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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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Page 407

कोसिय ] ३८६
गिरा रहे समय रहते ही निकलकर भागना आरम्भ किया। कौओ ने उसे घेर
चोचो से ठांगे मार मार कर गिरा दिया। राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर
पूछा—तात ! यह कौवे उल्लू को क्यो मार गिरा रहे हैं ? बोधिसत्त्व ने
उत्तर दिया-महाराज ! अपने निवासस्थान से असमय बाहर निकलने
वाले इस प्रकार का बुरा अनुभव करते ही हैं। इसलिए नामुनासिब समय
पर अपने स्थान से नहीं निकलना चाहिए। यह बात कहते हुए ये दो गाथाएँ
कहीँ—
काले निक्खमणा साधु नाकाले साधु निक्खमो,
अकालेनेहि निक्खम्म एकम्पि बहूजनो;
न किञ्चि अत्थं जोतेति धङ्कारोनाव कोसिय ॥
धीरो च विधिविधानञ्जू परेस विवरन्तगू,
सब्बामित्ते वसीकत्वा कोसियोव सुखी सिया ॥¹
[ समय पर (घर से बाहर) निकलना अच्छा है। असमय निकलना
अच्छा नही। असमय पर निकलने से किसी लाभ को प्राप्त नहीं करता।
अकेले को भी बहुत जन (मार देते हैं) जैसे कौवा की सेना न उल्लू को।
धीर, विधि-विधान को जानने वाला, तथा दूसरे के मार्ग पर चलने
वाला सभी शत्रुओ को वशीभूत कर (पण्डित) उल्लू की तरह सुखी होने ]
काले निक्खमणा साधु महाराज निष्क्रमण का मतलब है निकलने का
पराक्रम करना, यह उचित समय पर ही अच्छा होता है। नाकाले साधु
निक्खमो असमय अपने निवासस्थान से दूसरे स्थान पर जाना—निकलना
या पराक्रम करना—ठीक नहीं। अकालेनेहि इत्यादि चारो पदो मे पहले से
तीसरे और दूसरे से चौथे का सम्बन्ध जोडकर इस प्रकार अर्थ जानना चाहिए।
अपने निवासस्थान से असमय निकलकर आदमी न किञ्चि अत्थं जोतेति
अपनी कुछ भी उन्नति नहीं कर सकता। सो एकम्पि बहूननो बहुत मे भी
¹गाथाओं का टीकाकार ने जो अर्थ दिया है वह ठीक नहीं है। प्रतीत
होता है कि कथा अन्यथा हो गई है।