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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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पर कुशल समाचार पूछे जाने पर, यह समाचार वह निवेदन किया कि
भन्ते ! इस प्रकार देवदत्त ने अपने अयोग्य चीवर (=अर्हत्-ध्वजा) को
धारण किया। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने अपने अयोग्य
चीवर को धारण किया, पहले भी धारण किया है' यह पूर्व-जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा

पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
हिमालय प्रदेश में हाथी के कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर वह अस्सी हजार
मस्त हाथियों के नायक बन जंगल में रहने लगे।
एक गरीब आदमी ने वाराणसी में दन्तकार गली में हाथी-दाँत का काम
करने वालों को चूड़ी आदि बनाते देख कर पूछा—हाथी-दाँत मिलें तो लोगे ?
उन्होंने कहा—लेंगे। यह शस्त्र ले, काषाय वस्त्र पहन, प्रत्येक-सम्बुद्ध का वेष
बना, टोपा पहन, हाथियों की गली में जा, आयुध से हाथियों को मार, दाँत
ला, वाराणसी में बेच, जीविका चलाता था। आगे चलकर उसने बोधिसत्त्व
के दल के सबसे अन्तिम हाथी को मारना आरम्भ किया। रोज़ रोज़ हाथियों
को कम होते देख हाथियों ने बोधिसत्त्व से कहा—किस कारण से हाथी कम
हो रहे हैं ?
बोधिसत्त्व ने देखभाल करते हुए सोचा—एक आदमी प्रत्येक-बुद्ध का
वेष पहनकर हाथियों की कतार के सिरे पर रहता है। कहीं वही तो नहीं
मारता है ? उसका पता लगाऊँगा। एक दिन हाथियों को आगेकर स्वयं
पीछे पीछे चला। वह आदमी बोधिसत्त्व को देखते ही शस्त्र लेकर कूदा।
बोधिसत्त्व ने रुक कर खड़े हो, उसे ज़मीन पर गिरा कुचल कर मार डालने
के लिए सूण्ड उठाई। (लेकिन) उसके पहने काषाय वस्त्रों को देख सोचा—
इस अर्हत्-ध्वजा का मुझे आदर करना चाहिए। उसने सूण्ड लपेट कर 'भो
पुरुष ! यह अर्हत् ध्वजा तेरे योग्य नहीं है। तू इसे क्यों धारण करता है ?'
कहते हुए यह गाथाएँ कही—

अनिक्कसावो कासावं यो वत्थं परिदहेस्सति,
अपेतो दमसच्चेन न सो कासावमरहति ॥