जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
Page 401 of 479
Read in contextपुटभत्त ] ३८१
यानि करोति पुरिसो तानि अत्तनि पस्सति
कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकं,
यादिसं वपते बीजं तादिसं हरते फलं ॥
इसका अर्थ-जो पारासरिय (पाराशर्य) ब्राह्मण ने कहा कि तू पापकर्म
मत कर, पीछे तुझे ही कष्ट देगा-यह उस आचार्य्य का वचन है। आदमी
शरीर, वाणी अथवा मन से जो भी कर्म करता है उनका फल पाता हुआ उन्ही
कर्मों को अपने में देखता है। शुभकर्म करने वाला शुभफल पाता है, पापकर्म
करने वाला बुरा अनिष्टकर फल पाता है। दुनिया म भी जैसा बीज बोता
है, वैसा ही फल पाता है। बीज के अनुसार बीज के अनुरूप ही फल ल जाता
है, ग्रहण करता है, भोगता है।
इस प्रकार रोता हुआ यह पृथ्वी में दाखिल हो अवीची महानरक मे
पैदा हुआ।
शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त कठोर, परुष तथा दयाहीन
है, वह पहले भी कठोर, परुष तथा दयाहीन ही रहा है' कह यह धर्मदेशना ला
जातक का मेल बैठाया।
उस समय शिकारी देवदत्त था। चारो दिशाओ म प्रसिद्ध आचार्य्य
सारिपुत्त। चुल्लनन्दिय आनन्द। माता महाप्रजापति गौतमी। महानन्दिय
तो मैं ही था।
२२३. पुटभत्त जातक
"नमे नमन्तस्स..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक
कुटुम्बी के बारे में कही।