छ
नही किया जा सकता ।
इस प्रकार वोधिसत्त्व ने राजा को यह बात समझाते हुए आगे यूं कहा—
“महाराज ! यदि तू इन तीनो राज्यो को प्राप्त करेगा, तो इन चारो नगरं
पर राज्य करता हुआ क्या तू एक ही साथ चार चार वस्त्र पहनेगा ? अथवा
चार चार सोने की थालियो मे भोजन करेगा ? अथवा चार चार पलंगो पर
सोएगा ? महाराज ! तृष्णा के वशीभूत न होना चाहिए । यह विपत्ति क
मूल है। यह बढने पर अपने को बढाने वाले आदमी को आठ महा निरयं
में, सोलह उस्सद निरयो मे तथा शेष नाना प्रकार के अपायो मे जा गिराती है।'
इस प्रकार राजा को निरय आदि के भय से धमका कर वोधिसत्त्व ने
धर्मोपदेश दिया । राजा भी धर्म सुनकर शोकरहित हुआ । उसी समय उसक
रोग जाता रहा । शक्र भी इसे उपदेश दे, शीलो मे प्रतिष्ठित कर देवलोक कं
ही चला गया ।
वह भी उस समय से लेकर दानादिपुण्यकर्म करके यथाकर्म (परलोक) गया
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय राज
कामनीत ब्राह्मण था । शक्र तो मै ही था ।
२२६. पलासी जातक¹
“गज्जग्गमेघेहि ” यह शास्ता ने जेतवन मे रहते समय पलासी परि-
व्राजक के बारे मे कही—
¹पलासि जातक