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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 403 of 479

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Page 403

पुटभत्त ] ३८३
राजा ने अपने पुत्र पर षड्यन्त्र का सन्देह पर उसे निकाल दिया। वह
अपनी भार्य्या सहित नगर से निकल काशी मे एक गामडे म रहने लगा।
आगे चलकर जब उसने पिता के मरने का समाचार सुना तो कुताशा
राज्य को लने के लिए वापिस बनारस आया। रास्ते म उस भार्य्या को भी
देकर खान के लिए भात की पोटली मिली। उसने भार्य्या को न दे अकेले ही
खाया। भार्य्या कठोर-हृदय जान बडी दुखी हुई।
यह बाराणसी का राजा हो उसे पटरानी बना 'इतना ही इसके लिए
पर्याप्त है' समझ उसका और कोई सत्कार सम्मान न करता। कैसे दिन
कटते है ? तब न पूछता। बोधिसत्त्व ने सोचा—यह देवी राजा का बहुत
उपकार करने वाली है, उसके प्रति स्नेह रखती है, लेकिन राजा इसे कुछ
नही मानता। इसका सत्कार-सम्मान करवाऊँगा।
बोधिसत्त्व न पास जा आदर पूर्वक एक ओर खडे हो 'तात क्या है ?'
पूछने पर बातचीत चलाने के लिए कहा—देवी ! हम तुम्हारी सेवा करते हैं।
क्या बडे वडो को वस्त्र-खण्ड या भात नही देना चाहिए ?
"तात, में स्वय कुछ नही पाती। तुम्हे क्या दूँगी। जब मिलता था
दिया। अब राजा मुझे कुछ नही देता। दूसरी किसी चीज की बात जाने द।
राज्य ग्रहण करने के लिए आन के समय रास्ते म भात की पोटली पा मुझे भात
तक न दे अपने ही खाया।"
'अम्म ! क्या राजा के सामने ऐसा कह सकेगी ?'
"तात ! कह सकूँगी।"
"तो आज ही जब में राजा के सामने खडा होकर पूछूँ तो ऐसा कहना।
में आज ही तेरे गुण प्रकट करूँगा।"
ऐसा कहँ बोधिसत्त्व पहले से जाकर राजा के सामने खडा हुआ। वह
भी जाकर राजा के सामने खडी हुई।
बोधिसत्त्व ने उसे कहा—अम्म ! तुम अति कठोर-हृदया हो। क्या
वडे बूडो को वस्त्र या भात नही देना चाहिए ?
"तात ! मुझे ही राजा से कुछ नही मिलता। तुम्हें क्या दूँगी।"
"क्या पटरानी नही हो ?"
'तात ! कुछ सम्मान न मिलने पर पटरानी होने से क्या होगा ? अब